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फटेहाल अर्थव्यवस्था : मंदी की चपेट में अब टेलीकॉम? 

धीमी रफ़्तार और तेज़ी से सिकुड़ती भारतीय अर्थव्यवस्था पर चौतरफा संकट मंडरा रहा है। हर क्षेत्र में माँग और खपत कम होती जा रही है, उत्पादन गिरता जा रहा है। वाणिज्यिक कामकाज लगभग हर क्षेत्र में धीमी गति से चल रहा है। देश के 22 में से 15 सेक्टर मंदी की चपेट में हैं। आठ कोर सेक्टर में से 5 में निगेविट ग्रोथ यानी शून्य से कम वृद्धि यानी पहले से कम कारोबार कर रहै हैं। इसमें एक नया सेक्टर जुड़ना जा रहा है और वह है टेलीकॉम सेक्टर यानी दूरसंचार क्षेत्र। 
एक-दो कंपनियों को छोड़ पूरा दूरसंचार क्षेत्र संकट में तो चल ही रहा था, सुप्रीम कोर्ट के एक फ़ैसले से इस उद्योग का संकट बढ़ गया है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने हालिया निर्णय में दूरसंचार कंपनियों से कहा है कि वे सरकार को 92 हज़ार करोड़ रुपये से ज़्यादा का बकाया चुकाएँ। इस पर ज़ुर्माना और ब्याज जोड़ने से यह रकम 1.33 लाख करोड़ रुपये तक पहुँच जाएगी।
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क्या है मामला?

बीते 14 साल से सुप्रीम कोर्ट में एजीआर यानी एडजस्टेड ग्रॉस रेवेन्यू की परिभाषा का मामला चल रहा था। दूरसंचार कंपनियों का कहना था कि इसमें लाइसेंस और स्पेक्ट्रम फ़ीस ही होनी चाहिए, और कुछ नहीं। लेकिन सरकार का तर्क था कि इसमें लाइसेंस और स्पेक्ट्रम के अलावा यूजर चार्जेज, किराया, लाभांश (डिविडेंड्स) और पूँजी बिक्री पर मिलने वाला लाभांश भी शामिल किया जाना चाहिए। अदालत के एक खंडपीठ ने सरकार के पक्ष में फैसला सुनाया है। 

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक़, 3 साल पहले इन कंपनियों पर इस मद में कुल बकाया 29,474 करोड़ रुपये था। यह बढ़ कर अब 92 हज़ार करोड़ रुपये हो गया है। इसमें ब्याज, ज़ुर्माना और ज़ुर्माने की रकम पर लगने वाला ब्याज भी शामिल है। 
उद्योग से जुड़े जानकारों का कहना है कि इस 92 हज़ार करोड़ रुपये के अतिरिक्त बोझ से दूरसंचार कंपनियों की ब्रॉडबैंड सेवाएँ, नेटवर्क विस्तार, डिजिटल इंडिया और दूसरी योजनाएँ मुश्किल में पड़ सकती हैं। इस चक्कर में वे 5-जी भी लागू नहीं कर पाएंगी।

बंद हो चुकी कंपनियाँ

इस मामले में एक दिलचस्प पेच यह है कि इस रकम का 46 प्रतिशत हिस्सा उन कंपनियों को चुकाना है, जो अब अस्तित्व में ही नहीं हैं। रिलायंस कम्युनिकेशंस, टाटा टेलीसर्विसेज़, एयरसेल जैसी कंपनियाँ बंद हो चुकी हैं। इसका नतीजा यह होगा कि सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का सबसे ज़्यादा असर एयरटेल, वोडाफ़ोन और आइडिया पर पड़ेगा। ये कंपनियाँ बुरी स्थिति में हैं और इनका कारोबार धीमा चल रहा है। इन पर कर्ज़ अलग से है। एयरटेल पर जून 2019 तिमाही में 2 हज़ार करोड़ रुपये तो वोडाफ़ोन पर 4,873 करोड़ रुपये का कर्ज़ है। अब उन्हें एजीआर के तहत पैसे भी देने होंगे। 

दूरसंचार उद्योग की कंपनियों का सामान्य हाल समझने के लिए एक नज़र सरकारी उपक्रमों बीएसएनल और एमटीएनएल पर डाल सकते हैं। एमटीएनएल को बीते 10 में से 9 साल में घाटा उठाना पड़ा जबकि बीएसएनएल को इस पूरी अवधि में ही नुक़सान हुआ है।

सरकारी पैकेज

बिज़नेस स्टैंडर्ड का कहना है कि इन दोनों सरकारी कंपनियों पर कुल 40 हज़ार करोड़ रुपये का क़र्ज़ है।  यह बढ़ता जा रहा है। बीते कई सालों से घाटे में चल रही ये कंपनियाँ न तो मुनाफ़े की ओर बढ़ रही हैं और न ही यह कर्ज़ चुकाने की स्थिति में हैं। ये कंपनियां अब बंद होने की कगार पर हैं।

