जेएनयू छात्र संघ चुनाव
जेएनयूएसयू चुनाव में लेफ्ट यूनिटी ने एक बार फिर जीत दर्ज की है, जबकि आरएसएस से जुड़ा एबीवीपी पिछड़ गया। आखिर क्यों जेएनयू में वामपंथी विचारधारा अब भी प्रभावी है और आरएसएस अपने राजनीतिक-वैचारिक एजेंडे को यहाँ स्थापित नहीं कर पा रहा?
इस बार भी जीत वामपंथी पैनल को मिली है लेकिन एबीवीपी चारों अहम पदों पर दूसरे नंबर पर रहा है जो बताता है कि संघ का प्रभाव बढ़ रहा है। आरोप है कि इस विश्वविद्यालय में बड़ी तादाद में आरएसएस से जुड़े शिक्षकों की भर्ती की गयी है। कुलपति तो संघ की पृष्ठभूमि का होता ही है।
हम एक ऐसी यूनिवर्सिटी चाहते हैं जो न सिर्फ डिग्री दे, बल्कि सोचने का तरीका सिखाये।
केस अब भी जारी है। कन्हैया कुमार बार-बार कहते हैं कि उनके मुक़दमे का जल्द फ़ैसला हो लेकिन सरकार का मुख्य मुद्दा, इस मुद्दे को बनाये रखने का है। जेएनयू और कन्हैया कुमार देशद्रोही हैं…क्यों हैं कैसे हैं, यह बताने की ज़रूरत नहीं है। बीजेपी के तरकश में एक तीर हैं- ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ जिसका इस्तेमाल अक्सर ही विरोधियों के ख़िलाफ़ किया जाता है।