आख़िरकार साहित्य अकादमी के पूरे ड्रामे का पटाक्षेप हो गया और हिंदी में साहित्य अकादमी का बेहद प्रतिष्ठित सम्मान ममता कालिया को दिया गया है। यह पुरस्कार उन्हें ‘जीते जी इलाहाबाद’ किताब के लिए मिला है। ममता कालिया को साहित्य अकादमी का यह सम्मान साल 2024-25 के लिए मिला है। साहित्य अकादमी के इस सम्मान को लेकर कुछ महीने पहले काफ़ी बवाल मचा था। अकादमी पुरस्कारों की घोषणा ऐन मौके पर टाल दी गई थी। कहा यह गया था कि भरता सरकार सम्मान के लिए नामित लेखकों की विचारधारा को लेकर संतुष्ट नहीं है। उस समय भी संभावित नामितों में ममता कालिया का नाम सामने आया था।
अब जब पुरस्कारों की घोषणा हुई तो सत्य हिंदी ने लेखिका ममता कालिया से बात की और उनकी राय जाननी चाही। ममता कालिया ने छूटते ही कहा, “यह एक रुका हुआ फैसला था जो लागू हो गया। हालांकि इससे कुछ नहीं होता है, मेरी बेबाकी बनी रहेगी। हाँ, मुझे इस बात की ख़ुशी है कि यह पुरस्कार मेरी उस किताब को मिला है जिसमें जान है।”
पुरस्कृत किताब ‘जीते जी इलाहाबाद’ में ममता कालिया ने इलाहाबाद शहर को किसी किरदार की तरह प्रस्तुत किया है। यह उस दौर की याद दिलाता है जब इलाहाबाद हिंदी साहित्य का 'मक्का' हुआ करता था। इस संस्मरण में दूधनाथ सिंह, अमरकांत, रवींद्र कालिया और मार्कंडेय जैसे दिग्गजों के साथ बिताए लम्हों और साहित्यिक गोष्ठियों का बड़ा ही सजीव वर्णन है।

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कौन हैं ममता कालिया

अपनी बेबाक टिप्पणियों और ग़ज़ब के हास्यबोध के लिए प्रख्यात 85 वर्षीय ममता कालिया आधुनिक हिंदी साहित्य की उन विरल लेखिकाओं में से हैं, जिन्होंने अपने लेखन में मध्यवर्गीय जीवन की विसंगतियों, स्त्री अस्मिता और महानगरीय बोध को एक नई पहचान दी है। 1940 में मथुरा में जन्मी ममता ने अपने साहित्यिक अवदान से समाज को विशेष दृष्टिकोण में दिखाया है।
उनके लेखन का फलक अत्यंत विस्तृत है। उन्होंने उपन्यास, कहानी, कविता, संस्मरण और नाटक यानी हर विधा में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। उनके लेखन का खास पहलू मध्यवर्गीय जीवन का चित्रण है। उनकी कहानियों और उनके उपन्यासों में मध्यम वर्ग की आर्थिक जद्दोजहद, रिश्तों की कड़वाहट और शहर की भीड़ में अकेलेपन का सटीक चित्रण मिलता है। उनकी मशहूर कृतियों में उपन्यास: 'बेघर', 'नरक दर नरक', और 'दुक्खम-सुक्खम' बहू-पठित हैं, वहीं 'छुटकारा', 'सीट नं. छह', 'प्रतिदिन' आदि कहानी संग्रह भी बेहतर लेखन की नज़ीर हैं।
ईमानदार भाषा ममता कालिया के लेखन की विशिष्ट पहचान है। उनकी लेखकीय ज़ुबान बेहद सहज, बोलचाल के करीब और मारक है। उनके संवादों में एक खास तरह का व्यंग्य और तीखापन होता है, जो सामाजिक विसंगतियों पर करारी चोट करता है।
साहित्य अकादमी से पहले ममता कालिया को व्यास सम्मान, यशपाल स्मृति सम्मान और उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के साहित्य भूषण सम्मान से नवाज़ा जा चुका है।
यह बात दर्ज करना ज़रूरी है कि ममता कलिया पिछले कई दशकों से लिख रही हैं मगर उन्होंनेअपने लेखन की निरंतरता और ताजगी में कभी कमी नहीं आने दी। उन्होंने अपने व्यवहार और लेखन दोनों में पीढ़ियो का सामंजस्य बनाए रखा है।

साहित्य अकादमी पुरस्कार के लिए किताबों के चयन का आधार क्या है 

साहित्य अकादमी पुरस्कार के लिए किताब का प्रकाशन ठीक पहले के पाँच सालों में कभी भी होना चाहिए। इन पाँच सालों में प्रकाशित किताबें ही विचार के योग्य मानी जाती हैं। ममता कालिया की ‘जीते जी इलाहाबाद’ किताब राजकमल प्रकाशन ने साल 2021 में प्रकाशित की थी।  पुरस्कार के लिए लेखक का अनिवार्य रूप से भारतीय नागरिक होना बेहद अहम है। यहपुरस्कार हिंदी समेत कुल 24 भाषाओं में दिया जाता है। इनमें से 22 भाषाएँ संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल हैं, इसके अतिरिक्त अंग्रेज़ी और राजस्थानी में भी पुरस्कार दिया जाता है। एक आवश्यक शर्त पुस्तक का मौलिक होना है।अनुवाद, संकलन या शोध-पत्र  को इस श्रेणी में नहीं रखा जाता।
साहित्य अकादमी की चयन प्रक्रिया बहुत गोपनीय और व्यवस्थित होती है। सबसे पहले संबंधित भाषा के विशेषज्ञों द्वारा एक लंबी सूची तैयार की जाती है। इस सूची को 10 विशेषज्ञों के पास भेजा जाता है, जो अपनी पसंद की कुछ पुस्तकें चुनते हैं। अंत में, तीन सदस्यों की एक निर्णायक समिति बनाई जाती है। ये तीनों सदस्य सर्वसम्मति से या बहुमत के आधार पर विजेता का चयन करते हैं।

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आमतौर पर साहित्य अकादमी सम्मान केवल जीवित लेखकों के लिए है किंतु यदि किसी लेखक की मृत्यु पुस्तक प्रकाशित होने के बाद लेकिन पुरस्कार की घोषणा से पहले हो जाती है, तो उन्हें यह सम्मान दिया जा सकता है। हालाँकि, अकादमी अमूमन जीवित लेखकों को ही प्राथमिकता देती है। कोई भी लेखक अपने जीवनकाल में केवल ‘एक बार’ ही साहित्य अकादमी का मुख्य पुरस्कार जीत सकता है।