शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने अपना 10 दिवसीय विरोध प्रदर्शन समाप्त कर प्रयागराज माघ मेला 2026 से बुधवार 28 जनवरी 2026 को विदा ले ली। पवित्र स्नान किए बिना ही, उन्होंने योगी सरकार के लिए एक कड़ा संदेश देते हुए प्रस्थान किया।
संगम की रेती पर आयोजित वार्षिक माघ मेले में पिछले 10 दिनों से जारी गतिरोध बुधवार 28 जनवरी 2026 को खत्म हो गया। ज्योतिष्पीठ के स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने अपना अनशन समाप्त कर प्रयागराज से प्रस्थान करने का निर्णय लिया है। हालांकि, उनका यह प्रस्थान किसी विजय के साथ नहीं, बल्कि प्रशासन के प्रति गहरे असंतोष और तीखे सवालों के साथ हुआ है। यह घटना हिन्दुत्व राजनीति और सनातन के इतिहास में दर्ज हो गई है, जहां किसी शंकराचार्य को स्नान किए बिना ही जाने दिया गया।
18 जनवरी को मौनी अमावस्या के मुख्य स्नान पर्व पर शुरू हुआ यह विवाद बुधवार को उस समय चरम पर पहुँच गया जब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने बिना गंगा स्नान किए ही मेला क्षेत्र छोड़ने का ऐलान कर दिया। उन्होंने अपने शिविर के बाहर खड़े होकर समर्थकों और मीडिया को संबोधित करते हुए कहा:
"हम बिना स्नान किए यहाँ से विदा ले रहे हैं। न्याय की परीक्षा कभी समाप्त नहीं होती। आज हम यहाँ से जा रहे हैं, लेकिन अपने पीछे सत्य की गूूँज और कुछ प्रश्न छोड़कर जा रहे हैं।"
विवाद की शुरुआत 18 जनवरी को हुई थी जब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपनी पालकी और समर्थकों के साथ संगम स्नान के लिए जा रहे थे। मेला प्रशासन ने अत्यधिक भीड़ और सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए उन्हें पालकी से उतरकर पैदल जाने का अनुरोध किया। इस दौरान पुलिस और स्वामी के शिष्यों के बीच तीखी झड़प और धक्का-मुक्की हुई। स्वामी का आरोप था कि पुलिस ने उनके शिष्यों के साथ दुर्व्यवहार किया और उन्हें उनके धर्मसम्मत 'राजसी स्नान' के अधिकार से वंचित किया।
इसके विरोध में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने उसी स्थान पर धरना शुरू कर दिया था जहाँ उन्हें रोका गया था। उन्होंने अन्न-जल त्याग कर अनशन शुरू किया और प्रशासन से माफी की मांग की। उन्होंने आरोप लगाया कि यह राज्य के सीएम योगी आदित्यनाथ के इशारे पर हो रहा है। बीजेपी के कई नेताओं ने बयान देकर शंकराचार्य को इस तरह रोके जाने पर आपत्ति की। कुछ ने समझौते का प्रयास किया।
योगी सरकार पर आरोप
अनशन के दौरान विवाद तब और गहरा गया जब माघ मेला प्राधिकरण ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को दो कारण बताओ नोटिस जारी किए:
- शंकराचार्य पद का इस्तेमाल: प्रशासन ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने आदेशों का हवाला देते हुए पूछा कि वह किस आधार पर 'शंकराचार्य' की पदवी का उपयोग कर रहे हैं।
- व्यवस्था में बाधा: दूसरे नोटिस में उन पर मौनी अमावस्या के दिन बैरिकेडिंग तोड़ने और भगदड़ जैसी स्थिति पैदा करने का आरोप लगाया गया।
शंकराचार्य के समर्थकों और खुद अविमुक्तेश्वरानंद का आरोप है कि यह दांवपेंच उन्हें परेशान करने के लिए किया गया।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के प्रस्थान के समय मेला क्षेत्र में भारी सुरक्षा बल तैनात रहा। उनके समर्थकों में भारी आक्रोश देखा गया, लेकिन स्वामी ने शांति बनाए रखने की अपील की। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे भले ही अभी जा रहे हैं, लेकिन उनके द्वारा उठाए गए धार्मिक मर्यादा और संतों के सम्मान के प्रश्न प्रशासन और सरकार का पीछा करते रहेंगे।
विपक्ष, विशेषकर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने भी इस मुद्दे पर सरकार को घेरा है और इसे सनातन परंपरा का अपमान बताया है। अब देखना यह होगा कि स्वामी के इस 'अधूरे स्नान' और प्रशासन के सख्त रुख का आने वाले दिनों में क्या धार्मिक और राजनीतिक असर पड़ता है।