अगर किसी कार का माइलेज शहर में औसतन 15 किमी प्रति लीटर (kmpl) है और किसी दिन वह घटकर 14.5 kmpl हो जाए, तो कोई भी आम नागरिक सोशल मीडिया पर जाकर सरकार की नीतियों को नहीं कोसेगा। लेकिन, यदि सिर्फ फ्यूल बदलने की वजह से यह माइलेज घटकर 12 या 13 kmpl पर आ जाए, तो जनता का नाराज होना स्वाभाविक है।
यही वह जमीनी हकीकत है जिसे सरकार E20 पेट्रोल विवाद में देखने से इनकार कर रही है। सरकार का लगातार यह दावा रहा है कि E20 ईंधन (20% एथनॉल और 80% पेट्रोल का मिश्रण) का इस्तेमाल करने से पुराने वाहनों के माइलेज में होने वाली कमी बेहद "मामूली" (Marginal) है।

सरकार और उद्योग जगत के आंकड़े

सरकार और तेल मंत्रालयों की ओर से जारी बयानों में माइलेज के नुकसान का आंकड़ा 2% से 6% के बीच बताया गया है। हाल ही में तीन मंत्रालयों द्वारा आयोजित एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में उद्योग जगत के एक शीर्ष कार्यकारी ने दावा किया कि माइलेज में होने वाली गिरावट केवल 3% से 3.5% ही है। यह गिरावट वैसी ही है जैसे माइलेज का 15 kmpl से घटकर 14.5 kmpl हो जाना, जिसके लिए कोई भी उपभोक्ता परेशान नहीं होता। लेकिन सवाल उससे बड़ा है। जिसे हवा में नहीं उड़ाया जा सकता।

क्या पुरानी गाड़ियों के कारण बढ़ रही है पेट्रोल की खपत?

इस सरकारी गणित के पीछे छिपे एक बड़े विरोधाभास और महत्वपूर्ण सवाल को उजागर किया है: सवाल है कि क्या E20 ईंधन के इस्तेमाल से उन पुरानी गाड़ियों का माइलेज बहुत ज्यादा गिर रहा है जो इस ईंधन के लिए डिज़ाइन या ट्यून (अनुकूलित) नहीं की गई हैं? और क्या इस वजह से भारत में पेट्रोल की कुल खपत घटने के बजाय और बढ़ रही है?

सड़क पर दौड़ने वाले वाहनों का एक बहुत बड़ा हिस्सा उन पुरानी गाड़ियों का है जिन्हें आधुनिक E20 ईंधन के हिसाब से नहीं बनाया गया था। जब इन गाड़ियों में 20% एथनॉल मिश्रित ईंधन डाला जाता है, तो उनका माइलेज सरकारी दावों (3%) के मुकाबले कहीं अधिक तेजी से गिरता है।

नीति का विरोधाभास: लाभ या नुकसान?

सरकार का मुख्य उद्देश्य पेट्रोल में एथनॉल मिलाकर कच्चे तेल (Crude Oil) के आयात पर निर्भरता को कम करना और विदेशी मुद्रा बचाना है। लेकिन अगर माइलेज में भारी गिरावट के कारण वाहनों को समान दूरी तय करने के लिए पहले से कहीं अधिक मात्रा में ईंधन की आवश्यकता पड़ रही है, तो यह नीति अपने मूल उद्देश्य के विपरीत काम कर रही है। यानी, एथनॉल मिलाने के बाद भी यदि गाड़ियों द्वारा पेट्रोल फूंकने की रफ्तार (खपत) बढ़ जाती है, तो देश को तेल आयात में वह बचत हासिल नहीं होगी जिसका अनुमान लगाया गया था।
टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि सरकार को केवल लैब या चुनिंदा आधुनिक वाहनों के टेस्ट आंकड़ों पर निर्भर रहने के बजाय वास्तविक सड़कों पर चल रही करोड़ों पुरानी गाड़ियों पर E20 ईंधन के व्यावहारिक प्रभाव का पारदर्शी मूल्यांकन करना चाहिए। जब तक पुरानी गाड़ियों के माइलेज नुकसान का सटीक और वास्तविक डेटा सामने नहीं आता, तब तक E20 ईंधन का यह सरकारी गणित एक बड़े संदेह के घेरे में रहेगा।

