ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत के बाद अमेरिका और इसराइल परिवर्तन की उम्मीद कर रहे थे। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ हवाई हमले से सत्ता परिवर्तन संभव नहीं है।
ईरान में मौजूदा टॉप लीडर की बैठक जारी है
अमेरिका और इसराइल के संयुक्त हवाई हमलों में खामेनेई की मौत ने ईरान की सत्ता व्यवस्था को सबसे बड़ा झटका दिया है। नया नेतृत्व आने में समय लग रहा है। हालांकि तेहरान में नेतृत्व परिवर्तन की प्रक्रिया तेज कर दी गई है। वहां टॉप लीडरशिप के बीच बैठकों के दौरा जारी हैं। ईरान में अमेरिका-इसराइल की उम्मीद के विपरीत भारी तादाद में जनता सड़कों पर आकर इस हमले का विरोध कर रही है। छोटे कस्बों से लेकर बड़े शहरों तक में अमेरिका-इसराइल विरोधी प्रदर्शन हो रहे हैं। खामेनेई ने 1989 में सुप्रीम लीडर का पद संभाला था, जब इस्लामी क्रांति के नेता अयातुल्ला रुहोल्लाह खुमैनी का निधन हुआ था। खुमैनी ने अमेरिका समर्थित शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी के खिलाफ इस्लामिक क्रांति का नेतृत्व किया था।
क्या ट्रंप का आकलन गलत था, जबकि उन्हें समझाया गया था
अमेरिकी अभियान की मूल धारणा यह थी कि सुप्रीम लीडर की मौत के बाद ईरान की शासन व्यवस्था कमजोर पड़ जाएगी। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने CBS News को दिए फोन इंटरव्यू में दावा किया कि उन्हें “ठीक-ठीक पता है” कि तेहरान में अब फैसले कौन ले रहा है और नए सुप्रीम लीडर के लिए “अच्छे उम्मीदवार” मौजूद हैं। हालांकि उन्होंने कोई नाम नहीं बताया। लेकिन यूएस के सैन्य विश्लेषकों ने इस आकलन पर सवाल उठाए हैं। अमेरिका के पूर्व डिप्टी असिस्टेंट सेक्रेटरी ऑफ डिफेंस माइकल मुलरॉय ने कहा कि केवल हवाई हमलों से “रिजीम चेंज” संभव नहीं है। उन्होंने कहा- “आप सिर्फ एयर स्ट्राइक से सत्ता परिवर्तन नहीं करा सकते। ईरान में जब तक कोई अमेरिका-इसराइल के खिलाफ बोलने के लिए जिंदा है, तब तक वहां शासन व्यवस्था मौजूद है।”ईरान की ‘दोहरी सैन्य व्यवस्था’ बनी ताकत
विश्लेषकों के मुताबिक ईरान की व्यवस्था इसलिए टिकाऊ मानी जाती है क्योंकि उसकी सुरक्षा केवल नियमित सेना पर निर्भर नहीं है। इसके साथ-साथ: इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC), जो समानांतर शक्तिशाली सैन्य बल है।
दूसरे नंबर पर बसीज (Basij) है। हर मोहल्ले में फैली अर्धसैनिक स्वयंसेवी मिलिशिया। ये संस्थाएं ‘विलायत-ए-फक़ीह’ (इस्लामी जुरिस्ट का संगठन) प्रणाली की रक्षा के लिए संवैधानिक रूप से प्रतिबद्ध हैं और आंतरिक विरोध को कुचलने के लिए प्रशिक्षित हैं।अंतरिम नेतृत्व परिषद का गठन
तेहरान स्थित विश्लेषक हुसैन रॉयवरान के अनुसार हमलों में देश की शीर्ष सुरक्षा परत को बड़ा नुकसान हुआ है। खामेनेई के करीबी सलाहकार और नवगठित सुप्रीम डिफेंस काउंसिल के सचिव अली शामखानी मारे गए हैं। ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सचिव अली लारिजानी ने घोषणा की है कि जल्द ही नेतृत्व परिवर्तन की प्रक्रिया शुरू होगी।
