भारत की शिक्षा व्यवस्था की हालत हालिया रिपोर्टों में बेहद ख़राब बताई गई है। नीति आयोग की रिपोर्ट मानती है कि सीखने की कमी है, शिक्षक कम हैं, मूल्यांकन कमजोर है। पढ़िए, सतीश झा का विश्लेषण, शिक्षा व्यवस्था का हाल कितना बुरा।
भारत की शिक्षा व्यवस्था की सबसे कठोर सच्चाई अब छुपी नहीं रह सकती। एसर की ताज़ा रिपोर्ट बताती है कि कक्षा पाँच के आधे से ज़्यादा बच्चे कक्षा दो का पाठ नहीं पढ़ पाते और दो‑तिहाई बच्चे साधारण भाग नहीं कर पाते। पाँच साल स्कूल जाने के बाद भी सीखने का हाल यही है।
सरकार ने पहली बार मान लिया है कि सिर्फ़ पहुँच काफी नहीं, सीखने के नतीजे बेहद कमजोर हैं। यह स्वीकारोक्ति ज़रूरी है, पर बहुत देर से आई है और अभी भी अधूरी है।
आज़ादी के बाद भारत ने सोचा था कि शिक्षा की सबसे बड़ी समस्या बच्चों के लिए स्कूलों की कमी थी। इसलिए नीति बनी—स्कूल बनाओ, सीखना अपने‑आप हो जाएगा। स्कूल बने, कानून बने, मिड‑डे मील आया। पंद्रह लाख से ज़्यादा स्कूल और पच्चीस करोड़ बच्चे इस व्यवस्था में शामिल हुए। पर एक सवाल कभी नहीं पूछा गया- स्कूल में बैठा बच्चा सीख भी रहा है या नहीं। यही चूक बाद में पूरी व्यवस्था की नींव बन गई।
74 देशों में भारत का स्थान 72वां
नतीजे सामने हैं। पीसा मूल्यांकन में भारत लगभग सबसे नीचे रहा - 74 देशों में भारत 72 वाँ निकला। अब विश्व बैंक के मानव पूँजी सूचकांक में भारत 174 देशों में 116वें स्थान पर है।
उद्योग जगत की रिपोर्ट बताती है कि इंजीनियरिंग स्नातकों में आधे से कम अपने काम के लायक हैं। यह पहुँच की नहीं, सीखने की विफलता है।
शिक्षा का अधिकार कानून
स्कूल बनाना राजनीतिक रूप से फायदेमंद था- हर स्कूल एक उद्घाटन, हर नामांकन एक सुर्खी, हर मिड‑डे मील एक वोट। ढाँचा दिखता है, सीखना नहीं। कठोर मूल्यांकन राजनीतिक रूप से नुकसानदेह था, क्योंकि इससे साफ़ दिख जाता कि बच्चे सीख नहीं रहे। शिक्षा का अधिकार कानून ने कक्षा आठ तक रोक पर रोक लगाकर जवाबदेही का आख़िरी संकेत भी खत्म कर दिया।नीति आयोग की रिपोर्ट मानती है कि सीखने की कमी है, शिक्षक कम हैं, मूल्यांकन कमजोर है। पर वह यह नहीं पूछती कि भारत की राजनीति में क्या बदले कि सीखना भी उतना ही मायने रखे जितना स्कूल बनाना।
समस्या तकनीकी नहीं है। सिर्फ़ ट्रेनिंग, टैबलेट, नया पाठ्यक्रम—कुछ नहीं बदलेंगे। वियतनाम, दक्षिण कोरिया और एस्टोनिया ने एक राजनीतिक निर्णय लिया—सफलता का पैमाना सबको सीखना होगा और असफलता की कीमत भी देनी होगी। भारत ने अभी तक यह निर्णय नहीं लिया है।
दांव सिर्फ़ शिक्षा का नहीं, देश के भविष्य का है। भारत दुनिया का सबसे युवा देश है। औसत उम्र अट्ठाईस साल। इसे जनसांख्यिकीय लाभ कहा गया, पर लाभ गारंटी नहीं होता। यह एक खिड़की है और यह बंद भी हो जाती है। अगर युवा पढ़े‑लिखे, सक्षम, समस्या‑सुलझाने वाले न हों, तो बड़ी आबादी बोझ बन जाती है।
चीन ने 1990 के बाद यही समझा और कठोर मूल्यांकन तथा शिक्षक जवाबदेही लागू की। आज चीन हर साल विज्ञान‑तकनीक के लाखों स्नातक तैयार करता है। भारत के पास अब ज़्यादा समय नहीं है।
मातृभाषा में शुरुआती शिक्षा अनिवार्य हो
रास्ता साफ़ है—बुनियादी सीखना पढ़ना‑लिखना‑गिनना अटल प्राथमिकता बने। शुरुआती कक्षाओं में नियमित मूल्यांकन हो, छाँटने के लिए नहीं, सुधार के लिए। मातृभाषा में शुरुआती शिक्षा अनिवार्य हो। शिक्षक की गुणवत्ता सबसे निर्णायक तत्व है। लाखों शिक्षक अनुपस्थित या अप्रशिक्षित हैं, लाखों कठिन परिस्थितियों में ईमानदारी से काम कर रहे हैं। दोनों को एक जैसा मानना अन्याय है। सीखने के नतीजे सार्वजनिक हों ताकि व्यवस्था उसी पर केंद्रित हो।
भारत की परीक्षा‑संस्कृति—आईआईटी‑जेईई, बोर्ड, रटंत—सोचने की क्षमता को दबाती है। बच्चा सीखता है कि जो पूछा जाएगा वही याद करो। परीक्षा याददाश्त को पुरस्कृत करती है, बच्चा याद करता है, व्यवस्था इसे सफलता मान लेती है। पर असली चीज़ खो जाती है—सोचना, सवाल करना, तर्क करना, नई समस्या से जूझना। ऐसी शिक्षा ज्ञान पर आधारित अर्थव्यवस्था नहीं बनाती। यह एक विशाल, डिग्री‑धारी लिपिक वर्ग बनाती है, जबकि दुनिया लिपिकीय काम को तेज़ी से स्वचालित कर रही है।
नीति आयोग ने ईमानदारी दिखाई—यह महत्वपूर्ण है। पर समाधान तभी काम करेंगे जब भारत एक कठिन राजनीतिक निर्णय ले—सीखने को मापना, परिणाम सार्वजनिक करना और जवाबदेही तय करना।
भारत के पास एक पीढ़ी का समय है—आज की प्राथमिक कक्षाओं के बच्चे। इसके बाद यह कमी स्थायी हो जाएगी। यह निराशा का कारण नहीं, यह गंभीरता का आह्वान है। बच्चे कक्षा में हैं, अब कक्षा को सीखने से भरना है।