hate speech supreme court judgments 2026: हेट स्पीच पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी गाइडलाइंस जारी की थीं। लेकिन उसने कोरोना जिहाद, यूपीएससी जिहाद, हरिद्वार धर्म संसद के कथित नफरती भाषण जैसे 7 बड़े मामले खारिज कर दिए।
कथित हेट स्पीच के लिए हरिद्वार धर्म संसद काफी चर्चा में रही है। फाइल फोटो
Hate Speech Judgements: सुप्रीम कोर्ट ने 29 अप्रैल को नफरती भाषण से संबंधित याचिकाओं पर विस्तृत फैसला सुनाया। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने स्पष्ट किया कि मौजूदा आपराधिक कानून नफरत भरे भाषणों से निपटने के लिए पर्याप्त हैं। अदालतें नई अपराध की परिभाषा नहीं बना सकतीं और न ही विधायिका को कानून बनाने के लिए मजबूर कर सकती हैं। हेट स्पीच से जुड़ी याचिकाएं लंबे समय से लंबित थीं।
इस फैसले के साथ ही कोर्ट ने कई चर्चित नफरत भाषण मामलों को खारिज कर दिया। ये वर्षों से सुर्खियों में रहे थे। सातों मामले तथ्यों, समय बीतने के कारण अप्रासंगिक (infructuous) और इनके आधार में प्रक्रिया की कमी के कारण बंद किए गए। इसमें मुख्य याचिका एडवोकेट और बीजेपी नेता अश्विनी कुमार उपाध्याय बनाम भारत संघ एवं अन्य थीं।
'कोरोना जिहाद' मामला
आरोप: सोशल मीडिया पर #Islamiccoronavirusjihad जैसे हैशटैग और नफरती सामग्री का प्रचार, जो COVID-19 महामारी के दौरान मुस्लिम समुदाय की धार्मिक भावनाओं का अपमान करने वाला था।
प्रक्रिया: सबसे पहले मामला तेलंगाना हाईकोर्ट में शुरू हुआ था। कोर्ट ने पूरे भारत में राहत देने से इनकार कर दिया और कहा कि मुद्दा खुद-ब-खुद सुलझ गया है।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला: समय बीतने के साथ शिकायत की प्रासंगिकता खत्म हो गई। सोशल मीडिया ट्रेंड्स बदल चुके थे। इसलिए आगे सुनवाई जरूरी नहीं।
तबलीगी जमात घटना से संबंधित मीडिया कवरेज
आरोप: COVID-19 के दौरान निजामुद्दीन मरकज़ घटना के बाद मीडिया ने भ्रामक और सांप्रदायिक कवरेज किया।
प्रक्रिया: कई रिट याचिकाएं सीधे सुप्रीम कोर्ट में दायर।
कोर्ट का फैसला: कई प्रार्थनाएं महामारी काल से जुड़ी थीं, जो अब बीत चुकी हैं। मीडिया रेगुलेशन के मुद्दे मौजूदा वैधानिक तंत्र से निपटाए जाएं।
'UPSC जिहाद' मामला
आरोप: सुदर्शन टीवी पर प्रसारित कार्यक्रम ने मुस्लिमों के सिविल सेवाओं में प्रवेश को लेकर साजिश का आरोप लगाया। याचिकाकर्ता ने मुस्लिम समुदाय के खिलाफ आक्रामक टीवी कार्यक्रम रोकने की मांग की।
प्रक्रिया: याचिकाएं अनुच्छेद 32 के तहत सीधे सुप्रीम कोर्ट में दायर।
कोर्ट का फैसला: सामुदायिक भाषण से निपटने के लिए पहले से आपराधिक प्रावधान मौजूद हैं। अदालतें समानांतर रेगुलेशन ढांचा नहीं बना सकतीं। राहत मौजूदा कानून के तहत मांगने का विषय है।
हरिद्वार और दिल्ली धर्म संसद भाषण
आरोप: दिसंबर 2021 में हरिद्वार और दिल्ली में हुए धर्म संसद कार्यक्रमों में मुस्लिम समुदाय के खिलाफ कथित तौर पर हिंसा भड़काने वाले भाषण दिए गए।
प्रक्रिया: मामले की जांच और मुकदमे की निगरानी के लिए सीधे सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका।
कोर्ट का फैसला: मौजूदा कानूनी ढांचा पर्याप्त है। अदालतें हर मामले में "निरंतर निगरानी" ( continuing mandamus) नहीं रख सकतीं।
भाजपा नेता नितेश राणे का भाषण
