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मोदी की हताशा, निराशा को दिखाता है राजीव गाँधी पर दिया बयान

जिस तरह के शब्दों का चयन प्रधानमंत्री मोदी ने राजीव गाँधी के लिए किया है वह बेहद अशोभनीय है। वह आदमी जो इस दुनिया में नहीं है, आज अपने पक्ष में कुछ नहीं कह सकता उसके लिये यह भाषा उचित नहीं है। और यहीं पर यह सवाल खड़ा होता है कि आख़िर मोदी निहायत ही घटिया टिप्पणी करने पर क्यों उतर आये हैं? 
आशुतोष

क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लोकसभा का चुनाव हार रहे हैं? यह सवाल काफ़ी लोगों को नागवार गुज़रेगा पर इस सवाल को पूछने का सही वक़्त आ गया है। इसका कारण है मोदी का वह बयान जिसमें वह कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी के पिता राजीव गाँधी पर भद्दी टिप्पणी करते हैं। ऐसी टिप्पणी जिसकी प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे व्यक्ति से उम्मीद नहीं की जाती। मोदी, राहुल गाँधी पर तंज कसते-कसते सारी मानवीय सीमायें लाँघ जाते हैं। एक रैली में वह कहते हैं - ‘आपके पिताजी को आपके राज-दरबारियों ने गाजे-बाजे के साथ मिस्टर क्लीन बना दिया था। लेकिन देखते ही देखते भ्रष्टाचारी नम्बर वन के रूप में उनका जीवनकाल समाप्त हो गया।’ मोदी यह बात बोफ़ोर्स कांड के संदर्भ में कह रहे थे। 

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बोफ़ोर्स कांड में राजीव गाँधी पर आरोप लगा था कि उन्होंने 64 करोड़ की दलाली खायी थी। इस आरोप पर 1989 का चुनाव लड़ा गया और 1984 में चार सौ से अधिक सीटें जीतने वाली कांग्रेस चुनाव हार गयी। राजीव गाँधी सरकार से बाहर हो गये। दलाली का यह आरोप आज तक साबित नहीं हो पाया। अदालत से उन्हें क्लीन चिट मिल गयी। लेकिन बोफ़ोर्स का दाग राजीव गाँधी पर ऐसा चिपका कि फिर कभी नहीं छूटा। 

1991 में राजीव गाँधी की मौत के बाद भी यह कलंक रह-रह कर नेहरू-गाँधी परिवार को सालता रहता है और बीजेपी बोफ़ोर्स की आड़ में कांग्रेस और वह भी ख़ासतौर पर नेहरू-गाँधी परिवार पर तीख़ा से तीख़ा हमला करने से नहीं चूकती। लेकिन मोदी की मौजूदा टिप्पणी एक घटिया टिप्पणी है और यह हिंदू संस्कृति या फिर भारतीय संस्कृति से मेल नहीं खाती। 

अटल बिहारी वाजपेयी की मृत्यु के बाद मेरे कुछ वामपंथी मित्रों ने वाजपेयी पर अभद्र टिप्पणियाँ की थीं। मैंने तब भी इसका सार्वजनिक विरोध किया था। हमारी हिंदू संस्कृति में मरने के बाद व्यक्ति विशेष के ख़िलाफ़ घटिया और निजी टिप्पणी से बचा जाता है। ऐसी टिप्पणियों को ग़लत माना जाता है। 
वैचारिक मतभेद के बावजूद यह कहा जाता है कि निजी टिप्पणियों से बचना चाहिये। आलोचना से कोई नहीं रोकता। पर व्यक्तिगत होकर हमला करना भारतीय परंपरा का हिस्सा नहीं है।
रावण के युद्ध भूमि में खेत रहने के बाद राम ने लक्ष्मण से कहा था कि रावण राजनीति का प्रकांड विद्वान है उससे सीखना चाहिये। यह वही रावण था जिसने राम की पत्नी सीता का हरण किया और लंका में बंधक बना कर रखा था। पर रावण को पराजित करने के बाद राम के मन में कड़वाहट नहीं थी। वह रावण की तारीफ़ कर रहे थे। उन्होंने लक्ष्मण को रावण के पास सीखने के लिये भेजा भी था। परंपरानुसार राम ने बदले की भावना से नहीं बल्कि धर्म के वशीभूत होकर रावण पर हमला किया था और और सीता को छुड़ाया। पर मोदी की टिप्पणी निहायत ही निजी है। वो भी एक मृत आदमी के बारे में। यह टिप्पणी अभद्र है। 

