कांग्रेस ने शनिवार को नरेंद्र मोदी सरकार की विदेश नीति पर तीखा हमला किया। पार्टी के संचार प्रभारी और सांसद जयराम रमेश ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तान की उभरती स्थिति "स्वघोषित विश्वगुरु की कुटिलता और शैली के बारे में गंभीर सवाल उठा रही है।" यह बयान ऐसे समय में आया जब पश्चिम एशिया में छह सप्ताह से चल रहे युद्ध को खत्म करने के लिए ईरान और अमेरिका के नेता इस्लामाबाद पहुंचे हुए हैं। रमेश ने भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार पर 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान पाकिस्तान की मदद करने में चीन की कथित भूमिका के बावजूद बीजिंग के सामने घुटने टेकने का आरोप भी लगाया।
रमेश ने एक्स पर एक पोस्ट में लिखा: "इस्लामाबाद में आज अमेरिका-ईरान बैठक शुरू हो रही है। भारत सहित पूरी दुनिया को उम्मीद है कि यह दोनों देशों के बीच एक स्थायी शांति प्रक्रिया की शुरुआत होगी, जो अपने पड़ोस में इसराइल की निरंतर आक्रामकता से पटरी से नहीं उतरेगी। लेकिन स्वघोषित विश्वगुरु की 'हगलोमेसी' के सार और शैली पर गंभीर सवाल उठते हैं।"

जयराम रमेश के चार सवाल

रमेश ने अपने तर्कों को पुख्ता करने के लिए चार सवाल पूछे:
पाकिस्तान की वापसी: "अप्रैल 2025 के कायरतापूर्ण पहलगाम आतंकी हमले और उसके बाद उसे अलग-थलग करने के भारत के कूटनीतिक प्रयासों के बावजूद, पाकिस्तान अपने लिए एक नई भूमिका बनाने में कैसे कामयाब रहा? यह विफलता विशेष रूप से शर्मनाक है क्योंकि डॉ. मनमोहन सिंह सरकार ने नवंबर 2008 के मुंबई आतंकी हमलों के बाद पाकिस्तान को बहुत प्रभावी ढंग से अलग-थलग कर दिया था।"
अमेरिका के साथ संबंध: "मोदी जी और उनके समर्थकों के 'नमस्ते ट्रंप', 'हाउडी मोदी' और 'फिर एक बार ट्रंप सरकार' जैसे अभियानों के बाद भी भारत ने अमेरिका को पाकिस्तान को यह नई भूमिका देने की अनुमति कैसे दी? भारत ने एकतरफा व्यापार समझौते पर भी सहमति जताई जहां उसे मिलने वाले लाभ से कहीं अधिक उसने दिया - फिर भी मोदी सरकार अमेरिका पर कोई प्रभाव बनाने में विफल रही।"
BRICS+ की भूमिका: "भारत ने BRICS+ के वर्तमान अध्यक्ष के रूप में कोई शांति या मध्यस्थता पहल क्यों नहीं शुरू की - विशेष रूप से तब जब ईरान, यूएई और सऊदी अरब BRICS+ के सदस्य हैं?"
चीन के प्रति नीति: "पिछले अठारह महीनों में चीन के सामने भारत के 'नपे-तुले आत्मसमर्पण' (calibrated capitulation) से भारत को क्या हासिल हुआ है - खासकर 'ऑपरेशन सिंदूर' के प्रति पाकिस्तान की प्रतिक्रिया में चीन की महत्वपूर्ण भूमिका और पाकिस्तान को उसके निरंतर समर्थन को देखते हुए?"
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रमेश ने लिखा कि पश्चिम एशिया में शांति जल्दी लौटनी चाहिए। उन्होंने कहा, "हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) की स्थिति फिर से वैसी ही होनी चाहिए जैसी 28 फरवरी को ईरान पर अमेरिका-इसराइल हमले शुरू होने से पहले थी यानी मोदी की इसराइल की सबसे अनुचित यात्रा के ठीक दो दिन बाद।"
जयराम रमेश के इस बयान के पीछे कई गहरे राजनीतिक और कूटनीतिक निहितार्थ हैं। कांग्रेस यह स्थापित करने की कोशिश कर रही है कि वर्तमान सरकार की विदेश नीति केवल "फोटो-ऑप्स" (तस्वीरें खिंचवाने) और व्यक्तिगत संबंधों (हगलोमेसी) तक सीमित है। जयराम रमेश का तर्क है कि भारत की ऊर्जा उन देशों (जैसे अमेरिका) के साथ व्यक्तिगत प्रचार में खर्च हुई, जिन्होंने अंततः भारत के प्रतिद्वंद्वी (पाकिस्तान) को मध्यस्थ के रूप में स्वीकार कर लिया।

