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अमित शाह के 'खेल' से हुई मोदी की धमाकेदार जीत

चुनाव में बीजेपी की इतनी धमाकेदार जीत कैसे हुई कि यह 2014 के आँकड़े को भी पार कर गई? क्या यह सिर्फ़ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे से संभव हो पाया या और कोई बड़ी वजह रही? पिछले पाँच साल से बीजेपी रणनीतिक स्तर पर भी तो काम कर रही थी। पार्टी के रणनीतिकार अमित शाह ने 2014 का चुनाव जीतने के बाद से ही इस पर काम शुरू कर दिया था। लोकसभा और इसके बाद के विधानसभाओं चुनावों की तैयारी और जीत के बाद कई लोगों ने तो उनको आज के ‘चाणक्य’ कहने लगे। तो अमित शाह की ऐसी कौन-सी रणनीति थी कि बीजेपी अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर पाई और कांग्रेस लगातार दूसरी बार धराशायी रही?

अमित शाह एक बार जो लक्ष्य तय कर लेते हैं फिर उसको पूरा करने का संकल्प, उनकी प्लानिंग और विरोधियों को मात देने की उनकी क्षमता ने उनको पार्टी का सबसे सफल अध्यक्ष बना दिया।
बीजेपी के ही नेताओं के अनुसार, सोशल इंजीनियरिंग करने से लेकर, चुनाव प्रबंधन और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को चुनाव से दूर रखने तक में यानी संगठन में सिर्फ़ अमित शाह की ही चलती है। बीजेपी के नेता ही कहते हैं कि अमित शाह प्रत्याशी चुनने में किसी की भी सिफ़ारिश नहीं मानते हैं और वह चुनाव जीतने के योग्य प्रत्याशी को ही चुनते हैं। 

2014 में ही शुरू कर दी थी 2019 की तैयारी

बीजेपी के 2014 में केंद्रीय सत्ता में आते ही अमित शाह एक साल तक पार्टी को नया रूप देने में लगे रहे। 2014 के लोकसभा चुनाव के छह माह बाद ही अमित शाह ने पार्टी सदस्यता अभियान छेड़ा। इसके साथ ही उन्होंने ‘साथ आएँ, देश बनाएँ’ का नारा दिया। इसके बाद उन्होंने मिस्ड कॉल से सदस्य बनाने की योजना लॉन्च की और सदस्यों की संख्या 3.5 करोड़ से 11 करोड़ तक पहुँचा दी। बाद में शाह ने महासंपर्क अभियान शुरू किया। 

फिर उन्होंने ‘मेरा बूथ सबसे मज़बूत’ कार्यक्रम शुरू किया। बीजेपी ने पश्चिम बंगाल के नक्सबाड़ी से दीनदयाल उपाध्याय विस्तारक योजना नाम से अभियान शुरू किया। लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखकर यह अभियान 95 दिनों के लिए शुरू किया गया था और देश भर में उन 120 सीटों पर फ़ोकस किया गया था जिसपर बीजेपी 2014 के चुनाव में हार गई थी।

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2014 में जीती हुई सीटें हारने की स्थिति में अमित शाह ने 2016 में ही एक और प्लान बनाया था। इसमें क़रीब 115 सीटों को चिन्हित किया गया जिस पर बीजेपी ने अपनी जीत की संभावनाएँ तलाशनी शुरू कर दी थी। 

शाह ने पार्टी के अंदर भी बदलाव लाए। उन्होंने पार्टी में 19 नये विभाग बनाए, ज़िला स्तर पर कार्यालय, कार्यालयों का आधुनिकीकरण और सदस्यता अभियान चलाए। 

तकनीक का इस्तेमाल

बीजेपी ने पिछले पाँच साल से अपने अभियान में तकनीक का ख़ूब इस्तेमाल किया। इसके लिए कॉल सेंटर, जीपीएस वाले रथ, बूथ और स्वयंसेवकों पर नज़र रखने के लिए भी तकनीक का इस्तेमाल किया गया। पार्टी ने 168 कॉल सेंटर बनाए और इसमें 12662 कार्यकर्ता शामिल किए थे। ये सभी कार्यकर्ता फ़ोन पर और सोशल मीडिया से लोगों से संपर्क कर उन्हें पार्टी से जोड़ने का काम करते थे।

सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों को साधा

बीजेपी ने उन 22 करोड़ लोगों को भी साधा जो किसी न किसी सरकारी योजनाओं का लाभ उठा चुके थे। इस पर अमित शाह ने भी एक कार्यक्रम में कहा था कि ऐसे लाभार्थियों तक पहुँचने के लिए बड़ा अभियान चलाया गया था। उन्होंने यह भी कहा था कि मोदी सरकार द्वारा शुरू की गई योजनाओं के लाभार्थियों से ही बीजेपी 300 सीटों के लक्ष्य पा लेगी। अंग्रेज़ी अख़बार ‘इंडियन एक्सप्रेस’ के अनुसार 22 करोड़ में से 6 करोड़ महिलाएँ थीं जिनसे संपर्क किया गया। जिनसे संपर्क किया गया उनमें से 20 फ़ीसदी लाभार्थी दक्षिण भारत के थे। उत्तर प्रदेश में 19 सीटों पर भी फ़ोकस रखा गया। क़रीब 14 करोड़ लोगों को ज़मीनी स्तर पर संपर्क किया गया और छह करोड़ लोगों को फ़ोन और एसएमएस से संपर्क साधा गया। अख़बार के अनुसार, लाभार्थियों से संपर्क करने के लिए सरकारी डाटा का भी इस्तेमाल किया गया। 

2019 के चुनाव अभियान के लिए पार्टी ने लोगों तक पहुँचने के लिए पार्टी सदस्यता अभियान के दौरान मिस्ड कॉल के डाटा का भी इस्तेमाल किया। 

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डिजिटल प्रचार के लिए बड़ा कैडर

बीजेपी ने पहली बार बड़े स्तर पर डिजिटल स्पेस का इस्तेमाल 2014 में किया था जिसमें सोशल मीडिया से लेकर इंटरनेट माध्यम शामिल थे। लेकिन 2019 के चुनाव में पार्टी ने इसके साथ ही बड़ा कैडर भी खड़ा किया। इसी कैडर की सोशल मीडिया पर उपस्थिति बड़े स्तर पर रही। इंडियन एक्सप्रेस ने एक बीजेपी नेता के हवाले से लिखा है कि इस बार डिजिटल माध्यमों से लोगों को जोड़ने के लिए टॉप नेतृत्व शामिल नहीं था और इसके लिए आईटी सेल स्वतंत्र रूप से काम कर रही थी। 

बीजेपी के ‘वार रूम’ ने इस बार डाटा इकट्ठा करने और कैडर को बड़ा करने पर फ़ोकस रखा। इसी डाटा के आधार पर मतदाताओं से संपर्क करने और बीजेपी के पक्ष में मतदान करने के लिए अभियान चलाया गया। हालाँकि कांग्रेस ने भी ऐसा ही अभियान चलाया लेकिन वह बीजेपी का मुक़ाबला नहीं कर सकी। 

अभियान में बीजेपी काफ़ी आगे

डिजिटल माध्यमों से मतदाताओं तक पहुँचने में बीजेपी अपनी प्रतिद्वंद्वी पार्टी कांग्रेस से काफ़ी आगे रही है। बीजेपी ने जहाँ फ़ेसबुक और गूगल से प्रचार पर 21 करोड़ रुपये ख़र्च किए वहीं कांग्रेस ने सिर्फ़ 4.5 करोड़ रुपये ख़र्च किये। बीजेपी आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने हाल ही में कहा था कि बीजेपी के पास क़रीब 12 लाख सोशल मीडिया वालंटियर हैं। जबकि कांग्रेस के पास क़रीब 9 लाख सोशल मीडिया वालंटियर हैं। बीजेपी ने अपने सदस्यता अभियान के दौरान मिले मोबाइल फ़ोन नंबर का इस्तेमाल सोशल मीडिया के माध्यम से उन तक पहुँचने में किया। 2013 से डाटा जुटाने में लगी बीजेपी ने विभिन्न माध्यमों से 25 करोड़ लोगों का डाटा तैयार कर लिया  जो कि बूथ स्तर तक फैले हैं। हालाँकि कांग्रेस ने भी 2018 में अभियान शुरू किया और वह 65 लाख लोगों का डाटा बेस तैयार कर पाई। 

संख्या के मामले में बीजेपी पिछले पाँच सालों में हमेशा कांग्रेस से आगे रही। बीजेपी की जीत में शायद यही बड़ी वजह है। हालाँकि कांग्रेस के सोशल मीडिया प्रमुख डिजिटल प्रचार में बीजेपी से पिछड़ने के पीछे फ़ंड की कमी को बड़ी वजह बताते हैं।

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