चुनाव की आचार संहिता से बचने की जो चाल चलने का आरोप बीजेपी पर लगते रहे हैं, कुछ इसी तरह का 'खेल' ममता बनर्जी ने रविवार को चुनाव आयोग की घोषणा से ऐन पहले कर दिया। ममता बनर्जी ने चुनाव तारीखों की घोषणा से ठीक कुछ मिनट पहले डीए बकाया का ऐलान किया जिससे कर्मचारियों को बड़ी राहत मिली। ममता ने कहा कि राज्य सरकार राज्य कर्मचारियों, पेंशनरों, शिक्षकों और अन्य संस्थाओं के कर्मचारियों के लंबे समय से बकाया डियरनेस अलाउंस यानी डीए का भुगतान शुरू करेगी। यह फ़ैसला चुनाव आयोग की प्रेस कॉन्फ्रेंस से ठीक पहले आया। बीजेपी ने इसे 'आख़िरी पलों का चुनावी हथकंडा' बताया। इससे राजनीतिक हलचल तेज हो गई है।

ममता का ऐलान क्या था?

ममता बनर्जी ने रविवार को एक्स पर पोस्ट किया, 'मैं खुश हूं कि हमारी मा-माटी-मानुष सरकार ने अपने सभी कर्मचारियों, पेंशनरों, लाखों शिक्षकों, गैर-शिक्षण स्टाफ और पंचायत, नगर निकाय जैसी ग्रांट-इन-एड संस्थाओं के कर्मचारियों-पेंशनरों के वादे को पूरा किया है।' उन्होंने कहा कि ROPA 2009 के तहत डीए बकाया मार्च 2026 से मिलना शुरू हो जाएगा। यह भुगतान वित्त विभाग की नोटिफिकेशन के अनुसार होगा। यह फ़ैसला सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक़ है।

चुनाव तारीखें क्या घोषित हुईं?

चुनाव आयोग ने रविवार शाम 4 बदे घोषणा की कि पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव दो चरणों में होंगे।
  • पहला चरण 23 अप्रैल को
  • दूसरा चरण 29 अप्रैल को
  • वोट गिनती: 4 मई को
यह 2021 के 8 चरणों से कम है। चुनाव की घोषणा के साथ ही मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट यानी आदर्श आचार संहिता तुरंत लागू हो गई है। इसके लागू होने के बाद सरकार कोई भी नयी सरकारी योजना या योजना के भुगतान संबंधी किसी तरह की घोषणा नहीं कर सकती है क्योंकि यह आचार संहिता का उल्लंघन माना जाता है। ठीक इसी तरह की घोषणाएँ बीजेपी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकारों ने बिहार और महाराष्ट्र में की थीं।

क्या है चुनावी आचार संहिता?

चुनावी आचार संहिता या मॉडल कोड ऑफ़ कंडक्ट यानी एमसीसी चुनाव आयोग का नियम है, जो चुनाव की तारीखें घोषित होने के बाद लागू होता है। इसमें सरकार नई योजनाएं घोषित नहीं कर सकती, नई परियोजनाएं शुरू नहीं कर सकती, या ऐसी कोई चीज जो वोटरों को लुभाए। 

पहले से चल रही योजनाओं को जारी रखा जा सकता है, अगर वे पहले से मंजूर और बजट में शामिल हों। कभी-कभी चुनाव आयोग से अतिरिक्त मंजूरी लेनी पड़ती है, और कोई नया लाभार्थी नहीं जोड़ सकते। अगर कोई नई या एडवांस पेमेंट हो, तो वो एमसीसी का उल्लंघन माना जा सकता है।

बिहार में महिलाओं को 10 हजार दिए थे

बिहार में मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना महीनों पहले 2025 की शुरुआत में घोषित और लॉन्च की गई थी। पीएम नरेंद्र मोदी ने दिल्ली से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से लॉन्च किया। चुनाव की घोषणा से पहले ही 75 लाख महिलाओं के अकाउंट में 7500 करोड़ रुपये ट्रांसफर किए गए। लेकिन चुनाव की तारीखें 6 अक्टूबर 2025 को घोषित हुईं, तब एमसीसी लागू हो गया था। लेकिन पैसे ट्रांसफर चुनाव के दौरान 17, 24, 31 अक्टूबर और 7 नवंबर को हुए। विपक्ष ने चुनाव आयोग से शिकायत की कि यह आचार संहिता का उल्लंघन है, क्योंकि चुनाव के समय पैसे बांटकर वोटरों को प्रभावित कर रहे हैं।
लेकिन सरकारी अधिकारियों ने साफ़ किया कि यह नई योजना नहीं, बल्कि पहले से चल रही और मंजूर योजना का हिस्सा है। आचार संहिता नई चीजें को रोकती है, लेकिन पुरानी योजनाओं के जारी ट्रांसफर को नहीं रोकती है। चुनाव आयोग ने कोई रोक नहीं लगाई और सुप्रीम कोर्ट ने भी जन सुराज पार्टी की याचिका खारिज कर दी, जिसमें चुनाव रद्द करने की मांग थी।