केंद्रीय दूरसंचार मंत्री रविशंकर प्रसाद ने इन दोनों कंपनियों को बंद होने से बचाने के लिए एक ख़ास पैकेज का एलान किया है। इसके मुताबिक एमटीएनएल का विलय बीएसएनएल में कर दिया जाएगा, कर्मचारियों के रिटायर होने की उम्र 60 से घटा कर 58 कर दी जाएगी, लगभग आधे कर्मचारियों को ज़बरन वीआरएस पकड़ा दिया जाएगा। इसके बाद सरकार इन्हें 4-जी खरदीने, लाइसेंस फ़ीस, रोजमर्रा के खर्च वगैरह के लिए पैसे देगी। बिज़नेस स्टैंडर्ड की ख़बर है कि केंद्र सरकार इस पर कुल 69,000 करोड़ रुपये खर्च करेगी। 
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कहाँ हैं टेलीनॉर, एतिसालात?

इसके पहले विदेशी पूँजी निवेश और बेहद धूम धड़ाके से जो कंपनियाँ 2-जी के समय शुरु की गई थीं, उनमें से ज़्यादातर बंद हो चुकी हैं। नॉर्वे की कंपनी टेलीनॉर, एतिसालात बड़ी कंपनियाँ थीं, जो बंद हो चुकी हैं। अनिल अंबानी की कंपनी रियालंस कम्युनिकेशन्स तो दिवालिया होने ही जा रही है। एयरटेल, एयरसेल, वोडाफ़ोन फटेहाल हैं। 

पूरे उद्योग के संकट के बीच एक मात्र रिलायंस जियो है, जो बेहतर स्थिति में है। मुकेश अंबानी के स्वामित्व वाली इस कंपनी का गठन 2016 में हुआ और उस समय से अब तक यह दिन दूनी रात चौगुनी रफ़्तार से बढ़ती ही जा रही है।

सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के मद्देनज़र रिलायंस जियो को सिर्फ 13 करोड़ रुपये देने हैं, जो बहुत ही मामूली रकम है। 

रिलायंस जियो को पिछले साल सितंबर तिमाही में 681 करोड़ रुपये का मुनाफ़ा हुआ था। इस साल इसमें 90 प्रतिशत का इजाफ़ा हो सकता है। ऐसा हुआ तो इस साल सितंबर तिमाही के नतीजों में इसे 1,293 करोड़ रुपये का लाभ हो सकता है। 

जियो को होगा फायदा!

पर्यवेक्षकों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से सबसे ज़्यादा फ़ायदा जियो को ही होगा। इसकी वजह यह है कि दूसरी कंपनियाँ रिलायंस के बाज़ार में आने के बाद से बीते 3 साल में उससे व्यावसायिक होड़ में नहीं टिक पा रही हैं। कई तो पहले से ही संकट में हैं, कई की स्थिति तीन साल में खराब हुई है। 

सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद जो पैसा उन्हें चुकाना होगा, उसके बाद ये कंपनियाँ न विस्तार कर पाएंगी और न ही कोई योजना लागू कर पाएंगी। सरकार जल्द ही 5-जी लाने वाली है। ये कंपनियाँ इसमें पैसे नहीं लगा पाएंगी, जो लगा देंगी वे रिलायंस के सामने टिक नहीं पाएंगी।

इसे एक इंडीकेटर से समझा जा सकता है। जिस दिन यानी 24 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला आया, रिलायंस को छोड़ तमाम टेलीकॉम कंपनियों के शेयरों की कीमतें बुरी तरह टूटीं। वोडाफ़ोन की कीमत 27 प्रतिशत गिर कर 4.10 रुपये पर आ गई, भारती एयरटेल 9 प्रतिशत कम होकर 325.60 रुपये पर आ गई। पर रिलायंस के शेयर की कीमत बंबई स्टॉक एक्सचेंज में 1.77 प्रतिशत बढ़ी। 

इससे क्या संकेत मिल रहा है, यह ज़्यादा चिंता की बात है। रिलायंस जियो धीरे-धीरे तमाम कंपनियों को इस तरह पीछे धकेलती जाएगी कि वे व्यावासयिक होड़ में नहीं रहेंगी। वे या तो बंद हो जाएंगी या किसी दूसरी कंपनी में उनका विलय हो जाएगा। देश के दूरसंचार उद्योग में एक ही कंपनी का वर्चस्व रहेगा और वह होगी रिलायंस जियो। हम इस एकाधिकारवादी यानी मोनोपोलिस्टिक दूरसंचार स्थिति की ओर बढ़ रहे हैं। 
प्रमोद मल्लिक
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