ईरान युद्ध और होर्मुज़ स्ट्रेट में जारी तनाव के बीच दुनिया की प्रमुख शक्तियों के बीच मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं। एक तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप सहयोगियों पर दबाव बना रहे हैं, वहीं जर्मनी, फ्रांस और चीन ने अलग-अलग रुख अपनाकर संकट को यूएस के लिए और मुश्किल भरा बना दिया है। ट्रंप के प्रमुख मित्र देशों ने साफ इंकार कर दिया कि वे अपने युद्धपोत होर्मुज में नहीं भेज सकते। नाटो देशों को लेकर जर्मनी का बहुत स्पष्ट बयान आ गया है कि इसमें नाटो की कोई भूमिका नहीं है। जर्मनी भी अपने युद्धपोत भेजने से मना कर दिया है।
जर्मनी ने सोमवार को स्पष्ट कहा कि होर्मुज़ जलमार्ग की सुरक्षा में NATO की कोई भूमिका नहीं है। ब्रसेल्स में यूरोपीय संघ के विदेश मंत्रियों की बैठक से पहले जर्मन विदेश मंत्री Johann Wadephul ने कहा कि जर्मनी NATO को इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग की जिम्मेदारी संभालने के नज़रिए से नहीं देखता। हालांकि होर्मुज की नाकेबंदी के लिए जिम्मेदार लोगों पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है। यह बयान ट्रंप की उस चेतावनी के बाद आया है, जिसमें ट्रंप ने कहा था कि अगर नाटो गठबंधन मदद नहीं करता तो NATO का भविष्य “बहुत खराब” हो सकता है। बता दें कि ट्रंप ने सबसे पहले मित्र देशों से युद्धपोत भेजने की अपील की थी। लेकिन मित्र देश पसीजे नहीं। सबसे पहले इटली, ऑस्ट्रेलिया, जापान ने स्पष्ट रूप से घोषणा की- वे अपने जंगी जहाज़ नहीं भेजेंगे। इन देशों को अमेरिका का प्रमुख सहयोगी माना जाता है। मित्र देशों से जब उत्साहजनक जवाब नहीं आया तो ट्रंप ने नाटो देशों की ओर धमकी भरा रुख किया।

फ्रांसः मैक्रो ने ईरान के राष्ट्रपति बात की, हमले रोकने को कहा

फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रो ने ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजिश्कियान से फोन पर बात कर क्षेत्र में हमलों को तुरंत रोकने की मांग की। मैक्रों ने कहा कि ईरान द्वारा क्षेत्रीय देशों पर सीधे या प्रॉक्सी के जरिए हमले “नामंजूर” हैं। उन्होंने कहा कि अनियंत्रित सैन्य बढ़त पूरे क्षेत्र को अराजकता में धकेल रही है, जिसका खामियाजा आम लोगों को भुगतना पड़ रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि स्थायी शांति के लिए नया राजनीतिक-सुरक्षा ढांचा जरूरी है, जिसमें यह सुनिश्चित किया जाए कि ईरान परमाणु हथियार हासिल न करे और उसकी बैलिस्टिक मिसाइल गतिविधियों पर नियंत्रण हो। हालांकि फ्रांस अपने युद्धपोत होर्मुज में न भेजने की घोषणा पहले ही कर चुका है।

चीन ने ट्रंप को दिया ठंडा जवाब

इसी बीच चीन ने भी ट्रंप के उस प्रस्ताव पर स्पष्ट समर्थन नहीं दिया जिसमें उन्होंने बीजिंग से होर्मुज़ समुद्री रास्ते को फिर से खोलने में मदद करने की शर्त रखी थी। ट्रंप ने यहां तक संकेत दिया कि यदि चीन मदद का आश्वासन नहीं देता तो वे चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ प्रस्तावित शिखर बैठक टाल सकते हैं। लेकिन चीन पर ट्रंप के इस बयान का कोई असर नहीं हुआ। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने इस सवाल को ही टाल दिया। उधर, विशेषज्ञों का कहना है कि चीन पर ऊर्जा संकट का असर सीमित है क्योंकि उसने वर्षों से तेल स्टोरेज बढ़ाया है। आयात स्रोतों में विविधता लाया है। खुद पवन, सौर और इलेक्ट्रिक वाहनों जैसे स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र में भारी निवेश किया है। इस बीच
ईरान ने कहा है कि होर्मुज से उन टैंकरों को गुजरने की अनुमति दी जाएगी, अगर वे तेल व्यापार का भुगतान चीनी करंसी युआन में करते हैं। ईरान के इस बयान से चीन की करंसी को डॉलर के मुकाबले बढ़त मिलेगी। चीन इससे गदगद है।

