सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को दिल्ली के उपमुख्यमंत्री प्रवेश वर्मा और भाजपा नेता अनुराग ठाकुर हेट स्पीच मामले में बरी करते हुए बड़ी राहत दे दी। दोनों पर 2020 के नागरिकता संशोधन कानून (CAA) विरोधी प्रदर्शनों के दौरान दिए हेट स्पीच देने का आरोप लगाया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उनके बयानों से कोई संज्ञेय अपराध बनता नहीं दिखता है। हालांकि इसी मामले को दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस एस. मुरलीधरन ने हेट स्पीच मानते हुए पुलिस को कार्रवाई का आदेश दिया था। इसके बाद जस्टिस एस. मुरलीधरन को दिल्ली हाईकोर्ट से ट्रांसफर कर दूसरी जगह भेज दिया गया था। 
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने सीपीआई(एम) नेताओं वृंदा करात और के.एम. तिवारी की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। कोर्ट ने कहा, “रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री, कथित भाषणों, 26 फरवरी 2020 की स्टेटस रिपोर्ट और निचली अदालतों के कारणों पर सावधानीपूर्वक विचार करने के बाद हम इस निष्कर्ष से सहमत हैं कि कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता है।”

मामला क्या था?

जनवरी 2020 में CAA विरोधी प्रदर्शनों के दौरान अनुराग ठाकुर और प्रवेश वर्मा पर आरोप लगा था कि उन्होंने भड़काऊ भाषण दिए थे। शिकायतकर्ताओं ने उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग की थी।अगस्त 2020 में ट्रायल कोर्ट ने शिकायत खारिज कर दी थी, क्योंकि बिना सक्षम प्राधिकरण की पूर्व अनुमति के मुकदमा नहीं चलाया जा सकता था। जून 2022 में दिल्ली हाईकोर्ट ने भी याचिका खारिज कर दी और कहा कि बयान किसी खास समुदाय के खिलाफ नहीं थे और न ही उन्होंने हिंसा या सार्वजनिक अव्यवस्था को भड़काया।
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सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट के कुछ तर्कों से असहमति जताई। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पूर्व अनुमति (सैंक्शन) की जरूरत केवल मजिस्ट्रेट द्वारा संज्ञान लेने के चरण पर होती है, एफआईआर दर्ज कराने या जांच शुरू करने के चरण पर नहीं।कोर्ट ने कहा: “सीआरपीसी के तहत एफआईआर दर्ज कराने या पूर्व-संज्ञान के दौरान जांच पर कोई रोक नहीं है। जहां जानकारी संज्ञेय अपराध का खुलासा करती है, वहां एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य है। पुलिस के पास कोई विवेक नहीं है।”
कोर्ट ने कहा कि जांच एजेंसियां कानून द्वारा तय कर्तव्यों का पालन करने के लिए बाध्य हैं। सैंक्शन की शर्त को जांच शुरू होने से पहले बाधा के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

अनुराग ठाकुर और प्रवेश वर्मा के कथित नारे क्या थे

दिल्ली के रिठाला विधानसभा क्षेत्र में जनवरी 2020 में एक चुनाव रैली का वीडियो वायरल हुआ था। रैली में भाषण देने के बाद अनुराग ठाकुर मंच से नारा लगाते हैं, ‘देश के गद्दारों को’ और उनके सामने खड़े बीजेपी कार्यकर्ता इसका जवाब देते हैं, ‘गोली मारो सालों को।’ ठाकुर ऐसा बार-बार करते हैं और हर बार उनके कार्यकर्ता वही जवाब देते हैं। हालांकि जिन पत्रकारों ने उस वीडियो को शेयर किया था, ट्विटर (अब एक्स) ने उसे ब्लॉक कर दिया था। 

पूर्व जज एस मुरलीधर के साथ क्या बीता था

इस मामले में दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व जज एस. मुरलीधर से क्या हुआ था, उसे जानना ज़रूरी है। पूर्व जज एस. मुरलीधर को 26 फरवरी 2020 की आधी रात को पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में तबादले की सूचना मिली। यह अचानक सूचना जज द्वारा दिल्ली पुलिस को फटकार लगाने और भाजपा नेताओं (अनुराग ठाकुर और प्रवेश वर्मा) के कथित घृणास्पद भाषणों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने में पुलिस की विफलता पर अपनी नाराजगी व्यक्त करने के एक दिन बाद आई। उत्तर-पूर्वी दिल्ली में घृणास्पद भाषणों के बाद हुई सांप्रदायिक हिंसा में 53 लोग मारे गए थे। आम लोगों की संपत्ति, आजीविका का व्यापक नुकसान हुआ है और अल्पसंख्यक समुदाय के लोग विस्थापित हुए हैं।
पूर्व जज मुरलीधर को भाजपा नेता अनुराग ठाकुर, भाजपा नेता कपिल मिश्रा, प्रवेश वर्मा और अभय वर्मा के घृणास्पद भाषणों के वीडियो कोर्ट में दिखाए गए थे। एस. मुरलीधर की विदाई समारोह में दिल्ली हाईकोर्ट का परिसर खचाखच भरा हुआ था और वकील सभी मंजिलों पर मौजूद थे। सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रशांत भूषण ने उस समय ट्वीट किया था- “आज जस्टिस मुरलीधर को सर्वोच्च न्यायालय में अंतिम विदाई दी जा रही है। जिस दिन उन्होंने दिल्ली पुलिस को दंगा अधिनियम पढ़कर सुनाया, उसी दिन रात 11 बजे उनका तत्काल तबादला कर दिया गया। सर्वोच्च न्यायालय ने किसी भी न्यायाधीश को ऐसी भावपूर्ण विदाई कभी नहीं दी। उन्होंने दिखाया कि अपने कर्तव्य और शपथ के प्रति सच्चा न्यायाधीश संविधान को कायम रखने और अधिकारों की रक्षा करने के लिए क्या कर सकता है।”
बार एंड बेंच की उस समय की रिपोर्ट के अनुसार, कोर्ट परिसर में वकीलों की भारी संख्यों को संबोधित करते हुए तत्कालीन चीफ जस्टिस डी एन पटेल ने कहा था, “हम एक ऐसे अत्यंत प्रख्यात जज को खो रहे हैं जो कानून के किसी भी विषय पर चर्चा कर सकते हैं और किसी भी प्रकार के मामले का फैसला कर सकते हैं।” जब जस्टिस मुरलीधर की बोलने की बारी आई, तो उन्होंने कहा, “जब न्याय की जीत होनी होती है, तो वह होकर ही रहता है… सत्य के साथ रहो।” इसके बाद उन्होंने बताया कि कैसे वे संयोगवश कानून के क्षेत्र में आए। उन्होंने कहा कि कानून उनके करियर के रूप में पहली पसंद नहीं था। “कानून मेरे लिए नहीं बना था। मैं एक वकील के बेटे के साथ क्रिकेट खेलता था और अपना क्रिकेट बैग उसके चैंबर में छोड़ देता था,” उन्होंने आगे बताया कि उन्होंने एमएससी के लिए दाखिला लिया था। उन्होंने सितंबर 1984 में चेन्नई में वकालत शुरू की, जिसके बाद वे 1987 में सुप्रीम कोर्ट और दिल्ली हाई कोर्ट में वकालत करने के लिए दिल्ली चले गए।
बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से प्रवेश वर्मा और अनुराग ठाकुर पर लगे आरोपों से मुक्ति मिल गई है। यह फैसला हेट स्पीच मामलों में कानूनी प्रक्रिया और पूर्व अनुमति की भूमिका को लेकर महत्वपूर्ण माना जा रहा है।