राजीव गाँधी से मैं एक बार मिला हूँ। वह जब राजनीति में आये थे, तब मैं कॉलेज में था। बेहद ख़ूबसूरत व्यक्तित्व के धनी। एक नौजवान शख़्स। पायलट थे। राजनीति में कभी नहीं आना चाहते थे। छोटे भाई संजय गाँधी की असमय मौत के बाद माँ इंदिरा के आग्रह को वह टाल नहीं पाये। तब सोनिया गाँधी ने राजीव के राजनीति में आने का पुरज़ोर विरोध किया था। 

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सोनिया की जीवनी लेखिका रानी सिंह ने सोनिया के हवाले से लिखा - “राजीव और मेरे बीच में तनाव था। मैं चीते की तरह लड़ी - उनके लिये, अपने लिये और अपने बच्चों के लिये, उस ज़िंदगी के लिये जो हमने मिल कर बनायी थी, उनकी उड़ान जिसे वह प्यार करते थे, हमारी साधारण सी, सामान्य सी दोस्ती और सबसे बड़ी बात हमारी अपनी आजादी : वह सामान्य सा मानवाधिकार जिसे हमने बड़े जतन से सहेज कर रखा था।” 
सोनिया ने राजीव को राजनीति में जाने से रोकने की बहुत कोशिश की पर अंत में जब उन्होंने देखा कि राजीव गाँधी माँ इंदिरा और उनके बीच बुरी तरह से बिख़र गये हैं तो मजबूरन उन्हें राजनीति में जाने का राजीव का फ़ैसला मानना पड़ा।
सोनिया और राजीव दोनों जानते थे कि राजनीति वह दलदल है जो उनकी ज़िंदगी तबाह कर देगा। दोनों ही सामान्य जीवन जीना चाहते थे। संजय अगर जीवित होते तो राजीव कभी राजनीति में नहीं आते लेकिन नियति को कुछ और ही मंज़ूर था। राजीव केवल अपनी माँ की मदद करने राजनीति में आये थे लेकिन 1984 में सिख आतंकवादियों की गोली का निशाना बनने के बाद राजीव प्रधानमंत्री भी बने। 

राजीव गाँधी को जो प्यार देश की जनता ने दिया और जिस तरह से उनको हाथों-हाथ लिया वैसा बहुत कम राजनेताओं को नसीब होता है। यहाँ तक कि जब राजीव प्रधानमंत्री बनने के बाद पहली बार अमेरिका गये थे तो अमेरिकी जनता ने उनकी तुलना जान एफ़ कैनेडी से की थी। तब किसे मालूम था कि कैनेडी की तरह राजीव भी असमय मौत का शिकार हो जाएँगे। 

