सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि पश्चिम बंगाल चुनाव में जीत के अंतर से ज़्यादा SIR में वोटर डिलीट होने के मामले में ममता बनर्जी और बाक़ी लोग नई याचिका लगा सकते हैं। टीएमसी ने दावा किया है कि जीत के अंतर से ज़्यादा वोटर डिलीट होने के कारण चुनाव नतीजों पर असर हुआ है। इसको लेकर अदालत ने कहा है कि अगर नाम कटने से विधानसभा की कई सीटों के नतीजे प्रभावित हुए हैं तो कोर्ट इसे सुन सकता है।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमल्या बागची की बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही थी। तृणमूल कांग्रेस यानी टीएमसी के वरिष्ठ वकील और सांसद कल्याण बनर्जी ने कोर्ट में दावा किया है कि SIR प्रक्रिया के कारण बंगाल के चुनाव नतीजों पर बहुत असर पड़ा है।

862 वोट से हारे, नाम कटे 5000: TMC

कल्याण बनर्जी ने कोर्ट को बताया कि 31 विधानसभा सीटों पर जीत का अंतर SIR में कटे नामों से कम था। एक सीट का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी के उम्मीदवार सिर्फ़ 862 वोट से हारे, जबकि उस सीट पर 5000 से ज़्यादा नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए थे। उन्होंने आगे कहा कि पूरे राज्य में टीएमसी और बीजेपी के बीच कुल वोटों का अंतर क़रीब 32 लाख था, जबकि SIR में नाम कटने के खिलाफ अपील 35 लाख से ज्यादा थी। टीएमसी का कहना है कि इन अपीलों का फैसला होने में कई साल लग सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट का जवाब

टीएमसी की तरफ़ से पेश की गई दलीलों पर सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि अगर किसी सीट पर जीत का अंतर कटे हुए वोटों से कम है तो प्रभावित पार्टी नई याचिका दाखिल कर सकती है। इससे पहले भी कोर्ट ने ऐसे मामलों की जांच करने का संकेत दिया था। वरिष्ठ वकील मेनका गुरुस्वामी ने बताया कि मौजूदा रफ़्तार से अपीलीय ट्रिब्यूनल को वोटर लिस्ट से जुड़ी अपीलें साफ करने में करीब 4 साल लग सकते हैं।

इलेक्शन पीटीशन ही क़ानूनी रास्ता: ECI

चुनाव आयोग यानी ईसीआई ने टीएमसी के दावों का विरोध किया। आयोग के वकील ने कहा कि चुनाव से जुड़े विवादों का कानूनी रास्ता चुनाव याचिका यानी Election Petition ही है। उन्होंने कहा कि SIR प्रक्रिया से जुड़े हर मुद्दे को अलग-अलग कोर्ट में नहीं लाया जा सकता है। हालाँकि कोर्ट ने कहा कि अपीलों के फ़ैसले की प्रक्रिया को और बेहतर बनाया जा सकता है और समय पर फ़ैसला होना बेहद ज़रूरी है।

SIR क्या था और क्यों बना सबसे बड़ा मुद्दा?

चुनाव आयोग ने चुनाव से पहले वोटर लिस्ट का विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR किया। इसमें करीब 91 लाख नाम काट दिए गए, जो कुल वोटरों का लगभग 12% है। SIR शुरू होने से पहले राज्य में कुल 7.66 करोड़ वोटर थे। 

दिसंबर में ड्राफ्ट लिस्ट में क़रीब 60 लाख नाम हटाए गए। बाद में लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी के 60 लाख से ज्यादा मामलों को अदालती जांच के लिए भेजा गया। इनमें 27 लाख से ज्यादा को 'एक्सक्लूडेबल' माना गया। इस तरह कुल मिलाकर 91 लाख मतदाता हटा दिए गए।

विपक्ष कह रहा है कि SIR एक तरफा था और उनके वोटरों को निशाना बनाया गया। बीजेपी इसे चुनावी लिस्ट साफ करने का जरूरी कदम बता रही है। चाहे कोई इसे वोटरों की छंटनी कहे या चुनावी सफाई, SIR 2026 के पश्चिम बंगाल चुनाव का सबसे बड़ा और सबसे विवादित मुद्दा रहा।

SIR से किसे नुकसान हुआ?

चुनावी आंकड़े बताते हैं कि जिन 169 विधानसभा सीटों पर 25000 से ज्यादा नाम कटे, वहां 2021 में टीएमसी ने 128 सीटें जीती थीं और बीजेपी सिर्फ 41 सीटें जीत पाई। लेकिन 2026 में हालात उलट गए। टीओआई की रिपोर्ट के अनुसार अब बीजेपी की सीटें 104 हो गईं जबकि टीएमसी घटकर 63 रह गई। कांग्रेस को 2 सीटें मिलीं। जिन 124 सीटों पर नाम 25000 से कम कटे वहां भी बीजेपी ने 2021 में 36 जीती थीं, लेकिन अब 100 से ज़्यादा सीटें जीत लीं। यानी तीन गुना बढ़ोतरी गुई।
जिन 38 सीटों पर 'लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी'के आधार पर सबसे ज्यादा नाम कटे, 2021 में TMC ने 34 सीटें जीती थीं। इस बार सिर्फ 22 रह गईं। दिलचस्प बात यह कि सबसे ज्यादा नाम कटने वाली 6 सीटों पर टीएमसी ने 4 सीटें बचाईं, लेकिन बीजेपी ने जोरासांको और हावड़ा नॉर्थ पर कब्जा कर लिया।

187 सीटों पर 5000 से ज्यादा नाम कटे, जिनमें बीजेपी ने 119 जीतीं। कई जगहों पर कटे नामों की संख्या जीत के अंतर से ज्यादा थी।

SIR से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा SC

बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट बंगाल में हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव से पहले SIR अभियान को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा है। इनमें ममता बनर्जी की याचिका भी शामिल है। 294 सदस्यों वाली पश्चिम बंगाल विधानसभा में बीजेपी ने 207 सीटें जीतीं, जबकि TMC को सिर्फ 80 सीटें मिलीं। इस चुनाव में मतदान प्रतिशत 90 प्रतिशत से ज्यादा रहा था। TMC का आरोप है कि SIR के दौरान बड़ी संख्या में नाम काटे गए, जिससे उनके वोट प्रभावित हुए। अब सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में नए सबूतों और याचिकाओं के लिए दरवाजा खुला रखा है। यह मामला बंगाल की राजनीति में गरमा गया है और दोनों पार्टियाँ इसे लेकर एक-दूसरे पर आरोप लगा रही हैं।