सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की बेंच ने ज़मानत के एक दूसरे मामले में फ़ैसला सुनाते हुए कहा कि उमर ख़ालिद और गुरविंदर सिंह के दो मामलों में दो बेंचों ने जो फ़ैसले दिए, वे 2021 में के. ए. नजीब मामले में फ़ैसले के अनुरूप नहीं थे।
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को पूर्व जेएनयू के पूर्व छात्र नेता उमर खालिद को जमानत देने से इनकार करने वाले अपने ही पुराने फैसले पर गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने कहा कि जनवरी 2026 में दिए गए उस फैसले में गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम यानी यूएपीए (UAPA) के तहत लंबी अवधि की कैद और शीघ्र सुनवाई के अधिकार से जुड़े सिद्धांतों को सही तरीके से लागू नहीं किया गया।
जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने यह टिप्पणी एक अन्य यूएपीए मामले में आरोपी सैयद इफ्तिखार अंद्राबी को जमानत देते समय की। अंद्राबी पर मादक पदार्थों की सप्लाई के जरिए आतंकवाद को फंडिंग करने का आरोप है और वह पिछले छह वर्षों से जेल में बंद थे।
सुनवाई के दौरान अदालत ने 2021 के ऐतिहासिक फैसले Union of India vs KA Najeeb का उल्लेख किया। उस फैसले में तीन-जजों की पीठ ने कहा था कि यदि किसी आरोपी के मौलिक अधिकार, विशेष रूप से शीघ्र सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन हो रहा हो, तो संवैधानिक अदालतें यूएपीए जैसे कठोर कानूनों के तहत भी जमानत दे सकती हैं।
बेंच ने कहा कि जनवरी 2026 में शरजील इमाम और उमर खालिद की जमानत याचिकाएं खारिज करते समय इस फैसले (केए नजीब जजमेंट) का सही ढंग से पालन नहीं किया गया। अदालत ने अप्रैल 2026 में उमर खालिद की पुनर्विचार याचिका भी खारिज कर दी थी।
जस्टिस उज्जल भुइयां ने सोमवार 18 मई को फैसले में कहा कि उमर खालिद और गुरविंदर सिंह मामलों में अपनाए गए नज़रिए (जजमेंट) को स्वीकार करना “कठिन” है, क्योंकि इन फैसलों में यूएपीए की कठोर जमानत शर्तों की व्याख्या 2021 के बड़े पीठ के फैसले से अलग तरीके से की गई।
अदालत ने स्पष्ट कहा, “कम सदस्यों वाली बेंच बड़ी बेंच द्वारा तय किए गए फैसले से बंधी होती है। न्यायिक अनुशासन की मांग है कि ऐसे बाध्यकारी फैसले का पालन किया जाए या संदेह की स्थिति में मामले को बड़ी बेंच को भेजा जाए। छोटी बेंच बड़े बेंच के फैसले को कमजोर, दरकिनार या नजरअंदाज नहीं कर सकती।”
- यहां यह बताना ज़रूरी है कि उमर खालिद और इसी मामले में अन्य आरोपियों की जमानत याचिका में दलीलें पेश करते वक्त वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी ने केए नजीब जजमेंट को बाकायदा कोट किया था। लेकिन अदालत ने उमर खालिद और शरजील इमाम के मामले में इस रिफरेंस को महत्व नहीं दिया। इसी तरह गुरविंदर सिंह (2024) के मामले में भी उनके वकील ने केए नजीब जजमेंट का हवाला दिया था। अदालत ने जनवर 2026 में सिंघवी की इसी दलील के आधार पर गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर समेत पांच लोगों को ज़मानत दे दी थी। लेकिन उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इंकार कर दिया था। कोर्ट ने कहा कि इनके खिलाफ आरोप ज्यादा गंभीर हैं। कोर्ट का कहना था कपिल सिब्बल उमर खालिद की तरफ से पेश हुए थे। सिंघवी गुलफिशा फातिमा की ओर से पेश हुए थे।
अंद्राबी मामले की सुनवाई के दौरान सोमवार को बेंच ने कहा, “जमानत नियम है और जेल अपवाद।” अदालत ने जोर देकर कहा कि यह सिद्धांत यूएपीए मामलों में भी लागू होता है। कोर्ट ने कहा, “हमें यह कहने में कोई संदेह नहीं है कि यूएपीए के तहत भी जमानत नियम है और जेल अपवाद।”
- अदालत की आज 18 मई की इस टिप्पणी को यूएपीए मामलों में लंबित जमानत याचिकाओं के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, खासकर 2020 दिल्ली दंगा साजिश मामले में, जहां कई आरोपी वर्षों से मुकदमे का इंतजार करते हुए जेल में बंद हैं।
उमर खालिद को सितंबर 2020 में फरवरी 2020 के दिल्ली दंगों की कथित “बड़ी साजिश” मामले में गिरफ्तार किया गया था। दिल्ली पुलिस ने उन पर सीएए विरोधी प्रदर्शनों के दौरान भड़काऊ भाषण देने और हिंसा की पूर्व नियोजित साजिश का हिस्सा होने का आरोप लगाया था।
