तकनीकी शिक्षा रेगुलेटर ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एजुकेशन (AICTE) ने अपने सभी मान्यता प्राप्त कॉलेजों से कहा है कि वे वैदिक शिक्षा प्रणाली के छात्रों को इंजीनियरिंग पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए नियमित स्कूल बोर्ड के छात्रों के बराबर मानें। एआईसीटीई के इस निर्देश को मोदी सरकार की नई पहल कहकर प्रचारित किया जा रहा है। लेकिन एआईसीटीई के इस फैसले के बाद अकादमिक जगत में बहस छिड़ गई है, जहां कुछ विशेषज्ञों ने इसके संभावित प्रभावों पर चिंता जताई है।

AICTE ने तकनीकी विश्वविद्यालयों के कुलपतियों, राज्य सरकारों और अपने करीब 9,000 स्वीकृत संस्थानों को पत्र लिखकर निर्देश दिया है कि महार्षि सांदीपनि राष्ट्रीय वेद संस्कृत शिक्षा बोर्ड (MSRVSSB) के वेद भूषण और वेद विभूषण प्रमाणपत्रों को क्रमशः कक्षा 10 और कक्षा 12 के समकक्ष माना जाए। अब तक इस बोर्ड के छात्र इंजीनियरिंग पढ़ने के पात्र नहीं माने जाते थे। AICTE के सलाहकार एन.एच. सिद्धालिंगा स्वामी द्वारा 28 जनवरी को जारी निर्देश में कहा गया है कि जो छात्र MSRVSSB की परीक्षा पास कर तय शर्तें पूरी करते हैं, उन्हें उच्च शिक्षा कार्यक्रमों में अन्य मान्यता प्राप्त बोर्डों के छात्रों के समान अवसर दिया जाए।
पत्र में यह भी उल्लेख किया गया है कि सरकार द्वारा अधिकृत एसोसिएशन ऑफ इंडियन यूनिवर्सिटीज (AIU) पहले ही MSRVSSB की कक्षा 10 और 12 की योग्यता को नियमित बोर्डों के बराबर मान्यता दे चुकी है। शिक्षा मंत्रालय ने भी MSRVSSB को एक नियमित स्कूल बोर्ड के रूप में मान्यता दी है और इसके प्रमाणपत्रों को उच्च शिक्षा तथा सरकारी नौकरियों में प्रवेश के लिए वैध बताया है।

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द टेलीग्राफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक तमाम शिक्षाविद इस फैसले से सहमत नहीं हैं। कई शिक्षाविदों ने इस कदम पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि वैदिक शिक्षा प्रणाली में प्राचीन ग्रंथों के कंठस्थ (रटने) अध्ययन पर अधिक जोर होता है, जबकि आधुनिक शिक्षा में वैचारिक समझ को प्राथमिकता दी जाती है। MSRVSSB की वेबसाइट के अनुसार वैदिक शिक्षा में वेदों की संहिता का पूर्ण कंठस्थ पाठ, शुद्ध उच्चारण और आमने-सामने पारंपरिक प्रशिक्षण पर विशेष बल दिया जाता है, हालांकि पाठ्यक्रम में अंग्रेजी, गणित, विज्ञान, सामाजिक विज्ञान और कंप्यूटर के कुछ तत्व भी शामिल हैं।
उत्तराखंड तकनीकी विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. ओंकार सिंह ने आशंका जताई कि विज्ञान विषयों की मजबूत बुनियाद के बिना छात्रों को इंजीनियरिंग पढ़ाई में कठिनाई हो सकती है। उन्होंने कहा कि इससे तकनीकी शिक्षा के मानकों पर असर पड़ सकता है और प्रवेश के बाद छात्रों को अवधारणात्मक (conceptual) समझ तथा भाषा माध्यम से जुड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। सिंह ने यह भी कहा कि हर साल इंजीनियरिंग कॉलेजों में 30–40 प्रतिशत सीटें खाली रहती हैं, इसलिए कई संस्थान वैदिक बोर्ड के छात्रों को प्रवेश देना शुरू कर सकते हैं।

एक सरकारी अधिकारी के अनुसार AICTE पहले भी ऐसा निर्देश जारी कर चुका है, लेकिन प्रतिक्रिया ठंडी रही थी। अधिकारी ने कहा कि इस बार पत्र दोबारा भेजा गया है ताकि वैदिक बोर्डों को अधिक लोकप्रिय बनाया जा सके। इस फैसले पर उठ रही आलोचनाओं के संबंध में AICTE के अध्यक्ष प्रो. योगेश सिंह से प्रतिक्रिया मांगी गई है, जिसका इंतजार है।