पाकिस्तान कूटनीति में आगे

पाकिस्तान लगातार भारत में आतंकवाद को बढ़ावा देता रहे है। पहलगाम की घटना इसका जीता जागता सबूत है। हालांकि उसके बाद ऑपरेशन सिंदूर हुआ। जिसके बीच में यूएस राष्ट्रपति ट्रंप ने पड़कर युद्धविराम कराया। इस मुद्दे पर ट्रंप ने मोदी की बेइज्ज़ती करने में कोई कमी नहीं छोड़ी। पीएम मोदी ने कांग्रेस सांसद शशि थरूर के नेतृत्व में पूरी दुनिया में अपने दूत भेजकर पाकिस्तान को "आतंकवाद की जननी" बताकर अलग-थलग करने का दावा किया था। आज वही पाकिस्तान अमेरिका और ईरान जैसे देशों के बीच शांति वार्ता की मेजबानी कर रहा है। यह भारत की उस कूटनीतिक घेराबंदी पर सवाल उठाता है जो 2008 के हमलों के बाद सफल मानी जाती थी।

चीन और 'ऑपरेशन सिंदूर'

रमेश ने 'ऑपरेशन सिंदूर' का जिक्र करते हुए सरकार को घेरने की कोशिश की है। आरोप यह है कि चीन ने पाकिस्तान को जमकर हथियार दिए। लड़ाकू विमान दिए। पाकिस्तान का साथ देने के बावजूद भारत सरकार ने चीन के प्रति कड़ा रुख अपनाने के बजाय नरम रुख (Capitulation) अपनाया है। यह भारत की कैसी कूटनीति है कि उसे चीन के आगे झुकना पड़ा।

BRICS+ और नेतृत्व का अवसर

भारत वर्तमान में BRICS+ का अध्यक्ष है। विपक्ष का तर्क है कि भारत ने इस मंच का उपयोग पश्चिम एशिया (ईरान-इसराइल संघर्ष) में शांति स्थापित करने के लिए नहीं किया, जिससे चीन या अन्य शक्तियों को इस क्षेत्र में प्रभाव बढ़ाने का मौका मिल गया।
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इसराइल यात्रा का समय

प्रधानमंत्री मोदी और बीजेपी को यह मानना होगा कि उनकी इसराइल यात्रा गलत समय पर हुई। यानी इसराइल ने मोदी के साथ एक तरह की धोखाधड़ी की। इसराइल ने हमले की तैयारी पहले ही कर ली थी। उसने जानबूझकर मोदी को इसराइल बुलाया। ताकि भारत को ईरान की दोस्ती से अलग किया जा सके। एक तरह से इसराइल ने भारत की विदेश नीति से भी खिलवाड़ किया। भारत का एक पक्षीय झुकाव इसराइल की ओर हुआ। भारत ने मिडिल ईस्ट में अपनी 'न्यूट्रल' मध्यस्थ की भूमिका खो दी है। इसकी भरपाई तभी हो सकती है जब भारत पूरी तरह से ईरान के समर्थन में खड़ा हो और इसराइल के हमलों की निन्दा करे। लेकिन बहुत सारी मजबूरियों की वजह से यह सरकार ऐसा कर नहीं पाएगी। कुल मिलाकर भारत एक फ्लॉप विदेश नीति से अपना काम अभी चलाता रहेगा।