पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले राज्य की मतदाता सूची में किए गए 'विशेष गहन संशोधन' (Special Intensive Revision - SIR) के चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। चुनाव आयोग द्वारा की गई इस विवादित प्रक्रिया में कुल 90 लाख मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं। 'द हिंदू' द्वारा बूथ स्तर के आंकड़ों के विश्लेषण से पता चला है कि हटाए गए नामों में 63% हिंदू और 34% मुस्लिम मतदाता हैं। हिंदू मतदाताओं में दलित मतुआ ज्यादा प्रभावित हुए हैं।

क्या बताते हैं आंकड़े  

  • कुल हटाए गए नाम: 90 लाख 
  • हिंदू मतदाता: 57.47 लाख (कुल कटौती का 63%) 
  • मुस्लिम मतदाता: 31.1 लाख (कुल कटौती का 34%)
यह आंकड़े इसलिए महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं क्योंकि 2011 की जनगणना के अनुसार राज्य में मुस्लिम आबादी 27% है, जबकि मतदाता सूची से उनके नाम हटाने की दर 34% रही है, जो उनकी जनसंख्या के अनुपात से अधिक है। वहीं, हिंदू आबादी 70.54% है, जबकि नाम उड़ाने की दर 63% है। हालांकि इनमें से बहुत सारे नाम मृत लोगों, पता बदलने वाले, दस्तावेज पेश न करने वाले हो सकते हैं। लेकिन किसी ने चुनाव आयोग में चैलेंज नहीं किया है। इसीलिए चुनाव आयोग इसे वास्तविक आंकड़ा बता रहा है।
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मतुआ दलित बहुल क्षेत्रों में भारी कटौती

द हिन्दू की रिपोर्ट के अनुसार, भारत-बांग्लादेश सीमा से सटे उन निर्वाचन क्षेत्रों में हिंदुओं के नाम बड़ी संख्या में काटे गए हैं जहाँ 'मतुआ' समुदाय का दबदबा है। मतुआ दलित हिंदू (नमोशूद्र) समुदाय का एक हिस्सा हैं, जो बड़ी संख्या में बांग्लादेश से विस्थापित होकर आए हैं। भाजपा ने इन्हें नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के तहत नागरिकता देने का वादा किया था। मतुआ समुदाय पर इसी रिपोर्ट में आगे पूरी जानकारी दी जाएगी।
  • उत्तर 24 परगना (बागदा सीट): यहाँ 50,230 नाम हटाए गए, जिनमें 46,826 हिंदू और 3,264 मुस्लिम थे।
  • बोंगों उत्तर: 42,164 नाम हटाए गए, जिसमें 37,101 हिंदू और 4,310 मुस्लिम शामिल थे।
  • जंगलमहल क्षेत्र: झाड़ग्राम जैसे जिलों में जहाँ मुस्लिम आबादी बहुत कम है, वहाँ करीब 94% हटाए गए नाम हिंदुओं के हैं। बांकुरा में यह आंकड़ा 91% और पुरुलिया में 88% है।

मुस्लिम बहुल जिलों के आंकड़े

एसआईआर के दौरान 60 लाख नामों को न्यायिक अधिकारियों द्वारा जांच (Adjudication) के दायरे में रखा गया था। 6 अप्रैल को इस प्रक्रिया के अंत में 27 लाख और नाम हटा दिए गए। लेकिन न्यायिक अधिकारी जहां एसआईआर के लिए अधिकृत थे, वहां सबसे अधिक कटौती मुस्लिम बहुल जिलों में देखी गई। 
  • मुर्शिदाबाद: यहाँ 11.01 लाख नाम जांच के लिए भेजे गए थे, जिनमें से 4.55 लाख नाम काट दिए गए।
  • मालदा और उत्तर 24 परगना: यहाँ भी न्यायिक प्रक्रिया के दौरान क्रमशः 2.39 लाख और 3.25 लाख नाम हटाए गए।
  • भबानीपुर और नंदीग्राम जैसे हाई-प्रोफाइल निर्वाचन क्षेत्रों में भी मुस्लिम मतदाताओं की कटौती हिंदुओं की तुलना में अधिक रही।

