प्रतीकात्मक तसवीर।
क्या एक इंसान और दूसरे के बीच आज छह क़दमों का जो फ़ासला है वही क़ायम रहेगा कि लोग आपस में गले भी लगेंगे? क्या समुदाय-समुदाय के बीच इस दौरान पैदा की गईं दूरियाँ टूटेंगी या फिर वे नंगी और बेज़ान दीवारों में तब्दील हो जाएँगी? क्या हम ज़्यादा बेहतर इंसान होकर इस भट्टी से निकलेंगे या कि बार-बार घरों की ओर लौटकर दरवाज़े-खिड़कियाँ फिर से बंद करने के बहाने ईज़ाद करेंगे?
हम सोच नहीं पा रहे हैं या फिर जान-बूझकर सोचने से कतरा-घबरा रहे हैं कि जब हम सड़कों पर अंततः उतरेंगे तो एक-दूसरे के साथ किस तरह का व्यवहार करेंगे? क्या हम अपने ‘होने’ की ख़ुशी मनाएँगे या फिर वे सब जो हमारे बीच से अनुपस्थित हो गए हैं उनकी याद में एक नयी मोमबत्ती जलाएँगे?