एनसीईआरटी और सुप्रीम कोर्ट
अदालत के अपमान की तो सज़ा है, लेकिन ज्ञान के अपमान की सुनवाई के लिए किस अदालत के पास जाएँ? यह सवाल तब से मन में उठ रहा है जब से सुना कि सर्वोच्च न्यायालय ने एन सी ई आर टी को हुक्म दिया है कि वह कक्षा 8 की समाज विज्ञान की किताब को वापस ले। इस स्कूली किताब में एक अध्याय भारत की न्याय व्यवस्था पर है जिसमें न्यायपालिका में भ्रष्टाचार की चर्चा है। ‘इण्डियन एक्सप्रेस’ में 25 फ़रवरी को खबर छपी कि एन सी ई आर टी की कक्षा 8 की किताब में ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ और भारी तादाद में ‘मुक़दमों का लंबित रहना’ न्याय के रास्ते में बड़ी चुनौतियाँ हैं।इस खबर पर मुख्य न्यायाधीश ने अगले ही दिन एन सी ई आर टी और सरकार को लाइन हाज़िर किया। किताब पर पाबंदी लगा दी गई। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि इस अध्याय के ज़रिए लोगों की निगाह में अदालत को बदनाम करने की साज़िश की जा रही है। एक तरह से न्यायपालिका पर गोली दागी गई है और वह लहूलुहान है। न्यायमूर्तियों के क्रोध की कोई सीमा न थी।
न्यायालय के इस कोप का आतंक कितना था, यह इससे मालूम होता है कि प्रधानमंत्री तक ने इस अध्याय पर नाराज़गी ज़ाहिर की।शिक्षा मंत्री ने बयान दिया। एन सी ई आर टी ने हाथ जोड़कर माफी माँगी। किताब की छपी हुई प्रतियों की शायद लुगदी बना दी गई हो! जो बिकी थीं, उन्हें किसी तरह वापस हासिल करने के आदेश जारी किए गए हैं।
अदालत का ग़ुस्सा लेकिन ठंडा नहीं हुआ। उसने इस किताब को तैयार करने वाले लोगों को आगे इस तरह के किसी काम से अलग करने के आदेश जारी किए। इसका नतीजा उन लोगों के लिए निश्चय ही अच्छा न होगा। संभवतः अदालत के डर से वे संस्थान भी उन्हें निकाल बाहर कर दें, जहाँ वे काम कर रहे हैं। किताब पर पाबंदी और फिर उसके निर्माताओं पर प्रतिबंध क्यों चिंता का कारण है, इस पर गौतम भाटिया (https://tinywebs.info/5vNq0I; https://shorturl.at/n5wHM ) और अनमोल जैन ने ( https://shorturl.at/AkP4H ) लिखा है। उन्होंने कुछ बुनियादी और जायज़ सवाल उठाए हैं, मसलन क्या अदालत किताब या व्यक्तियों पर पाबंदी लगा सकती है और यह कितना संविधान सम्मत है। उन्होंने इस फ़ैसले पर जो फ़िक्र ज़ाहिर की है, उसपर विचार करना ही होगा।
बाक़ी सारे मामलों पर अपने फ़ैसले को हर तिकड़म और तर्क से जायज़ ठहरानेवाली सरकार ने इस बार अदालत से कोई बहस नहीं की। बल्कि संघीय सरकार की तरफ़ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सर्वोच्च न्यायालय को बतलाया कि सरकार ने एन सी ई आर टी को आदेश दिया है कि वह प्रत्येक कक्षा की पाठ्यपुस्तकों की पूरी समीक्षा करे। यह समीक्षा विषय -विशेषज्ञों से करवाई जानी चाहिए, ऐसा सरकार ने कहा है। हमें इस समीक्षा समिति के विषय में कुछ भी मालूम नहीं। क्या वह सिर्फ़ क़ानून की नज़र से किताबों की समीक्षा करेगी? क्या वह मात्र न्यायविदों की समिति होगी?
मुझे यह कहने में उज्र नहीं कि पिछले 12 सालों में यह पहला मौक़ा है जब मुझ जैसे लोग सॉलिसिटर जनरल मेहता की बात से कुछ सहमत होना चाहते हैं। लेकिन हम फिर ख़ुद से सवाल करते हैं कि हमारी यह सहमति मौक़ापरस्त है या उसका कोई सैद्धांतिक आधार है? क्यों हम तुषार मेहता के इस आश्वासन में एक संभावना देखते हैं और क्यों उससे पूरी तरह सहमत होने में हमें हिचक हो रही है?
हम अदालत से यह कहना चाहते हैं कि मसला सिर्फ़ कक्षा 8 की किताब के एक अध्याय मात्र का नहीं है। यह बात हम उनसे भी कहना चाहते हैं जो यह कह रहे हैं कि अध्याय में कुछ भी ग़लत नहीं लिखा है। प्रश्न अदालत में भ्रष्टाचार पर केंद्रित इस अध्याय मात्र का नहीं।उसमें जो लिखा है, उसके सही-गलत होने का नहीं।प्रश्न है किताब की पूरी योजना का। सिर्फ़ इस एक किताब नहीं बल्कि सारी किताबों की योजना का सवाल है।
जिन विशेषज्ञों ने इस किताब को तैयार किया है या उनकी निगरानी की है, उन्होंने ही समाज विज्ञान की बाक़ी किताबों की प्रक्रिया का निर्देशन भी किया है। क्या उन पर ध्यान नहीं दिया जाना चाहिए कि उनमें क्या गड़बड़ी की गई है?
