ईरान द्वारा खाड़ी देशों पर किए गए मिसाइल हमलों ने मध्य पूर्व में एक व्यापक युद्ध की आशंका को बढ़ा दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि जीसीसी देशों के सामने जवाबी कार्रवाई और संयम के बीच एक मुश्किल विकल्प है।
ईरान ने बहरीन में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर मिसाइलें दागीं
मध्य पूर्व में तनाव खतरनाक मोड़ ले चुका है। रविवार और सोमवार 2 मार्च को ईरान की मिसाइलों के खाड़ी देशों के प्रमुख शहरों पर गिरने से काफी नुकसान हुआ। खाड़ी देशों की “स्थिरता वाले देश” की छवि को भी गहरा झटका लगा है। अब क्षेत्र के सामने एक कठिन सवाल खड़ा है- क्या वे जवाबी कार्रवाई करेंगे या खुद को अमेरिका-इसराइल के झांसे में आए बिना इस युद्ध से दूर रहेंगे। सऊदी अरब के एक अधिकारी ने अल जज़ीरा अरबी को दिए गए इंटरव्यू में कहा कि अमेरिका ने हमें अकेला छोड़ दिया है। अमेरिका हमारे देशों में सिर्फ अपने सैन्य ठिकानों को बचाने में लगा हुआ है।
विश्लेषकों का कहना है कि खाड़ी देश ऐसी दुविधा में फंस गए हैं जिसमें हर विकल्प जोखिम भरा है। यदि वे जवाब देते हैं तो उन्हें इसराइल के साथ खड़े होने के रूप में देखा जा सकता है, और यदि चुप रहते हैं तो उनके शहर लगातार हमलों की जद में आ सकते हैं।
कतर के पूर्व प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री शेख हमद बिन जासिम बिन जाबेर अल थानी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर चेतावनी दी कि खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) देशों को “ईरान के साथ सीधे टकराव में घसीटे जाने” से बचना चाहिए, भले ही तेहरान ने परिषद देशों की संप्रभुता का उल्लंघन किया हो।
उन्होंने लिखा कि कुछ ताकतें GCC देशों को ईरान से सीधे भिड़ाना चाहती हैं, लेकिन ऐसा टकराव दोनों पक्षों के संसाधनों को खत्म कर देगा और बाहरी शक्तियों को हस्तक्षेप का मौका देगा। उन्होंने जोर दिया कि GCC देशों को “एकजुट होकर” किसी भी आक्रामकता का सामना करना चाहिए, लेकिन अलग-अलग निशाना बनने से बचना होगा।
दोहा स्थित गल्फ टाइम्स के प्रधान संपादक फैसल अल-मुधहका ने भी साफ कहा, “यह इसराइल और अमेरिका की जंग है, इसका हमसे कोई लेना-देना नहीं। हम सिर्फ अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण फंस गए हैं।”
उन्होंने जोड़ा, “खाड़ी क्षेत्र समृद्धि, विकास, सुरक्षा और संवाद के लिए जाना जाता है। हम युद्ध नहीं चाहते और न ही नेतन्याहू या ईरान की विचारधारा के लिए इसमें घसीटे जाना चाहते हैं।”
यह घटनाक्रम तब शुरू हुआ जब अमेरिका और इसराइल ने शनिवार को ईरान पर बड़ा संयुक्त हवाई हमला किया। इस ऑपरेशन में ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामेनेई सहित कई वरिष्ठ सैन्य नेता मारे गए और देशभर में सैन्य व सरकारी ठिकानों को निशाना बनाया गया। एक स्कूल भी हमले की चपेट में आया, जिसमें अकेले 148 लोगों की मौत हुई।
कई देश बने निशाना
इसके जवाब में तेहरान ने मिसाइल और ड्रोन हमले शुरू किए, जिनका निशाना इसराइल और खाड़ी में अमेरिकी सैन्य ठिकाने बने।
संयुक्त अरब अमीरात में कम से कम 3 लोगों की मौत, 58 घायल, कतर में 16 लोग घायल, ओमान में 5, कुवैत में 32 और बहरीन में 4 घायल, दुबई एयरपोर्ट और प्रमुख इमारतों को नुकसान, मनामा और कुवैत सिटी में ऊंची इमारतों पर हमले के निशान, सऊदी अरब ने रियाध और पूर्वी क्षेत्र पर भी हमलों की पुष्टि की यूएई ने इसराइल से अपना राजदूत वापस बुला लिया है, जिसे क्षेत्रीय असंतोष का स्पष्ट संकेत माना जा रहा है।खाड़ी देश युद्ध रोकना चाहते थे
खाड़ी देश इस टकराव से बचना चाहते थे। हमलों से पहले ओमान अमेरिका और ईरान के बीच अप्रत्यक्ष बातचीत करा रहा था। ओमान के विदेश मंत्री बद्र अलबुसैदी ने कहा था कि शांति “करीब” है, क्योंकि ईरान समृद्ध यूरेनियम जमा न करने और मौजूदा भंडार को कम करने पर सहमत हो गया था। लेकिन फिर भी कुछ ही घंटों बाद अमेरिका और इसराइल ने हमला कर दिया।