मतदाताओं की संख्या में बड़ी गिरावटः अक्टूबर 2025 में SIR प्रक्रिया शुरू होने से पहले राज्य में 7.66 करोड़ मतदाता थे। अब, मतदान से मात्र दो सप्ताह पहले, पश्चिम बंगाल में कुल मतदाताओं की संख्या घटकर 6.75 करोड़ रह गई है। यह 2021 के विधानसभा चुनाव के समय उपलब्ध 7.34 करोड़ मतदाताओं से भी काफी कम है।

क्या दलित मतुआ समुदाय को धोखा मिला

कई वर्षों तक, भाजपा का बंगाल के मतुआ शरणार्थियों के साथ संबंध एक ही वादे पर टिका था - पार्टी का समर्थन करें और उनकी नागरिकता को लेकर लंबे समय से चली आ रही अनिश्चितता दूर हो जाएगी। लेकिन चुनाव आयोग के एसआईआर के बाद जारी अंतिम मतदाता सूची ने उस वादे को भगवा पार्टी की सबसे बड़ी कमजोरी में बदल दिया है। नदिया और उत्तर 24 परगना जिलों में मतुआ समुदाय के लाखों नामों को हटाए जाने से शरणार्थी हिंदू बहुल क्षेत्र में भाजपा के खिलाफ सुगबुगाहट देखी जा रही है। हालांकि 2019 से बंगाल में भाजपा को इस इलाके से भारी समर्थन मिलता रहा है।
नामाशूद्र समुदाय से संबंधित मतुआ लोग दलित हैं। इसकी स्थापना हरिचंद ठाकुर ने 19वीं शताब्दी में वर्तमान बांग्लादेश में की थी। उत्पीड़न से बचने और बेहतर जीवन की तलाश में लाखों मतुआ समुदाय के लोग वर्षों से भारत में आकर बसते रहे हैं। इनमें से कई तो बांग्लादेश के अस्तित्व में आने से पहले ही आ चुके थे।

कोलकाता की 11 सीटों पर SIR ने समीकरण बिगाड़ा

SIR के तहत मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने से कोलकाता की सभी 11 विधानसभा सीटों पर राजनीतिक समीकरण बिगड़ने की आशंका जताई जा रही है। हर सीट पर हटाए गए मतदाताओं की संख्या 2024 के लोकसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) या भाजपा के नेतृत्व वाले अंतर से कहीं ज्यादा है। टीएमसी के मजबूत वोट बैंक मुस्लिम, महिलाएं और गरीब वर्ग के अधिकांश मतदाताओं के नाम एसआईआर में कटे हैं। ऐसे में सत्तारूढ़ पार्टी के कई मजबूत गढ़ अचानक कमजोर पड़ सकते हैं।
2024 लोकसभा चुनाव में कोलकाता की इन 11 विधानसभा सीटों में से टीएमसी 9 पर आगे रही थी, जबकि भाजपा 2 पर। आंकड़ों के अनुसार चौरंगी सीट पर 80,000 से ज्यादा मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं। तीन अन्य सीटों पर 70,000 से ज्यादा, एक पर 60,000 से ज्यादा, दो पर 50,000 से ज्यादा और बाकी चार सीटों पर 40,000 से ज्यादा मतदाता हटाए गए हैं। सबसे कम माणिकतला में हटाए गए, जहां 42,603 नाम कटे।
टीएमसी ने भबानीपुर (मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का क्षेत्र) से 2024 में 8,297 वोटों के अंतर से बढ़त बनाई थी। इस बार भाजपा के भारी भरकम नेता सुवेंदु अधिकारी यहां चुनाव लड़ने वाले हैं। भबानीपुर में 48,680 मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं। टीएमसी ने कोलकाता पोर्ट, राशबिहारी, बालिगंज, चौरंगी, एंटली, बेलेघाटा, माणिकतला और काशीपुर-बेलगाछिया सीटों पर भी बढ़त बनाई थी। इनमें से चार सीटों पर अंतर 10,000 वोट से कम था:
  • राशबिहारी- 1,691 वोट
  • भबानीपुर- 8,297 वोट
  • माणिकतला- 3,575 वोट
  • काशीपुर-बेलगाछिया- 7,268 वोट
पांचों सीटों पर हटाए गए अधिकांश मतदाता मुस्लिम समुदाय के हैं, जो पिछले कई चुनावों में टीएमसी को वोट देते रहे हैं। ऐसे में इन सीटों पर टीएमसी के लिए खतरा बढ़ गया है। बाकी चार सीटों पर टीएमसी की बढ़त 25,000 वोट से ज्यादा थी, लेकिन वहां भी हटाने की संख्या बहुत बड़ी है, इसलिए पार्टी खुद को पूरी तरह सुरक्षित नहीं मान रही है।