महाराष्ट्र: लाडकी बहिन योजना

महाराष्ट्र में लाडकी बहिन योजना जुलाई 2024 में शुरू हुई, जिसमें योग्य महिलाओं को हर महीने 1500 रुपये मिलते हैं। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव 2024 की तारीख़ें 15 अक्टूबर 2024 को घोषित हुईं और एमसीसी लागू हुआ। योजना आचार संहिता से पहले शुरू हो चुकी थी और अगस्त-सितंबर में पहली किस्तें दी गईं। एमसीसी के दौरान नए लाभार्थी नहीं जोड़े जा सकते थे और आगे की किस्तों के लिए चुनाव आयोग से मंजूरी लेनी पड़ी। लेकिन योजना रुकी नहीं- नवंबर तक किस्तें जारी रहीं, क्योंकि यह पहले की योजना जारी थी।
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डीए पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला क्या था?

बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट ने 5 फरवरी 2026 को बड़ा फ़ैसला दिया। कोर्ट ने कहा कि डीए कर्मचारियों का कानूनी हक है, कोई एहसान नहीं। जस्टिस संजय करोल और प्रशांत कुमार मिश्रा की बेंच ने राज्य सरकार को आदेश दिया कि 2008 से 2019 तक के डीए बकाया का 25% 31 मार्च 2026 तक चुकाया जाए। कोर्ट ने पूर्व जज इंदु मल्होत्रा की अध्यक्षता में हाई-लेवल कमिटी बनाई, जो भुगतान का पूरा शेड्यूल तय करेगी। पहली किस्त 31 मार्च तक, और पूरी रिपोर्ट 15 अप्रैल तक कोर्ट में जमा करनी है। यह फ़ैसला लाखों कर्मचारियों और पेंशनरों को फायदा पहुंचाएगा। लेकिन राज्य और केंद्र के डीए में अभी भी 40% का अंतर है।

कितना बड़ा बोझ?

वित्त विभाग के अनुसार कुल डीए बकाया करीब 25,000 करोड़ रुपये है। राज्य सरकार ने पिछले हफ्ते सुप्रीम कोर्ट से समय मांगा था कि दिसंबर 2026 तक भुगतान करने दिया जाए, क्योंकि चुनाव खर्च और जीएसटी प्रभाव से आर्थिक दबाव है। लेकिन अब चुनाव तारीखें आ गईं, तो सरकार ने तुरंत भुगतान शुरू करने का फ़ैसला लिया।

बीजेपी ने क्या दी प्रतिक्रिया?

विपक्षी नेता शुभेंदु अधिकारी ने इसे चुनावी जुमला बताया। उन्होंने एक्स पर लिखा, 'क्या मजाक है! चुनाव आयोग तारीखें घोषित करने से ठीक मिनट पहले ममता को लाखों कर्मचारियों की याद आई? एक पैसा भी नहीं निकलेगा। सिर्फ नोटिफिकेशन से लोगों को बेवकूफ बनाने की पुरानी टीएमसी ट्रिक। इस बार मजाक आप पर होगा, ममता बनर्जी।'
संग्रामी जौथा मंच (कर्मचारी संगठन) ने स्वागत किया। इसके नेता भास्कर घोष ने कहा, 'यह साबित करता है कि कानून पर भरोसा और धैर्य से लड़ाई जीती जा सकती है, बिना किसी पार्टी से बंधे।'

यह क्यों अहम है?

ममता का यह ऐलान चुनाव से ठीक पहले आया है, इसलिए इसे कर्मचारी वोट बैंक को साधने की कोशिश माना जा रहा है। कर्मचारी और पेंशनर लंबे समय से डीए बकाया मांग रहे थे। सुप्रीम कोर्ट के दबाव में सरकार ने कदम उठाया। लेकिन भुगतान कितनी जल्दी और कितना होगा, यह देखना बाकी है। राज्य में कर्मचारी वोट काफी प्रभावशाली हैं। 2026 चुनाव में यह मुद्दा टीएमसी के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है या विपक्ष इसे 'चुनावी चाल' बताकर हमला कर सकता है।