संपादक फैसल ने सवाल उठाया कि जब ओमान एक ऐसा समझौता करा चुका था जिसे उन्होंने “ओबामा डील से बेहतर” बताया, तब युद्ध क्यों भड़का। उन्होंने यह भी कहा कि कतर के अमीर शेख तमीम बिन हमद अल थानी ने वाशिंगटन पर जोर दिया था कि ईरान के खिलाफ खाड़ी के सैन्य ठिकानों का इस्तेमाल न किया जाए।उन्होंने ईरान की प्रतिक्रिया को भी “घबराहट की स्थिति” बताया और कहा कि अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाने का तर्क अंतरराष्ट्रीय संबंधों की समझ की कमी दिखाता है।
‘असंभव विकल्प’ की स्थिति
न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी अबू धाबी की प्रोफेसर मोनिका मार्क्स के अनुसार, “मनामा, दोहा और दुबई पर बम गिरते देखना यहां के लोगों के लिए उतना ही अकल्पनीय है जितना अमेरिकियों के लिए सिएटल या मियामी पर हमला।” उनका कहना है कि खाड़ी देशों ने हफ्तों से इस युद्ध को रोकने की कोशिश की थी, लेकिन घिरा हुआ ईरानी नेतृत्व हार मानने के बजाय क्षेत्र को साथ खींच सकता है।किंग्स कॉलेज लंदन के व्याख्याता रॉब गाइस्ट पिनफोल्ड ने कहा कि GCC देशों ने सैन्य कार्रवाई रोकने के लिए लॉबिंग की थी। उनके मुताबिक, यदि वे युद्ध में शामिल होते हैं और इज़राइल के साथ काम करते दिखते हैं, तो उनकी वैधता पर सवाल उठ सकता है।
लेकिन निष्क्रिय रहने का जोखिम भी कम नहीं है। पिनफोल्ड ने इसे “कन्फ्यूजिंग दुविधा” बताया- कुछ न करना भी उनकी छवि को नुकसान पहुंचा सकता है।
क्या खाड़ी देश खुद कार्रवाई करेंगे?
विश्लेषकों का मानना है कि यदि खाड़ी देश कदम उठाते हैं तो वे अपने तरीके से करेंगे- संभवतः GCC की संयुक्त सैन्य इकाई पेनिनसुला शील्ड फोर्स (PSF) के जरिए- न कि सिर्फ अमेरिकी या इज़राइली अभियानों के लिए अपना हवाई क्षेत्र खोलकर। पिनफोल्ड के अनुसार, “वे इज़राइल के लिए काम करते नहीं दिखना चाहते, बल्कि नेतृत्व करते दिखना चाहते हैं।”सबसे बड़ा डर: बुनियादी ढांचा
विशेषज्ञों के मुताबिक खाड़ी नेतृत्व की सबसे बड़ी चिंता बिजली ग्रिड, जल विलवणीकरण संयंत्र और ऊर्जा ढांचे पर हमले हैं। मोनिका मार्क्स ने चेताया, “एयर कंडीशनिंग और समुद्री पानी को मीठा बनाने की व्यवस्था के बिना तपते और सूखे खाड़ी देश लगभग रहने लायक नहीं रहेंगे। ऊर्जा ढांचा न रहा तो उनकी अर्थव्यवस्था भी प्रभावित होगी।” फैसल अल-मुधहका ने कहा कि संकट का असर ग्लोबल हो सकता है। उनके अनुसार दुनिया की 16% ऊर्जा आपूर्ति कतर से जुड़ी है। वैश्विक तेल का 33% होर्मुज़ जलडमरूमध्य से गुजरता है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि यहां आपूर्ति बाधित हुई तो ओसाका तक बिजली प्रभावित हो सकती है और चीन में ईंधन कीमतें उछल सकती हैं।कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि असली खतरा भौतिक नुकसान से ज्यादा खाड़ी देशों की “सॉफ्ट पावर” को है—यानी निवेश और पर्यटन के सुरक्षित केंद्र के रूप में उनकी छवि। हालांकि अल-मुधहका ने इस धारणा को खारिज करते हुए कहा कि GCC ने पहले भी कई चुनौतियों का सामना किया है और उसने हमेशा रक्षात्मक नीति अपनाई है।
क्या शुरू हो रहा है नया युग?
शेख हमद ने चेतावनी दी कि इस संकट के बाद क्षेत्र में नई ताकतें उभर सकती हैं और इसराइल का प्रभाव बढ़ सकता है। उन्होंने GCC देशों से एकजुट रहने और किसी भी तरह के दबाव या ब्लैकमेल को ठुकराने की अपील की। विश्लेषकों का मानना है कि यह संकट मध्य पूर्व की सुरक्षा व्यवस्था में बड़ा बदलाव दिखाता है। पहले खाड़ी देश हूती या हिज़्बुल्लाह जैसे गैर-राज्य समूहों पर ज्यादा ध्यान देते थे, लेकिन अब सीधे देश-से-देश युद्ध का खतरा बढ़ गया है।फिलहाल खाड़ी देश तेजी से रणनीति की समीक्षा कर रहे हैं। उनका अगला कदम इस बात पर निर्भर करेगा कि ईरान तनाव बढ़ाने की रफ्तार कम करता है या नहीं। लेकिन मिसाइल हमलों से झुलसी उनकी चमकदार स्काइलाइन यह संकेत दे रही है कि तटस्थ बने रहना अब पहले जितना आसान नहीं रह गया है।