राष्ट्रवादी पार्टी के सत्ताधीश दो महीने से मणिपुर में जारी हिंसा और तनाव से बेखबर हैं! प्रधानमंत्री मणिपुर का 'म' भी बोलने का साहस नहीं कर पा रहे हैं। लेकिन दूसरी तरफ चुनावी रैलियों और कार्यक्रमों में आत्म प्रचार के लिए भौंडे डायलॉग बोलने में उनका गला कतई नहीं सूखता। अलबत्ता भावनात्मक मुद्दों को उछालते वक्त नाटकीय अंदाज में उनका गला रुंधता जरूर है!
महात्मा गांधी के गुजरात से आने वाले नरेन्द्र मोदी मणिपुर के विभिन्न समुदायों के बीच जाकर सौहार्द और शांति की अपील क्यों नहीं करते? दरअसल, मोदी की लोकप्रियता महज चुनावी है। कोरोना के समय भयभीत और निर्विकल्प जनता ने मोदी की अपील का पालन किया था। लेकिन मोदी ने आंदोलन कर रहे किसानों से या लॉकडाउन में पैदल चल रहे मजदूरों से अथवा दिल्ली में दंगा प्रभावितों से या नोटबंदी के समय कतारबद्ध लोगों से कभी अपील नहीं की। नरेंद्र मोदी या तो संवेदनहीन हैं या वे जानते हैं कि लोग उनकी बात स्वीकार नहीं करेंगे अथवा हो सकता है कि हिंसा और विभाजन को वे अपनी राजनीति के लिए हितकर मानते हों।
असम, नागालैंड, मिजोरम और म्यांमार से घिरे, 28 लाख की आबादी वाले मणिपुर में बहुसंख्यक मेइती समुदाय उपजाऊ घाटी में रहता है। जबकि 34 मान्यता प्राप्त जनजातियां पहाड़ों पर रहती हैं। 53 फीसदी आबादी वाले मेइती समुदाय के पास 60 सदस्यीय मणिपुर विधानसभा में 40 सीटें हैं। लेकिन 371(ए) द्वारा संरक्षित जनजातियां प्रशासन में मजबूत हैं। समयांतर की रिपोर्ट के अनुसार, 'मेइती के पास राजनीतिक शक्ति है और कुछ कुकी के पास नौकरशाही में सत्ता के संस्थागत पद हैं और वे सत्ता के गलियारों में मौजूद हैं। कुछ मेइती शासक राजनीतिक वर्ग के पास कम शैक्षिक योग्यता है और इसलिए नौकरशाही, जो ज्यादातर कुकियों के कब्जे में है, का पलड़ा भारी है। इसलिए मेइती शासक राजनीतिक वर्ग और कुकी नौकरशाही के बीच तनाव है।'