मार्च 2020 में कोविड-19 महामारी की पहली लहर दस्तक दे चुकी थी। उसी भयानक अनिश्चितता के बीच देश के सामने एक नई उम्मीद रखी गई-'पीएम केयर्स फंड' (PM CARES Fund)। आपात स्थिति से निपटने और पीड़ितों की मदद के लिए एक चैरिटेबल ट्रस्ट की शुरुआत हुई। देश के प्रधानमंत्री इस ट्रस्ट के अध्यक्ष बने और गृह, रक्षा तथा वित्त मंत्री इसके ट्रस्टी।
सरकार की एक आवाज पर देश एक साथ खड़ा हो गया। पेंशन का छोटा हिस्सा देने वाले बुजुर्गों से लेकर अपनी जमा-पूंजी लगाने वाले बच्चों और करोड़ों का CSR फंड देने वाले कॉर्पोरेट घरानों तक- हर किसी ने इसमें योगदान दिया। देखते ही देखते फंड में हजारों करोड़ रुपये जमा हो गए।
शुरुआती तीन सालों (2020 से 2023) तक सब कुछ पारदर्शी दिखता रहा। हर वित्तीय वर्ष के अंत में फंड की वेबसाइट पर 'ऑडिटेड वित्तीय रिपोर्ट' अपलोड की जाती थी। लोग देख सकते थे कि कितना पैसा आया, कितने वेंटिलेटर खरीदे गए, कितने ऑक्सीजन प्लांट लगे और कितने बच्चों की मदद हुई।
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मार्च 2023 के बाद छा गया सन्नाटा

वित्तीय वर्ष 2022-23 खत्म हुआ। द हिन्दू अखबार के मुताबिक 31 मार्च 2023 की अंतिम ऑडिट रिपोर्ट सार्वजनिक हुई, जिसमें दर्ज था कि फंड के खातों में ₹6,283.68 करोड़ रुपये बचे हुए हैं। उस साल अकेले करीब ₹909 करोड़ का स्वैच्छिक दान और विदेश से ₹2.57 करोड़ आए थे। लेकिन इसके बाद खामोशी है। कोई ऑडिट रिपोर्ट नहीं है।
वित्तीय वर्ष 2023-24 बीता, फिर 2024-25 भी निकल गया... मगर पीएम केयर्स की आधिकारिक वेबसाइट पर कोई नया खाता, कोई नया ऑडिटेड ब्योरा या खर्चों की कोई नई रिपोर्ट अपलोड नहीं की गई। जो पारदर्शिता शुरुआती सालों में दिखाई गई थी, वह अचानक एक लंबी खामोशी में बदल गई।

उठते सवाल और बंद खिड़कियां

इस खामोशी ने कई सवाल खड़े कर दिए:

  • CAG के ऑडिट से बाहर: इस फंड का हिसाब-किताब देश की शीर्ष ऑडिट संस्था (CAG) नहीं करती, बल्कि इसके लिए एक निजी सीए फर्म (M/s SARC & Associates) को नियुक्त किया गया था।

  • RTI का दरवाजा भी बंद: जब आम लोगों और सूचना कार्यकर्ताओं ने RTI के जरिए जानकारी मांगनी चाही, तो जवाब मिला कि "पीएम केयर्स एक पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट है, सरकारी संस्था नहीं।" इसलिए यह सूचना के अधिकार (RTI) के दायरे में नहीं आता।
सुप्रीम कोर्ट से लेकर दिल्ली हाई कोर्ट के गलियारों तक याचिकाएं पहुंचीं। सामाजिक कार्यकर्ताओं और विपक्षी नेताओं ने मांग की कि जब देश के आम नागरिकों की मेहनत की कमाई से यह फंड बना है, तो इसका एक-एक रुपया कहां खर्च हो रहा है-इसका हिसाब जनता के सामने होना चाहिए।
आज भी पीएम केयर्स फंड की वेबसाइट पर वही 2022-23 की पुरानी रिपोर्ट चमक रही है, और देश यह जानने का इंतजार कर रहा है कि उस बही-खाते के अगले पन्नों पर क्या लिखा है।

विवाद का प्रमुख पहलू 

इस फंड का दोहरा चरित्र है। एक तरफ जहां सरकार इसे 'गैर-सरकारी' ट्रस्ट बताकर RTI और CAG जांच से दूर रख रही है, वहीं दूसरी तरफ इसमें देश के शीर्ष सरकारी पदों पर बैठे लोग शामिल हैं। देश के प्रधानमंत्री इस ट्रस्ट के अध्यक्ष हैं तथा गृह मंत्री, रक्षा मंत्री और वित्त मंत्री इसके ट्रस्टी हैं। इसके प्रचार-प्रसार में सरकारी मशीनरी, आधिकारिक वेबसाइट (gov.in domain) और राष्ट्रीय प्रतीक (अशोक स्तंभ) का इस्तेमाल हुआ है। इतना ही नहीं, सरकारी कर्मचारियों के वेतन से काटे गए पैसे और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSU) के कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) फंड का एक बड़ा हिस्सा इसमें जमा कराया गया। विपक्ष और जनसंगठनों का कहना है कि जब इसमें सरकारी पद और संसाधन इस्तेमाल हो रहे हैं, तो इसे निजी ट्रस्ट का दर्जा देना विरोधाभासी है।

इस पहलू पर भी गौर करें

1948 से देश में 'प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष' (PMNRF) और 2005 के कानून के तहत 'राष्ट्रीय आपदा मोचन निधि' (NDRF) पहले से मौजूद थे, जिनके पास ऐसे आपातकालीन संकटों से निपटने का तंत्र था। विपक्ष ने सवाल उठाया कि जब पहले से वैधानिक फंड उपलब्ध थे, तो एक नए ट्रस्ट की आवश्यकता क्यों पड़ी? इसके अलावा, हाल के वर्षों में- विशेषकर वित्तीय वर्ष 2022-23 के बाद से- इस फंड की आधिकारिक ऑडिट रिपोर्ट सार्वजनिक न किए जाने से संदेह और बढ़ गए हैं। जनता का मानना है कि चूंकि यह पैसा संकट के समय नागरिकों और संस्थानों के योगदान से एकत्र किया गया है, इसलिए इसके पाई-पाई के हिसाब का पारदर्शी खुलासा होना आवश्यक है।