उन्होंने कहा: जल्द अंतरिम नेतृत्व परिषद बनाई जाएगी। इसमें राष्ट्रपति, न्यायपालिका प्रमुख और गार्जियन काउंसिल का एक धर्मगुरु शामिल होगा। अगला सुप्रीम लीडर चुने जाने तक यही परिषद जिम्मेदारी संभालेगी। तेजी से परिषद बनाने की तैयारी से संकेत मिलता है कि ईरान की व्यवस्था के खामेनेई की मौत के बाद चीजों को उन्हीं के अनुसार आगे बढ़ाने के लिए सक्रिय हो गई है।।
मिडिल ईस्ट स्ट्रैटेजिक स्टडीज सेंटर के शोधकर्ता अब्बास असलानी के मुताबिक ईरानी अधिकारी हालात को नियंत्रण में लेने की कोशिश कर रहे हैं। उनके अनुसार: इन हमलों में तेहरान समेत कई शहरों की सैन्य और सुरक्षा ढांचे को निशाना बनाया गया। आगे और हमले तेज होने की आशंका है। आम ईरानी व्यापक युद्ध नहीं चाहते। लेकिन इसके साथ ही ईरानी अधिकारी अमेरिका और इज़राइल को कड़ी चेतावनी दे रहे हैं
धर्मतंत्र से राष्ट्रवादी नैरेटिव की ओर झुकाव
खामेनेई की मौत के बाद सबसे बड़ा बदलाव ईरान के आधिकारिक नैरेटिव में दिख रहा है। सरकार अब संघर्ष को केवल धार्मिक नेतृत्व की रक्षा नहीं, बल्कि ईरान की क्षेत्रीय अखंडता की लड़ाई बताने लगी है। अली लारीजानी ने चेतावनी दी कि इसराइल का अंतिम लक्ष्य ईरान का “विभाजन” है। विश्लेषकों के मुताबिक: इससे धर्मनिरपेक्ष ईरानियों को भी लामबंद करने की कोशिश। विपक्ष को बाहरी दुश्मन के खिलाफ एकजुट करने की रणनीति अमेरिका की संभावित जनविद्रोह वाली उम्मीदों को झटका। राजनीतिक समाजशास्त्री सालेह अल-मुतैरी का कहना है कि 40 दिन के राष्ट्रीय शोक की घोषणा विपक्ष के लिए “फ्यूनरल ट्रैप” साबित हो सकती है, क्योंकि सड़कों पर लाखों शोकाकुल समर्थकों की मौजूदगी विरोध प्रदर्शनों की गति धीमी कर सकती है।स्ट्रैटेजिक पेशेंस’ का दौर खत्म?
तेहरान विश्वविद्यालय के प्रोफेसर हसन अहमदियन का कहना है कि खामेनेई के साथ ही ईरान की “स्ट्रैटेजिक पेशेंस” नीति भी खत्म हो गई है। उन्होंने कहा- “ईरान ने जून 2025 के युद्ध से सबक लिया है- संयम को कमजोरी समझा जाता है।” उनके मुताबिक नई रणनीति अधिक आक्रामक हो सकती है और “स्कॉर्च्ड अर्थ” (सब कुछ जला देने) जैसी प्रतिक्रिया संभव है।अल जज़ीरा सेंटर फॉर स्टडीज के शोधकर्ता लिक़ा मक्की के अनुसार, भले ही ईरान नामक सांप का “फन” (ट्रंप ने यही कहा है) कुचल दिया गया हो, लेकिन उसका “शरीर” यानी मिडिल ईस्ट के सबसे बड़े मिसाइल भंडारों में से एक अभी भी मौजूद है।
विश्लेषकों का आकलन है कि ईरान और अधिक सुरक्षा-केंद्रित राज्य बन सकता है। नेतृत्व भूमिगत हो सकता है। आंतरिक असहमति पर सख्ती बढ़ सकती है। क्षेत्रीय टकराव और भड़कने का खतरा है। कुल मिलाकर, खामेनेई की मौत ने ईरान को निर्णायक मोड़ पर ला खड़ा किया है- जहां सत्ता तो बनी रह सकती है, लेकिन उसकी प्रकृति पहले से कहीं ज्यादा सख्त और अप्रत्याशित हो सकती है। यानी ईरान अब करो या मरो (डू आर डाय) की स्थिति में आ गया।