आरोप: मार्च 2024 में मुंबई के सकल हिंदू समाज कार्यक्रम में दिए गए भाषण कथित तौर पर मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाते हुए दिए गए थे। FIR दर्ज करने की मांग की गई।
प्रक्रिया: याचिका सीधे सुप्रीम कोर्ट में दायर।
कोर्ट का फैसला: याचिकाकर्ता ने उपलब्ध कानूनी उपायों (पहले पुलिस के पास जाना, फिर मजिस्ट्रेट) का पालन नहीं किया। असाधारण अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल नहीं हो सकता।
55 नफरती भाषण की घटनाओं पर याचिका
आरोप: विभिन्न राज्यों में नफरती भाषण की 55 घटनाएं हुईं। पुलिस ने FIR दर्ज नहीं की। कार्रवाई की मांग की गई।
प्रक्रिया: पहले के सुप्रीम कोर्ट निर्देशों (सुओ मोटो FIR) का उल्लंघन बताते हुए अदालत में अवमानना याचिकाएं दायर।
कोर्ट का फैसला: कई मामलों में याचिकाकर्ताओं ने स्थानीय अधिकारियों से संपर्क नहीं किया। बिना शिकायत के सुओ मोटो FIR न दर्ज करना अवमानना नहीं है। अदालत हर नफरत भाषण की निगरानी नहीं कर सकती।
कोर्ट की टिप्पणी: भाईचारा और गरिमा बनाए रखना संवैधानिक कर्तव्य है। केंद्र सरकार 267वें विधि आयोग रिपोर्ट के आधार पर नया कानून बनाने पर विचार कर सकती है।
अनुराग ठाकुर और प्रवेश वर्मा के 'गोली मारो' भाषण
आरोप: जनवरी 2020 के दिल्ली विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान दिए गए भाषणों में उत्तेजक नारे और बयान थे, जो समुदायों के बीच दुश्मनी और हिंसा को बढ़ावा देने वाले बताए गए। CPI(M) नेता वृंदा करात ने शिकायत की थी।
प्रक्रिया: पुलिस ने FIR दर्ज नहीं की। शिकायतकर्ता ने मजिस्ट्रेट के समक्ष धारा 156(3) CrPC (अब BNSS की धारा 175(3)) के तहत अपील की। मजिस्ट्रेट और दिल्ली हाईकोर्ट ने सरकारी मंजूरी की जरूरत बताते हुए राहत देने से इनकार कर दिया।
कोर्ट का फैसला: सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 156(3) के तहत जांच के निर्देश के लिए पूर्व मंजूरी जरूरी नहीं है। लेकिन तथ्यों की जांच के बाद पाया कि उस भाषण की सामग्री (वीडियो वगैरह) से कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता। भाषण किसी विशिष्ट समुदाय को निशाना बनाते हुए आपराधिक दायित्व नहीं पैदा करते थे। इसलिए जांच का निर्देश देने का आधार नहीं बना।
इस फैसले से नफरत भाषण से संबंधित कई पुराने मामले समाप्त हो गए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने जोर दिया कि कानून प्रवर्तन मौजूदा प्रावधानों के माध्यम से होना चाहिए।
अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट क्या कहती है
सुप्रीम कोर्ट ने हेट स्पीच के सात बड़े मामले बंद कर दिए या इनसे संबंधित याचिकाओं को खारिज कर दिया। लेकिन भारत में नफरती भाषणों को लेकर एक अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट चौंकाने वाली है। यह रिपोर्ट जनवरी 2026 में आई थी। वाशिंगटन स्थित रिसर्च ग्रुप इंडिया हेट लैब ने कहा कि भारत में मुसलमानों और ईसाइयों जैसे अल्पसंख्यकों के खिलाफ हेट स्पीच यानी नफरती भाषण में 2025 में 13% की बढ़ोतरी हुई है। उसने अपनी सालाना रिपोर्ट में यह जानकारी दी है। रिपोर्ट के अनुसार 2025 में कुल 1318 ऐसे मामले दर्ज किए गए जो 2024 के 1165 से ज्यादा है और 2023 के 668 मामले से लगभग दोगुने हैं। औसतन हर दिन 4 ऐसी घटनाएँ हुईं। अधिकतर में मुसलमानों को निशाना बनाया गया।
