प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस वर्ष चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को उनके जन्म दिवस पर शुभकामना का संदेश नहीं भेजा।
चीनी राष्ट्रपति को जन्मदिन की शुभकामनाएँ ना भेजे जाने पर तो संतोष व्यक्त किया जा सकता है पर आश्चर्य इस बात पर हो सकता है कि प्रधानमंत्री मोदी ने तिब्बतियों के धार्मिक गुरु दलाई लामा को भी उनके जन्म दिवस पर कोई शुभकामना संदेश नहीं भेजा।
तिब्बत में चीनी आधिपत्य के ख़िलाफ़ अहिंसक विद्रोह का नेतृत्व करने के सम्मान स्वरूप दलाई लामा को 1989 में नोबेल शांति पुरस्कार से नवाज़ा गया था।
अगर ऐसा कुछ नहीं है तो इतने भर से भी संतोष प्राप्त किया जा सकता है कि केंद्रीय राज्य मंत्री और अरुणाचल से सांसद किरण रिजिजू द्वारा दलाई लामा को बधाई प्रेषित करके एक औपचारिकता का निर्वाह कर लिया गया। रिजिजू स्वयं भी बौद्ध हैं। पर वर्तमान परिस्थितियों में तो इतना भर निश्चित ही पर्याप्त नहीं कहा जा सकता।
चीन के संदर्भ में हमारी जो कूटनीतिक स्थिति दलाई लामा और उनकी धर्मशाला स्थित निर्वासित सरकार को लेकर है, वही बीजिंग के एक और विरोधी देश ताइवान को लेकर भी है। लेकिन ऐसी स्थिति पाकिस्तान या किसी अन्य पड़ोसी सीमावर्ती देश को लेकर नहीं है।
किसी जमाने में तिब्बत को हम अखंड भारत का ही एक हिस्सा मानते थे (या आज भी मानते हैं) तो वह आख़िर कौन सा तिब्बत है? क्या वह दलाई लामा वाला तिब्बत नहीं है?