भारत में कंप्यूटर क्रांति लाने वाले राजीव गाँधी की सबसे बड़ी दिक़्क़त यह थी कि वह राजनीति में आने के बाद भी राजनीति के दाँवपेच नहीं सीख पाये। उनके क़रीबियों ने उनके साथ धोखा किया। अरुण नेहरू जैसे कुटिल लोगों ने उनसे उलटे-पुलटे फ़ैसले करवाये और अंत में पीठ में छुरा घोपकर वीपी सिंह के साथ चल दिये। बोफ़ोर्स तोप में दलाली का आरोप बड़ा हो गया और राजीव गाँधी उससे उबर नहीं पाये। 
1989 में राजीव चुनाव हार गये। वीपी सिंह बेहद चालाक नेता थे। उन्होंने अपने मित्रों के ज़रिये मीडिया में राजीव गाँधी की मिस्टर क़्लीन इमेज पर दाग लगवाये और देखते-देखते देश को यक़ीन हो गया कि राजीव गाँधी ने बोफ़ोर्स में दलाली खायी है।
वीपी सिंह, जो हर चुनावी रैली में कहते थे कि उनके पास उस खाते का नंबर है जिसमें बोफ़ोर्स का पैसा जमा है, प्रधानमंत्री बनने के बाद कभी भी काग़ज़ का एक टुकड़ा सबूत के तौर पर पेश नहीं कर पाये और न ही वाजपेयी की अगुवाई में बनी एनडीए सरकार यह साबित कर पायी कि राजीव गाँधी ने दलाली के पैसे खाये।
राजीव की मौत एक बड़ा हादसा थी। तमिल आतंकवादी संगठन लिबरेशन टाइगर्स ऑफ़ तमिल ईलम (लिट्टे) के आत्मघाती दस्ते ने 1991 के बीच चुनाव में राजीव गाँधी की हत्या कर दी। मोदी इस हत्या का ज़िक्र कर रहे हैं जब वह कहते हैं कि राजीव भ्रष्टाचारी नंबर एक के तौर पर मरे। जब राजीव की मौत हुई तब उनपर भ्रष्टाचार के आरोप थे। पर इस घटना के तीस साल बाद जबकि कुछ भी साबित नहीं हो पाया है, तब इन शब्दों का प्रयोग करना देश के प्रधानमंत्री को शोभा नहीं देता। 
सबसे बड़ी बात यह कि जिस तरह के शब्दों का चयन मोदी ने किया है वह तो और भी अशोभनीय है। वह एक साथ न केवल राजीव गाँधी को भ्रष्टाचारी बता रहे हैं बल्कि उनकी मौत का भी मजाक उड़ा रहे हैं। नहीं, मोदी जी, आपकी भाषा न केवल ग़लत है बल्कि घटिया भी है।
लेकिन मोदी अपने विरोधियों के लिये ऐसी निचले स्तर की भाषा का इस्तेमाल करने के लिये मशहूर रहे हैं। कांग्रेस नेता शशि थरूर की पत्नी सुनंदा पुष्कर को एक समय उन्होंने चालीस करोड़ की गर्लफ़्रेंड कहा था। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को ‘एके-49’ कह कर पुकारा था। लेकिन वह आदमी जो इस दुनिया में नहीं है, आज अपने पक्ष में कुछ नहीं कह सकता उसके लिये यह भाषा उचित नहीं है। और यहीं पर यह सवाल खड़ा होता है कि आख़िर मोदी निहायत ही घटिया टिप्पणी करने पर क्यों उतर आये हैं? 
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पहली बात तो यह समझ में आती है कि राहुल गाँधी ने जिस तरह से रफ़ाल पर मोदी को घेरा और “चौकीदार चोर है” का नारा घर-घर पहुँचा दिया, उसने मोदी की छवि को भारी झटका दिया है। उससे वह अंदर से बहुत आहत हैं। मोदी जैसे नेता आत्ममुग्ध होते हैं। वह अपने ख़िलाफ़ एक शब्द नहीं सुन सकते। उनकी पार्टी बीजेपी में और मीडिया में बहुत कम लोग हैं जो उन पर टिप्पणी कर सकें। ऐसे में राहुल का रफ़ाल पर मोदी को लपेटना और दिन-रात यह कहना कि “चौकीदार चोर है” यानी मोदी चोर है, मोदी के लिये इसे बर्दाश्त कर पाना असह्य हो रहा होगा। लिहाज़ा बदले में राहुल को अंदर से आहत करने के लिये उन्होंने उनके पिता पर ही घटिया टिप्पणी कर दी। यह एक मनोवैज्ञानिक कारण हो सकता है। पर यूपी की इस रैली में उनके दूसरे बयानों को देखें तो बात और साफ़ हो जाती है। 
मोदी ने कहा, “मेरी छवि को ख़राब कर, मुझे छोटा साबित कर ये लोग एक अस्थिर और कमजोर सरकार देश में बनाना चाहते हैं।” उनके इस बयान से स्पष्ट है कि वह अपनी छवि पर लगे दाग से परेशान हैं और उन्हें लग रहा है कि यह उनके लिये घातक हो सकता है। यानी वह चुनाव हार भी सकते हैं।
मोदी लोगों को डरा रहे हैं कि अगर वह हारे तो देश में एक कमजोर सरकार आयेगी। जो ज़्यादा दिन नहीं चलेगी। आत्मविश्वास से भरा नेता कभी भी चुनाव के मौक़े पर इस तरह की भाषा का प्रयोग नहीं करता।
2014 में मोदी आत्मविश्वास से लबरेज़ थे। देश को कैसे आगे ले जाना है, उसको समस्याओं से कैसे मुक्त कराना है, वह ये विजन रख रहे थे। पर पाँच सालों का उनका रिकार्ड बेहद कमजोर है, अपने कार्यकाल के आधार पर वह जनता को लुभा नहीं सकते, उनका आत्मविश्वास डिगा हुआ है लिहाज़ा वह ऐसी भाषा बोल रहे हैं जो विश्वास की भाषा नहीं है। ये भाषा निराशा की भाषा है। एक हताश नेता की भाषा है। उनकी हताशा उनके एक और बयान से पता चलती है। 

