फ्रांस के विदेश मंत्री जीन-नोएल बैरोट ने ईरान पर अमेरिका और इसराइल द्वारा किए गए एकतरफा हमलों की आलोचना की और यूएन सुरक्षा परिषद में इनकी वैधता पर बहस की मांग की। नाटो ने भी सीधे तौर पर हमले का समर्थन नहीं किया। ऐसा क्यों हैः
फ्रांस के विदेश मंत्री जीन-नोएल बैरोट ने कहा है कि ईरान में इसराइली और अमेरिकी "एकतरफा" हमलों को उन सामूहिक संस्थाओं में चर्चा की जानी चाहिए थीं, जो ठीक इसी उद्देश्य के लिए बनाई गई हैं, जैसे संयुक्त राष्ट्र। बैरोट ने मंत्रालय की बैठक के मीडिया से कहा- "हर कोई अपनी ज़िम्मेदारी निभा सकता था, क्योंकि सिर्फ संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में जाकर ही ऐसे हमलों को आवश्यक वैधता प्राप्त हो सकती है।"
बैरोट से पहले फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने कहा: "अमेरिका, इसराइल और ईरान के बीच युद्ध की शुरुआत अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के लिए गंभीर परिणाम लाएगी। वर्तमान युद्ध सभी के लिए खतरनाक है। इसे रोकना होगा।" उन्होंने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की आपात बैठक की मांग की और जोर दिया कि कूटनीतिक प्रयासों को फिर से प्रमुखता दी जानी चाहिए। ईरान के परमाणु कार्यक्रम, बैलिस्टिक मिसाइलों और क्षेत्रीय अस्थिरता के मुद्दों को केवल हमलों से हल नहीं किया जा सकता।
नाटो में एकजुटता क्यों नहीं, गहरी फूट तो नहीं
नाटो देशों में इस मुद्दे पर पूर्ण एकरूपता नहीं है, लेकिन यह गहरी फूट भी नहीं मानी जा सकती। फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन (E3) ने संयुक्त बयान में कहा कि वे हमलों में शामिल नहीं हैं, न ही सूचित किया गया था। हालांकि उन्होंने ईरान के जवाबी हमलों की निंदा की और क्षेत्रीय स्थिरता की बात की, लेकिन हमलों की सीधी निंदा नहीं की। उन्होंने कूटनीति और बातचीत की मांग की। कनाडा ने अमेरिका का खुलकर समर्थन किया। अलबत्ता नाटो ने कहा कि वह स्थिति पर "नजर रख रहा है", लेकिन कोई सामूहिक कार्रवाई या निंदा नहीं की। कई यूरोपीय देशों ने सावधानी बरती, अमेरिका से दूरी बनाई, लेकिन ईरान की जवाबी कार्रवाई की निंदा की।
नाटो की क्या ये रणनीतिक दूरी है
फ्रांस के विदेश मंत्री बैरोट का बयान काफी रणनीतिक है। इसीलिए उन्होंने वैधता पर सवाल उठाता है, लेकिन फ्रांस ने ईरान के खिलाफ रक्षात्मक समर्थन देने की बात कही है। यह नाटो में काफी हद तक दरार दिखाता है। साथ ही ट्रंप की एकतरफा नीति से यूरोपीय सहयोगियों की असहजता को भी बताता है। यूरोपीय देश (फ्रांस, जर्मनी, यूके) अमेरिका के साथ गठबंधन में हैं, लेकिन वे UN-आधारित व्यवस्था पसंद करते हैं और क्षेत्रीय विस्तार से बचना चाहते हैं।
यह स्थिति ट्रांस-अटलांटिक तनाव को दर्शाती है, जैसा कि पहले इराक युद्ध (2003) में देखा गया था, लेकिन अभी तक नाटो में कोई खुली विभाजन या सदस्यता से जुड़ी समस्या नहीं आई है। फ्रांस ने ईरान के जवाबी हमलों पर कड़ी कार्रवाई की बात कही, लेकिन उसमें हिस्सा लेने की बात नहीं की। इसी तरह से यूके और जर्मनी ने भी साफ किया कि वो युद्ध में नहीं कूदेंगे।
बैरोट का बयान नाटो में कूटनीतिक असहमति और बहुपक्षीय दृष्टिकोण की पुष्टि करता है, जबकि फ्रांस सहयोगियों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। स्थिति तेजी से बदल रही है और UNSC बैठकें आगे की दिशा तय करेंगी।