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आयोग की तारीफ़ की, फिर ‘जनादेश से छेड़छाड़’ पर चिंता जताई प्रणव मुखर्जी ने

पूर्व राष्ट्रपति और कई मंत्रालयों का कामकाज संभाल चुके प्रणव मुखर्जी फ़िलहाल सुर्खियों में हैं। लोकसभा चुनाव ‘बिल्कुल सही तरीके से संपन्न कराने’ के लिए चुनाव आयोग की पीठ थपथपाने के अगले ही दिन उन्होंने ‘लोगों के जनादेश के साथ कथित छेड़छाड़’ पर चिंता जताई है।  

ऐसे समय में जब चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं और ज़्यादातर बड़े राजनीतिक दल सत्तारूढ़ दल की मदद करने का आरोप चुनाव आयोग पर लगा रहे हैं, मुखर्जी का बयान बेहद महत्वपूर्ण है। ऐसा इसलिए है कि वह पूर्व राष्ट्रपति हैं और इसलिए भी कि वह लंबे समय तक उस कांग्रेस पार्टी से जुड़े रहे हैं, जिसने आयोग पर सबसे तीखे हमले किए हैं।
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उन्होंने मंगलवार को एक बयान जारी कर कहा, ‘मैं मतदाताओं के जनादेश से कथित छेड़छाड़ पर चिंतित हूँ। चुनाव आयोग के पास जो ईवीएम हैं, उनकी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी आयोग की ही है।’

इस बात की कोई गुंजाईश ही नहीं होनी चाहिए कि अटकलबाजी हमारे लोकतंत्र की बुनियाद को ही चुनौती दे। लोगों का जनादेश पवित्र है और यह किसी भी तरह के रत्ती भर संदेह से परे ही रखा जाना चाहिए। इस मुद्दे पर संस्थागत विश्वसनीयता बरक़रार रखना चुनाव आयोग का दायित्व है। वह हर तरह के शक को दूर करे।


प्रणव मुखर्जी, पूर्व राष्ट्रपति

चुनाव आयोग की तारीफ़

लेकिन ठीक एक दिन पहले यानी सोमवार को उन्होंने ठीक इसके उलट बात कही थी। एक पुस्तक का विमोचन करते हुए पूर्व राष्ट्रपति ने देश के पहले मुख्य चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन की चर्चा की और कहा, ‘आप मुख्य चुनाव आयुक्तों की आलोचना नहीं कर सकते। चुनाव बिल्कुल सही तरीके से संपन्न कराए गए हैं।’

इसके ठीक एक दिन पहले कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने कहा था कि ‘चुनाव आयोग ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने घुटने टेक दिए हैं। अब न तो चुनाव आयोग से कोई डरता है और न ही कोई उसका सम्मान करता है।’

प्रणव मुखर्जी राहुल गाँधी के नज़दीक थे, उनसे काफ़ी सीनियर रहे हैं। वह राहुल की माँ सोनिया, पिता राजीव और दादी इंदिरा गाँधी के भी काफ़ी नज़दीक रह चुके हैं। मुखर्जी मनमोहन सिंह सरकार में वित्त मंत्री थे और उन्हें राष्ट्रपति सोनिया गाँधी ने ही बनवाया था।
प्रणव मुखर्जी ने जो कुछ कहा, उसके राजनीतिक निहितार्थ हैं, यह तो बिल्कुल साफ़ है। एक पूर्व राष्ट्रपति को इस तरह की बातें कहनी चाहिए या नहीं, इस पर सवाल उठ सकता है।

रणनीतिक चाल?

इसी तरह प्रणव मुखर्जी सांप्रदायिक समझे जाने वाले संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के निमंत्रण पर उसके कार्यक्रम में भाग लेने चले गए थे। वह उस समय तक राष्ट्रपति पद से हट चुके थे। उस समय भी इस पर सवाल उठे थे। ख़ुद मुखर्जी ने अपने राजनीतिक कैरियर में आरएसएस की एक नहीं कई बार तीखी आलोचना की थी। उन्होंने लोकसभा में भी बोलते हुए आरएसएस पर हमला बोला था और उसे सांप्रदायिक क़रार दिया था। उनकी बेटी शर्मिष्ठा मुखर्जी तक ने उनकी आलोचना की थी।  

मुखर्जी के ताज़ा बयान पर कुछ लोग अचरज में हैं। पर्यवेक्षकों का कहना है कि पूर्व राष्ट्रपति को चुनाव आयोग की इस तरह तारीफ़ नहीं करनी चाहिए थी, ख़ास कर तब जब पूरे देश में उसकी निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं। समझा जाता है कि इसके बाद इस बयान से दूरी बनाने और संतुलन कायम करने के लिए उन्होंने मंगलवार को बयान जारी किया। उन्हें जानने वाले कहा करते थे कि प्रणव बाबू कुछ भी यूँ नहीं कह देते हैं, वह सोच समझ कर बोलते हैं और उनकी हर बात के पीछे कोई सोची समझी योजना या रणनीति होती है।

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