घर से भारी मात्रा में नकदी बरामद होने के एक साल बाद जस्टिस यशवंत वर्मा ने शुक्रवार को इस्तीफा दे दिया। हालांकि यह मामला काफी विवादास्पद रहा है। जस्टिस वर्मा ने अनगिनत बार आरोपों से इनकार किया।
लगभग एक साल बाद जस्टिस यशवंत वर्मा ने इलाहाबाद हाईकोर्ट से इस्तीफा दे दिया है। दिल्ली स्थित उनके आधिकारिक आवास से कथित तौर पर भारी मात्रा में नकदी बरामदगी के बाद काफी विवाद हुआ था। उनका इस्तीफा राष्ट्रपति को सौंप दिया गया है। इस्तीफा उस समय दिया गया है जब जस्टिस वर्मा एक आंतरिक जांच (इन-हाउस इंक्वायरी) का सामना कर रहे है और संसद में उनके खिलाफ प्रस्ताव लाए जाने की भी चर्चा थी।
यह विवाद पिछले साल मार्च में शुरू हुआ था, जब दिल्ली में जस्टिस वर्मा के आधिकारिक आवास में आग लग गई। आग बुझाने के दौरान आवास पर नकदी के ढेर मिलने का दावा किया गया था। कुछ रिपोर्टों में कहा गया कि नकदी के स्टैक 1.5 फीट से भी ऊंचे थे। इस घटना के बाद तत्कालीन चीफ जस्टिस ने संज्ञान लिया और जस्टिस वर्मा को दिल्ली हाईकोर्ट से इलाहाबाद हाईकोर्ट में ट्रांसफर कर दिया गया।
हालांकि, जस्टिस वर्मा ने इन आरोपों से पूरी तरह इनकार किया है। उन्होंने लगातार कहा है कि उनके आवास से कोई नकदी बरामद नहीं हुई थी। संसदीय पैनल के सामने दिए गए अपने जवाब में जस्टिस वर्मा ने कहा कि आग लगने के समय वे घर पर मौजूद नहीं थे और वे पहले जवाबदेह भी नहीं थे।
उन्होंने कहा, “अगर अधिकारियों ने उस जगह को सुरक्षित करने में विफलता दिखाई तो मुझे क्यों महाभियोग (impeach) किया जाना चाहिए... मौके पर मौजूद पुलिस और अग्निशमन विभाग के अधिकारियों ने आवश्यक कार्रवाई नहीं की।” उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि जब वो जगह उस समय जब मौजूद अधिकारियों के नियंत्रण में थी, तो किसी भी कथित चूक के लिए उन्हें कैसे जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।
अगस्त 2025 में लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के तहत आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति गठित की थी। इस पैनल में शामिल हैं: सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अरविंद कुमार, मद्रास हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस मनिंदर मोहन
वरिष्ठ एडवोकेट बी.वी. आचार्य।
जस्टिस वर्मा ने इस पैनल की वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। उन्होंने तर्क दिया था कि राज्यसभा के उपसभापति द्वारा उनके हटाने संबंधी प्रस्ताव को खारिज कर दिया गया था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी और संसदीय समिति को अपनी जांच जारी रखने की अनुमति दे दी।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित एक पहले की आंतरिक जांच समिति ने पाया था कि जस्टिस वर्मा और उनके परिवार के सदस्यों का उस कमरे पर नियंत्रण था, जहां से नकदी कथित रूप से बरामद हुई थी। जांच जारी रहने और महाभियोग की कार्यवाही की संभावना बढ़ने के साथ, जस्टिस वर्मा ने अब अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। हालांकि इस सारे मामले के और भी पहलू हैं। शायद जस्टिस वर्मा का इस्तीफा मंजूर होने के बाद वे इस पर कुछ बोल सकते हैं।