यह पहली बार नहीं है कि ‘इण्डियन एक्सप्रेस’ ने एन सी ई आर टी की किताबों के बारे में कुछ लिखा हो। इसके पहले उसने इतिहास की किताबों के बारे में लिखा। विज्ञान की किताबों के बारे में लिखा। अंग्रेज़ी की किताबों के बारे में लिखा। उसने राजनीति विज्ञान की किताबों के बारे में लिखा। पिछले 4 साल में इस अख़बार ने लगभग इन किताबों पर 7 बार बड़ी रिपोर्टिंग की। लेकिन हमारी अदालतों का ध्यान उनपर नहीं गया। हालाँकि हर बार इस देश के बड़े इतिहासकारों, राजनीति शास्त्रियों, गणितज्ञों, वैज्ञानिकों और शिक्षाविदों ने एन सी ई आर टी की नई किताबों की गुणवत्ता पर चिंता ज़ाहिर की। क्यों अदालतें उनकी चिताओं के प्रति उदासीन रहीं? क्यों हमारे देश में विद्वानों की चिंता का कोई मोल नहीं?
मसलन, वह भारत का किस क़िस्म का इतिहास होगा जिसमें मुग़लों के ज़िक्र को सिर्फ़ सूचनाओं तक सीमित कर दिया जाए? या दिल्ली सल्तनत को प्रायः ग़ायब कर दिया जाए? या बाबरी मस्जिद के ध्वंस, 2002 की गुजरात की हिंसा, महात्मा गांधी की हत्या के प्रसंग को उड़ा दिया जाए? इतिहास को हिंदुत्ववादी नज़रिए से लिखने से हिंदुत्व की विचारधारा का प्रचार तो होगा लेकिन विद्यार्थियों की इतिहास की समझ तो नहीं विकसित होगी। फिर इतिहास की किताबों की समीक्षा क्यों न की जाए?
उसी तरह अगर समाजशास्त्र या राजनीति विज्ञान की किताबें जाति के बारे में बात नहीं करेंगी तो विद्यार्थियों को भारतीय समाज की कौन सी समझ हासिल होगी? उसी प्रकार अगर किताबों से सामाजिक या राजनीतिक आंदोलनों का ज़िक्र हटा दिया जाएगा तो जनतंत्र में जनता की भागीदारी के बारे में समझ कैसे बनेगी? इन किताबों की भी जांच क्यों न की जाए?
अगर विज्ञान की किताब से पीरियॉडिक टेबल या डारविन के विकासवाद के सिद्धांत को हटा दिया जाए, तो विज्ञान की समझ का क्या होगा? यही समस्या हिंदी या अंग्रेज़ी की किताबों के साथ है।संस्कृत की किताब से पंडिता रमाबाई का अध्याय क्यों ग़ायब हो गया? इन किताबों को समीक्षा के दायरे से बाहर क्यों रखा जाए?
आप इतिहास को छोड़ दें, भूगोल की किताब पर ध्यान दें। भारत की भूमि को पवित्र भूगोल कहने से भूगोल की कैसी समझ बनती है?
असल समस्या यह है कि एन सी ई आर टी की नई किताबें हिंदुत्ववादी राष्ट्रवाद के विचार को स्थापित करने के नज़रिए से तैयार करवाई गई हैं। इसलिए इतिहास की किताबों को तो सबसे अधिक नुक़सान हुआ है लेकिन समाजशास्त्र या राजनीति विज्ञान और विज्ञान या दूसरे विषयों की किताबें भी बची नहीं हैं।
अदालत को अपने अपमान पर उपजे क्रोध का शमन करके यह देखने की ज़रूरत है कि क्या एन सी ई आर टी ने किताबें अलग-अलग विषयों के मान्य विशेषज्ञों से लिखवाई हैं या हिंदुत्ववादी विचारधारा के प्रचारकों के निर्देशन में? क्या वे पाठ्यपुस्तकें उन विषयों के अनुशासन का पालन करती हैं? क्या वे विद्यार्थियों की उम्र के हिसाब से ज़रूरतों का ध्यान रखती हैं? स्कूली किताबों को तैयार करते समय जिन शिक्षाशास्त्रीय सिद्धांतों को ध्यान में रखा जाना चाहिए, क्या इन किताबों में वह समझ दिखलाई पड़ती है?
स्कूली किताबें सिर्फ़ सूचनाओं का भंडार नहीं हैं। गणित हो या भूगोल, साहित्य हो या विज्ञान, इन किताबों का काम है विद्यार्थियों में उन विषयों की समझ विकसित करने में उनकी मदद करना। किताबें शासक दल की विचारधारा के प्रचार का साधन नहीं हैं। वे सरकारों की योजनाओं की प्रचार सामग्री भी नहीं हैं।उनकी जिम्मेवारी किसी भी दूसरी किताब के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा है।
आज की स्कूली किताबें इनके पहले 2005 की स्कूली पाठ्यचर्या के अनुसार बनाई गई किताबों के मुक़ाबले पिछड़ी हुई हैं। असल चिंता की बात यह है। अदालत को इसीलिए ऐसे शिक्षाविदों की एक समिति बनानी चाहिए जिनके ध्यान में विद्यार्थी और ज्ञान का हित हो, न कि किसी सरकार या विचारधारा का हित।