ट्रंप का साथ नहीं देने वाले प्रमुख देश

जापानः जापान ने साफ कहा कि फिलहाल होर्मुज़ में नौसैनिक एस्कॉर्ट मिशन भेजने की कोई योजना नहीं है। इसके पीछे संवैधानिक और राजनीतिक सीमाएं बताई गई हैं।
ऑस्ट्रेलियाः ऑस्ट्रेलिया ने भी ट्रंप की अपील के बावजूद युद्धपोत भेजने से इनकार किया। उसने क्षेत्र में सीमित हवाई सहायता और रक्षा सहयोग पर ही जोर दिया।
ब्रिटेनः ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ने सीधे युद्धपोत भेजने से बचते हुए ड्रोन और तकनीकी सहायता तक सहयोग सीमित रखा। लंदन सैन्य टकराव बढ़ने के जोखिम से बचना चाहता है।
फ्रांसः फ्रांस ने भी ट्रंप की सैन्य गठबंधन वाली मांग पर सावधानीपूर्ण रुख अपनाया और सीधे अमेरिकी नेतृत्व वाले मिशन में शामिल होने से दूरी बनाई। फ्रांस अधिक व्यापक यूरोपीय या रक्षात्मक मिशन की बात कर रहा है।
जर्मनीः जर्मनी ने कहा कि NATO होर्मुज़ की जिम्मेदारी नहीं लेगा। जर्मनी के चांसलर और विदेश मंत्री ने होर्मुज में जर्मनी की सैन्य भूमिका को लेकर संदेह जताया।
दक्षिण कोरिया (अनिर्णय की स्थिति): दक्षिण कोरिया ने भी अभी तक युद्धपोत भेजने पर कोई स्पष्ट प्रतिबद्धता नहीं दी है।
चीन (रणनीतिक दूरी): ट्रंप ने चीन से भी मदद मांगी, लेकिन बीजिंग ने सीधे सैन्य सहयोग का संकेत नहीं दिया और कूटनीतिक रास्ते पर जोर दिया।
कनाडाः कनाडा के प्रधानमंत्री कार्नी ने कहा कि कनाडा अपने युद्धपोत नहीं भेजेगा।
इटलीः सबसे पहले इटली ने ही ईरान-इसराइल युद्ध में न पड़ने को लेकर बयान दिया था।
स्विटज़रलैंडः इस देश ने युद्धपोत भेजने से मना ही नहीं किया, बल्कि अपना एयरस्पेस यूएस सैन्य गतिविधियों के लिए बंद कर दिया।
स्पेनः स्पेन ने सबसे पहले ईरान पर यूएस-इसराइल हमले की निन्दा की। स्पेन ने इसराइल के राजदूत को जाने के लिए कहा।

वैश्विक तेल संकट और कूटनीतिक दबाव

ईरान द्वारा होर्मुज समुद्री मार्ग को बंद करने से दुनिया की लगभग 20% तेल आपूर्ति प्रभावित हुई है, जिससे कीमतों में उछाल और ऊर्जा संकट की आशंकाएं बढ़ गई हैं। ब्रेंट क्रूड ऑयल सोमवार 16 मार्च को 105 डॉलर पर है। ट्रंप ने फ्रांस, जापान, दक्षिण कोरिया और ब्रिटेन सहित कई देशों से होर्मुज की सुरक्षा में सहयोग की अपील की थी। हालांकि तमाम सहयोगियों ने युद्धपोत भेजने से इनकार कर दिया है। चीन, जो ईरान का बड़ा रणनीतिक साझेदार और उसके तेल का प्रमुख खरीदार है, युद्ध में सीधे शामिल होने से बचता दिख रहा है। उसने एक तरफ तत्काल युद्धविराम की मांग की है तो दूसरी तरफ ईरान के पड़ोसी देशों पर हमलों की आलोचना भी की है।

ट्रंप की कमजोर होती स्थिति

विश्लेषकों का कहना है कि ईरान युद्ध लंबा खिंचने से ट्रंप को घरेलू स्तर पर ईंधन कीमतों और महंगाई के कारण राजनीतिक विरोध झेलना पड़ रहा है। इसके अलावा, अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले में उनके एकतरफा टैरिफ लगाने के अधिकार को सीमित किए जाने से चीन के साथ व्यापार वार्ता में उनकी स्थिति भी कमजोर हुई है।
होर्मुज़ जल संकट ने एक बार फिर दिखा दिया है कि वैश्विक शक्तियों के हित अलग-अलग हैं। जर्मनी NATO को दूर रखना चाहता है, फ्रांस ईरान पर दबाव बना रहा है और चीन रणनीतिक दूरी बनाकर स्थिति का आकलन कर रहा है। इस बीच ऊर्जा आपूर्ति, युद्ध की आशंकाएं और कूटनीतिक तनाव मिलकर वैश्विक अर्थव्यवस्था और सुरक्षा व्यवस्था पर बड़ा असर डाल सकते हैं।