बंगाल के क़रीब 25 विधानसभा क्षेत्रों में हिंदी भाषी और बिहार-उत्तर प्रदेश के प्रवासी मतदाताओं की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। कोलकाता और बंगाल के औद्योगिक क्षेत्रों में हिंदी भाषी लोगों की अच्छी खासी आबादी है। इनमें से ज्यादातर बिहार और उत्तर प्रदेश से जाकर बंगाल में स्थायी रूप से बस गए हैं। 2011 की जनगणना के मुताबिक बंगाल में हिंदी भाषी प्रवासियों की संख्या करीब 65 लाख थी। इस समय यह संख्या एक करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है। 2021 के विधानसभा चुनावों के पहले टीएमसी ने कहा था कि बंगाल में करीब 70 लाख हिंदी भाषी मतदाता हैं। अब यह संख्या 80 लाख के ऊपर होने का अनुमान है। 2014 के लोकसभा चुनावों के बाद से हिंदी भाषी मतदाताओं में बीजेपी के लिए रुझान देखा गया। 2017 में उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार बनने और नीतीश कुमार के एनडीए में लौटने के बाद बंगाल के प्रवासी हिंदी भाषियों में बीजेपी की पकड़ मज़बूत होने लगी।

मतदाताओं को लेकर आरोप-प्रत्यारोप

बंगाल में मतदाता सूची की विशेष जांच यानी एसआईआर पर विवाद के पीछे सांप्रदायिक के साथ साथ एक भाषाई रंग भी चर्चा में है। एक तरफ़ बीजेपी आरोप लगाती रही है कि विधानसभा चुनावों के लिए मतदाता सूची तैयार करते समय टीएमसी ने बिहार और उत्तर प्रदेश से आए हिंदी भाषी प्रवासी मतदाताओं का नाम कटवा दिया था। तो दूसरी तरफ़ टीएमसी के कई नेता कहते रहे हैं कि बीजेपी ने चुनाव आयोग से मिलकर मुस्लिम मतदाताओं का नाम हटा दिया। मुस्लिम मतदाताओं में हिंदी - उर्दू बोलने वाले भी शामिल हैं। इस विवाद का एक बड़ा कारण हिंदी भाषी मतदाताओं को रिझाना है।
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शॉट गन का वार

तृणमूल कांग्रेस और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने हिंदी भाषियों के बीच बीजेपी की बढ़ती पैठ को जल्दी ही पहचान लिया और 2022 में आसनसोल लोकसभा के उप चुनाव में फ़िल्म अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा को मैदान में उतार दिया। शत्रुघ्न इसके पहले बीजेपी में थे और 2009 और 2014 में बिहार के पटना साहिब सीट से बीजेपी के टिकट पर चुनाव जीत चुके थे। वो अपनी राजनीतिक उपेक्षा के कारण पार्टी से नाराज़ चल रहे थे। आसनसोल सीट बंगाली गायक बाबुल सुप्रियो के इस्तीफ़ा से खाली हुई थी। बाबुल, केंद्रीय मंत्रिमंडल से हटाए जाने के बाद बीजेपी छोड़कर टीएमसी में शामिल हो गए थे।

शत्रुघ्न ने बीजेपी को तीन लाख से ज़्यादा वोटों से हरा कर एक रिकॉर्ड बना दिया। इस जीत के बाद शत्रुघ्न, बंगाल में टीएमसी का बिहारी/हिंदीभाषी चेहरा बन गए। 2024 के लोक सभा चुनावों में बीजेपी ने उनके ख़िलाफ़ भोजपुरी गायक और अभिनेता पवन सिंह को खड़ा करने की कोशिश की। लेकिन पवन मैदान छोड़ कर निकल गए। बाद में बीजेपी ने पूर्व केंद्रीय मंत्री एस एस अहलूवालिया को उनके ख़िलाफ़ उतारा लेकिन शत्रुघ्न जीतने में कामयाब रहे। अहलूवालिया पंजाब से हैं लेकिन उत्तर प्रदेश से लोकसभा चुनाव जीत चुके हैं।

आसनसोल उन क्षेत्रों में शामिल है जहां बिहारी और हिंदीभाषी मतदाताओं की अच्छी खासी आबादी है। हिंदी भाषियों को लुभाने के लिए ममता बनर्जी ने अपनी पार्टी के हिंदी सेल को मज़बूत किया।

हिंदी सेल के अध्यक्ष का कहना है कि बंगाल के 25 विधान सभा क्षेत्रों में हिंदी भाषियों की स्थिति मजबूत है और टीएससी ने 9 हिंदी भाषियों को टिकट दिया है। बीजेपी ने कितने हिंदी भाषियों को टिकट दिया है, इसके आँकड़े उपलब्ध नहीं है।

बीजेपी बनाम ‘बारगी’

ममता बनर्जी के विधान सभा क्षेत्र भबानीपुर में भी हिंदी भाषी मतदाता अमह है। बीजेपी ने उनके ख़िलाफ़ शुभेंदु अधिकारी को खड़ा कर हिंदी भाषी आधार पर भी चोट करने की कोशिश की है। शुभेंदु मज़दूरों के नेता रहे हैं, जिनमें हिंदी भाषियों की अच्छी तादाद रही है। कोलकाता में ही सबसे ज़्यादा हिंदी भाषी, क़रीब 16 प्रतिशत हैं। कोलकाता को ममता का गढ़ बनाने में हिंदी भाषियों की भूमिका अहम रही है। बीजेपी बांग्लादेशी घुसपैठियों को मुद्दा बना कर हिंदी भाषियों को भी लुभाने की कोशिश करती है। जिसके जवाब में ममता, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह सहित बीजेपी को ‘बारगी’ कहती रही है।
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बंगाल में बारगी यानी बाहरी लोग का एक ख़ास मतलब होता है। जिस दौर में मराठी राजाओं की सेना बंगाल को लूटने जाती थी उसी दौर में ये ‘बारगी’ शब्द प्रचलित हुआ। इसका आशय मराठी लुटेरा शासकों से था। जिसका उपयोग ममता बंगाली मतदाताओं को बीजेपी से डराने के लिए करती हैं। लेकिन बिहारी या हिंदी भाषी मतदाताओं को बारगी नहीं कहा जाता। कोलकाता के अलावा बर्धमान (13%), उत्तर 24 परगना (13%), जलपाईगुड़ी (12%), हावड़ा (9%), उत्तर दिनाजपुर (8%) और हुगली में (7%) हिंदी भाषी मतदाता हैं। आसनसोल- दुर्गापुर के कोयला क्षेत्रों में भी हिंदी भाषी बसे हुए हैं। चुनाव प्रचार में योगी आदित्यनाथ को उतार कर बीजेपी हिंदू एजेंडा के साथ-साथ हिंदी एजेंडा भी चला रही है। लेकिन ममता का हिंदी सेल और शत्रुघ्न सिन्हा की लोकप्रियता इसका जवाब है।