1 मई को मोदी मध्य प्रदेश के होशंगाबाद में एक रैली में बोल रहे थे। इस दौरान वह बोलते-बोलते बोल गये - “सोचिये, कांग्रेस वालों को आपके मोदी से इतनी नफ़रत हो गयी है कि वे मोदी को मारने तक के सपने देखने लगे हैं।” अपनी मौत का ज़िक्र कोई नेता तभी करता है जब वह अंदर से बुरी तरह से बेचैन हो, उद्विग्न हो और उसे जनता का दिल जीतने या वोट लेने के लिये कोई और रास्ता या उपाय न सूझ रहा हो। 

नेता जब हारने लगते हैं तो अक़सर या तो वे माफ़ी माँगने लगते हैं या फिर ये कहते फिरते हैं कि यह उनका आख़िरी चुनाव है। नेताओं को जनता को भावनात्मक तरीक़े से ब्लैकमेल करने का यह सबसे कारगर हथियार लगता है, ख़ासतौर पर उन नेताओं को जो जनता में लोकप्रिय रहे हों।
मोदी निसंदेह लोकप्रिय नेता हैं और थे पर क्या यह लोकप्रियता उनको दुबारा प्रधानमंत्री बनायेगी, यह लाख टके का प्रश्न है। यह हार का डर ही है जो उनके मुँह से ऐसी भाषा निकलवा रहा है जो उन्हें नहीं कहनी चाहिये। पर वह देश के प्रधानमंत्री हैं, ऐसे में उन्हें कौन सलाह दे सकता है। मेरे जैसा आदमी तो सिर्फ़ उनकी मन:स्थिति का आकलन ही कर सकता है। जो मैं कर रहा हूँ। और इस आधार पर कह सकता हूँ कि अगर उन्होंने अपने आपको और पार्टी को नहीं संभाला तो 23 मई को नतीजे उनके ख़िलाफ़ भी जा सकते हैं। राजीव गाँधी वाली टिप्पणी उनके चेहरे का आइना है और उस पर लिखी इबारत आसानी से पढ़ी जा सकती है।
आशुतोष
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