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कमलेश मर्डर: डीजीपी बोले, आतंकी संगठन का हाथ होने से इनकार नहीं

हिंदू नेता कमलेश तिवारी की हत्या के मामले में पुलिस ने कहा है कि इस घटना में किसी आतंकवादी संगठन का हाथ होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। जबकि तिवारी की हत्या के अगले दिन जब पुलिस ने मामले का ख़ुलासा किया था तो डीजीपी ओपी सिंह ने इस घटना का किसी भी आतंकवादी संगठन से कोई भी संबंध नहीं होने की बात कही थी। तब डीजीपी ने कहा था कि कमलेश तिवारी के 2015 में पैगंबर साहब को लेकर दिये गये एक बयान के बाद ये लोग भड़क गये थे और इसीलिए इन्होंने हत्या को अंजाम दिया था। हत्यारों ने तिवारी को जिस बर्बरता के साथ मारा था, उससे यह ज़रूर लग रहा था कि हत्या के पीछे कोई बड़ा कारण ज़रूर रहा होगा। तिवारी की गला रेतकर हत्या की गई थी और उनके शरीर पर चाकू के कई घाव थे और उन्हें गोली भी मारी गई थी। 

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लेकिन अब डीजीपी ओपी सिंह ने पत्रकारों से बातचीत में कहा है कि इस घटना का क्या किसी आतंकवादी संगठन से कोई संबंध है या नहीं, इस एंगल से भी पुलिस मामले की जाँच कर रही है। यह पूछे जाने पर कि क्या तिवारी की हत्या आतंकवादी घटना भी हो सकती है, ओपी सिंह ने कहा, ‘आतंकवादी घटनाओं में भी कई तरह के मॉड्यूल्स होते हैं, एक सेल्फ़ मोटिवेटेड मॉडयूल होता है, एक स्लीपिंग मॉड्यूल होता है या किसी आतंकवादी संगठन से भी जुड़े होने का भी मॉड्यूल होता है, इसलिए किसी भी तरह की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।’ 

हत्यारे तिवारी के घर के पास ही एक होटल में रुके हुए थे और वहाँ से उनके खून लगे भगवा कुर्ते, चाकू बरामद हुआ था। हत्यारे बेहद शातिर थे और भगवा कुर्ते पहनकर तिवारी के पास आये थे।

तिवारी के विवादित बयान के बाद बिजनौर के एक मौलाना अनवारुल हक़ ने कमलेश का सिर कलम करने पर 51 लाख रुपये का इनाम घोषित किया था। पुलिस ने तिवारी की हत्या के बाद हक़ को हिरासत में लेकर उससे पूछताछ की थी। तिवारी की पत्नी किरन की ओर से भी बिजनौर के दो मौलानाओं के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज कराई गई थी। 

उस समय देश में कई जगहों पर मुसलमानों ने तिवारी के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया था। तत्कालीन यूपी सरकार ने तिवारी पर रासुका लगा दिया था हालांकि हाई कोर्ट ने इसे बाद में हटा दिया था। 

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तिवारी की हत्या के बाद पुलिस ने इस मामले में गुजरात पुलिस के द्वारा दो साल पहले दायर की गई चार्जशीट को भी खंगाला था। चार्जशीट के मुताबिक़, कुख्यात आतंकवादी संगठन आईएसआईएस के दो आतंकवादियों कासिम स्तिमबरवाला और ओबेद मिर्ज़ा ने पुलिस को बताया था कि वे तिवारी की हत्या करने की योजना बना रहे थे। पुलिस ने इन दोनों को अक्टूबर, 2017 में गिरफ़्तार किया था। 

पुलिस ने इस मामले में मौलाना मोहसिन शेख, फ़ैज़ान और राशिद अहमद खुर्शीद पठान को हिरासत में लिया है और नागपुर से सैयद आसिम अली नाम के एक और शख़्स को नागपुर से गिरफ़्तार किया है। 

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अशफाक़ शेख और फरीद पठान उर्फ मोइनुद्दीन।
कमलेश तिवारी के हत्याकांड को अंजाम देने वाले मोइनुद्दीन और अशफाक़ पर ढाई-ढाई लाख रुपये का ईनाम घोषित किया है। दोनों हत्यारे फरार हैं और यूपी पुलिस की टीमें उनकी तलाश में पड़ोसी राज्यों व नेपाल तक छापे मार रही हैं। 
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सुरक्षा को लेकर उठ रहे सवाल 

तिवारी की हत्या के बाद से ही उनके परिवार की ओर से कहा जा रहा है कि उनकी सुरक्षा कम कर दी गई थी। तिवारी की माँ कुसुम तिवारी ने कहा था कि अखिलेश यादव की सरकार में उनके बेटे को 17 सुरक्षाकर्मी मिले हुए थे जबकि योगी सरकार के आते ही इनकी संख्या को घटाकर 4 कर दिया गया था। हैरानी की बात यह है कि जिस दिन तिवारी की हत्या हुई, उस दिन सिर्फ़ एक सुरक्षाकर्मी उनके घर पर मौजूद था और जिस तरह हत्यारे घर में घुसकर हत्या करके निकल गए, उससे तिवारी की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े हुए। ख़ुद तिवारी ने कई बार उनकी सुरक्षा को बढ़ाये जाने की माँग को लेकर प्रदर्शन किया था। इसे लेकर यूपी सरकार पर उठ रहे सवालों का जवाब प्रदेश के उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने दिया है। 

मौर्य ने कहा है, ‘जब मामला तनावपूर्ण था तो तिवारी को ज़्यादा सुरक्षा दी गई थी और उनके पास दो गनर थे जबकि विधायक के पास एक ही गनर होता है। यह उस तरह का मामला नहीं है कि जब किसी पर हमला होता है और सुरक्षाकर्मी उसे रोकने में विफल रहते हैं। यह किसी के पीठ में छुरा घोपने जैसा है। तिवारी एक हिम्मती व्यक्ति थे।’ 

तिवारी की हत्या के तीन दिन बाद बाद यूपी पुलिस के मुखिया का यह बयान निश्चित रूप से बेहद गंभीर है। क्योंकि इन तीन दिनों में पुलिस को काफ़ी अहम जानकारियाँ मिल चुकी हैं और वह जाँच में काफ़ी आगे बढ़ चुकी है। लेकिन किसी आतंकवादी संगठन से इस हत्या के तार जुड़े हैं या नहीं, इसका पता हत्यारों के गिरफ़्तार होने के बाद ही चलेगा। 

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