98% मामले मुसलमानों के ख़िलाफ़
रिपोर्ट बताती है कि इनमें से 98% मामले मुसलमानों के खिलाफ थे। 308 भाषणों यानी क़रीब 23% मामलों में तो सीधे हिंसा की अपील की गई, जबकि 136 में हथियार उठाने की बात कही गई। हिंसा की अपील में 19% की बढ़ोतरी हुई। सबसे ज्यादा मामले उत्तर प्रदेश में दर्ज हुए, जहाँ 266 घटनाएं हुईं। उसके बाद महाराष्ट्र में 193, मध्य प्रदेश में 172, उत्तराखंड में 155 और दिल्ली में 76 का नंबर आता है। इन राज्यों में से ज्यादातर बीजेपी शासित हैं।वीएचपी और बजरंग दल पर आरोप
इंडिया हेट लैब के मुताबिक़, कुल 1318 में से 1164 घटनाएँ यानी 88% बीजेपी शासित राज्यों या इसके गठबंधन वाले राज्यों में हुईं। वहीं, विपक्षी दलों के शासित 7 राज्यों में सिर्फ़ 154 मामले थे, जो 2024 से 34% कम हैं। रिपोर्ट कहती है कि नफरती भाषण अब चुनावों तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह साल भर चलने वाली सामान्य बात बन गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि विश्व हिंदू परिषद यानी वीएचपी और बजरंग दल 289 नफ़रती भाषण वाले इवेंट से जुड़े रहे। सबसे ज्यादा भाषण देने वालों में से एक उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी हैं और उन्होंने 71 नफ़रती भाषण दिये। अंतरराष्ट्रीय हिंदू परिषद के प्रमुख प्रवीण तोगड़िया ने 46 और भाजपा नेता अश्विनी उपाध्याय ने 35 ऐसे भाषण दिए हैं।
गाली से गंदे शब्दों का इस्तेमाल
141 भाषणों में अमानवीय भाषा का इस्तेमाल किया गया, जिसमें अल्पसंख्यकों के लिए 'दीमक', 'परजीवी', 'कीड़े', 'सूअर', 'पागल कुत्ते', 'सांप के बच्चे', 'हरे सांप', और 'खून के प्यासे ज़ॉम्बी' जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया। लगभग आधे भाषणों यानी 656 मामलों में 'लव जिहाद', 'लैंड जिहाद', 'पॉपुलेशन जिहाद', 'थूक जिहाद', 'एजुकेशन जिहाद' जैसी साजिश थ्योरी का जिक्र था। यह 2024 से 13% ज्यादा है। ईसाइयों के खिलाफ भी नफरत बढ़ी, जहां 162 मामले यानी 41% बढ़ोतरी दर्ज हुई।
कांग्रेस नेता प्रियांक खड़गे ने उस समय इस रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा था, 'वाशिंगटन स्थित इंडिया हेट लैब की रिपोर्ट में पाया गया कि 2025 में भारत में दर्ज 88% एंटी-माइनॉरिटी हेट स्पीच घटनाएं बीजेपी शासित राज्यों में हुईं। 1318 में से 98% मुसलमानों को निशाना बनाया गया। 308 भाषणों में हिंसा की अपील थी, जबकि 136 में हथियार उठाने की बात कही गई। हिंसा की अपील 19% बढ़ी।' उन्होंने आगे कहा, 'मोदी जी की कर्मभूमि उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा 266 मामले। सबसे बड़ी विडंबना- कानून-व्यवस्था के लिए सीधे जिम्मेदार अमित शाह जी हेट स्पीच चलाने वालों में छठे नंबर पर हैं। यह दुनिया की सबसे बड़ी लोकतंत्र की दुखद हकीकत है।'
बीजेपी की नज़र में रिपोर्ट पक्षपाती
बीजेपी आरोप लगाती रही है कि इंडिया हेट लैब भारत की पक्षपाती तस्वीर पेश करती है। बीजेपी कहती है कि खाद्य सब्सिडी और बिजली पहुंचाने के कार्यक्रम जैसी उनकी नीतियां सभी समुदायों के लिए फायदेमंद हैं। अमेरिका में भारतीय दूतावास ने इस रिपोर्ट पर टिप्पणी के लिए रायटर्स द्वारा पूछे गए सवाल का जवाब नहीं दिया था।