कोलकाता पोर्ट से टीएमसी ने लोकसभा में 42,893 वोटों से बढ़त बनाई थी, लेकिन यहां 77,125 मतदाता हटाए गए, जिनमें 70 प्रतिशत से ज्यादा मुस्लिम हैं।बेलेघाटा में टीएमसी की 46,112 वोटों की बढ़त अब 66,019 नाम हटाने के कारण खतरे में है। यहां भी बड़ी संख्या में अल्पसंख्यक मतदाता प्रभावित हुए हैं।

SIR से बीजेपी भी थोड़ा सा प्रभावित

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि नामों का कटना दोनों तरफ असर डाल सकता है, इसलिए भाजपा को भी आराम नहीं है। 2024 में भाजपा ने श्यामपुकुर से 1,599 वोटों और जोरासंको से 7,401 वोटों से बढ़त बनाई थी। इन दो सीटों पर क्रमशः 44,693 और 76,524 मतदाताओं के नाम कटे हैं। पर्यवेक्षक के अनुसार, इन सीटों पर हिन्दी भाषी हिंदू मतदाताओं के नाम ज्यादा कटे हैं, जो 2024 में मुख्य रूप से भाजपा को वोट देते थे। इसलिए भाजपा को भी इन सीटों पर चिंता है।
कुल मिलाकर, कोलकाता की इन 11 सीटों में SIR के कारण सियासी लड़ाई और रोचक हो गई है। दोनों प्रमुख दलों के गढ़ प्रभावित हुए हैं, जिससे 2026 के विधानसभा चुनाव में कई सीटें कड़ी टक्कर वाली बन सकती हैं।
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ममता का आरोप- 300 ननों के नाम SIR में उड़ाए

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का आरोप है कि एसआईआर के बाद मिशनरी ऑफ चैरिटी से जुड़ी कम से कम 300 ननों के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं। उत्तर 24 परगना के बोंगाँव में एक रैली को संबोधित करते हुए बनर्जी ने कहा, “मैं बहुत दुखी हूँ। पूरी दुनिया ने इसकी निंदा की है। क्या आप जानते हैं कि मदर टेरेसा (अब सेंट टेरेसा) की मिशनरी ऑफ चैरिटी से 300 नाम हटा दिए गए हैं? भारत सेवाश्रम संघ और रामकृष्ण मिशन से जुड़े भिक्षुओं के नाम भी हटा दिए गए हैं। किसी को भी नहीं बख्शा गया है।” इस मामले पर बोलते हुए एक नन ने कहा, “यह सच है कि मिशनरी ऑफ चैरिटी की बड़ी संख्या में ननों के नाम हटा दिए गए हैं। हालांकि, हम तुरंत सटीक संख्या नहीं बता सकते।”
मुख्यमंत्री ने भाजपा पर 90 लाख नाम जानबूझकर हटवाने का आरोप लगाया है और इसे डराने-धमकाने की राजनीति करार दिया है।भाजपा का कहना है कि यह मतदाता सूची को स्वच्छ करने और बांग्लादेशी "अवैध घुसपैठियों" को हटाने की एक आवश्यक प्रक्रिया थी।