उन पर यूएपीए के अलावा भारतीय दंड संहिता की कई धाराओं के तहत भी मुकदमा दर्ज किया गया। खालिद ने सभी आरोपों से इनकार करते हुए कहा है कि दंगे भड़कने के समय वह दिल्ली में मौजूद नहीं थे।
जनवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इनकार कर दिया था, जबकि गुलफिशा फातिमा और मीरान हेदर समेत पांच अन्य आरोपियों को राहत दी गई थी। अदालत ने उस समय कहा था कि उमर खालिद और शरजील इमाम की भूमिका अन्य आरोपियों के मुकाबले “गुणात्मक रूप से अलग” है और उनके खिलाफ आरोप प्रथम दृष्टया सही लगते हैं।
5 जनवरी 2026 का सुप्रीम कोर्ट के फैसले में और क्या कहा गया था
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की बेंच ने पांच आरोपियों को जमानत देते हुए और उमर खालिद-शरजील इमाम को बेल न देते हुए कहा था कि हर अपील की अलग-अलग जांच करना आवश्यक है, क्योंकि रिकॉर्ड से पता चलता है कि सभी अपीलकर्ताओं की दोषसिद्धि समान नहीं है। पीठ ने कहा कि सहभागिता के क्रम को देखते हुए अदालत को हर ज़मानत याचिका का उसके गुण-दोष के आधार पर मूल्यांकन करना होगा। अदालत ने कहा, “उमर खालिद और शारजील इमाम अन्य आरोपियों की तुलना में गुणात्मक रूप से अलग स्थिति में हैं।”
फैसला सुनाते हुए इसी बेंच ने उमर खालिद और शरजीत इमाम पर इस बात के लिए रोक लगा दी है कि वो अब एक साल तक जमानत के लिए आवेदन भी नहीं कर सकते।
लाइव लॉ के मुताबिक ट्रायल में देरी को लेकर बचाव पक्ष द्वारा उस समय रखी गई दलीलों पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यूएपीए के तहत चलने वाले अभियोगों में यह कोई “ट्रंप कार्ड” नहीं है, जो वैधानिक सुरक्षा प्रावधानों को दरकिनार कर जमानत दे दे। अदालत ने कहा कि यूएपीए की धारा 43डी (5) जमानत देने के सामान्य प्रावधानों से अलग है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि इसमें न्यायिक समीक्षा को बाहर कर दिया गया है या डिफॉल्ट रूप से जमानत से इनकार करना अनिवार्य है।
उमर खालिद की ज़मानत याचिका लगातार नामंज़ूर होने की चर्चा दुनियाभर में है। हाल ही में अमेरिका के 8 डेमोक्रेट सांसदों ने भारत सरकार को पत्र लिखकर साफ सुथरे ट्रायल की उम्मीद जताई थी। पांचों अमेरिकी सांसदों ने हैरानी जताई थी कि उमर खालिद और अन्य आरोपियों को बिना मुकदमे शुरू हुए पिछले पांच साल से ज्यादा समय जेल में बिताना पड़ रहा है। न्यूयॉर्क के मेयर ज़ोहरान ममदानी ने उमर खालिद को पत्र लिखकर उनके जेल में होने पर चिन्ता जताई थी।
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के पूर्व छात्र और छात्र नेता उमर खालिद पांच वर्षों से अधिक समय से दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद हैं। उन्हें फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों का मुख्य साजिशकर्ता बताया गया है, जिसमें 53 लोग मारे गए थे और सैकड़ों लोग बेघर हो गए थे। ये दंगे नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के खिलाफ देशव्यापी प्रदर्शनों के दौरान भड़के थे।
सितंबर 2020 में गिरफ्तार हुए 38 वर्षीय उमर खालिद ने खुद को बेकसूर बताया है और कहा है कि उन्होंने केवल सीएए के खिलाफ शांतिपूर्ण प्रदर्शनों में हिस्सा लिया था, जिनमें से कई राष्ट्रीय राजधानी से 1,000 किलोमीटर दूर थे। उनके खिलाफ गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) सहित विशेष कानूनों के तहत मामले दर्ज हैं।
उमर खालिद और शारजील इमाम का मामला 'प्रक्रिया को सजा' के रूप में देखा जा रहा है, जहां बिना मुकदमे के लंबी कैद लोकतंत्र के लिए सवाल उठाती है। उनके समर्थक इसे अन्याय मानते हैं। तमाम मानवाधिकार संगठन इस मामले को उठा रहे हैं। जेएनयू के पूर्व छात्र नेता कन्हैया कुमार भी जेल में गए थे और उन पर भी राजद्रोह का आरोप लगा था। लेकिन कन्हैया कुमार को ज़मानत मिली और वे अब कांग्रेस के मंच से राजनीति कर रहे हैं। उमर खालिद के ही साथ उन्हीं आरोपों में जेल भेजी गईं नताशा नरवाल और दिव्यांगना कलिता कई साल पहले ही ज़मानत मिल चुकी है।