नितिन गडकरी के बयान क्यों बदलते रहे

ई20 पेट्रोल को लेकर केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी के बयानों में पिछले कुछ वर्षों में एक बड़ा बदलाव और आक्रामकता देखने को मिली है। शुरुआत में जहां उनका पूरा ध्यान किसानों के फायदे और पर्यावरण पर केंद्रित था, वहीं हाल के दिनों में जनता के आक्रोश और सोशल मीडिया पर बढ़ते विवाद के बाद उनका रुख डिफेंसिव (बचाव) और आलोचकों को सीधी चुनौती देने वाला हो गया है।

2021-2024 में गडकरी के बयान क्या थे

शुरुआती वर्षों में जब एथनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम को देश में लागू किया जा रहा था, तब गडकरी का रुख बेहद सकारात्मक और दूरदर्शी था। वे लगातार इसके आर्थिक और सामाजिक फायदों को गिनाते थे: वे कहते थे कि पेट्रोल में एथनॉल मिलाने से देश के गन्ना, मक्का और चावल उत्पादक किसानों की आय बढ़ेगी। उन्होंने दावा किया कि इस नीति से उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों के मक्का किसानों की जेब में अतिरिक्त ₹45,000 करोड़ गए हैं। वे हर मंच से कहते रहे हैं कि भारत सालाना ₹22 लाख करोड़ का जीवाश्म ईंधन (कच्चा तेल) आयात करता है, जो देश की अर्थव्यवस्था पर भारी बोझ है। एथनॉल से यह निर्भरता कम होगी।

जून 2026 में गडकरी ने क्या बयानबाजी की

जैसे-जैसे देश ने ई20 का लक्ष्य समय से पहले हासिल किया, गडकरी ने ई20 से आगे बढ़कर 100% एथनॉल (E100) और फ्लेक्स-फ्यूल (Flex-Fuel) इंजन वाली गाड़ियों की वकालत शुरू कर दी। जून 2026 में उन्होंने 100% एथनॉल ईंधन के नियमों को कानूनी मंजूरी देने वाली फाइल पर हस्ताक्षर किए। 
उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा, "जब मैं इस सपने की बात करता था, तो लोग हंसते थे और आलोचना करते थे।" उन्होंने मारुति सुजुकी वैगन-आर और हीरो मोटोकॉर्प के एथनॉल मॉडल का उदाहरण देकर यह साबित करने की कोशिश की कि ऑटोमोबाइल उद्योग इसके लिए पूरी तरह तैयार है। उन्होंने एक दिलचस्प किस्सा भी सुनाया कि कैसे एक व्यक्ति ने अपनी जीप खराब होने के लिए एथनॉल को जिम्मेदार ठहराया, जबकि वह जीप डीजल से चलती थी। इसके जरिए उन्होंने संदेश दिया कि एथनॉल को बदनाम करने के लिए 'भ्रामक अफवाहें' फैलाई जा रही हैं।

E 20 पर जुलाई में गडकरी का रुख आक्रामक हो गया

हाल के हफ्तों में जब ई 20 पेट्रोल देश के फ्यूल स्टेशनों पर डिफॉल्ट रूप से मिलने लगा, तो आम उपभोक्ताओं ने सोशल मीडिया और सड़कों पर माइलेज घटने, इंजन खराब होने और पार्ट्स (रबर होज़, गैस्केट) गलने की शिकायतें शुरू कर दीं। दिल्ली जैसे शहरों में ई20 के खिलाफ प्रदर्शन भी हुए। इसके बाद नितिन गडकरी का बयान पूरी तरह आक्रामक और चुनौती देने वाला हो गया: विकसित भारत कॉन्क्लेव (जुलाई 2026) में गडकरी ने आलोचकों को सीधा चैलेंज देते हुए कहा- "देश में कोई एक भी ऐसी कार का नाम बता दो, जो ई20 पेट्रोल के इस्तेमाल की वजह से खराब हुई हो। सिर्फ एक नाम बता दो।"
'पेड कैंपेन' और लॉबिंग का आरोप: गडकरी ने ई20 के खिलाफ चल रहे विरोध को पूरी तरह खारिज करते हुए इसे 'झूठा नैरेटिव' और 'पेड कैंपेन' (पैसे देकर चलाया जाने वाला अभियान) करार दिया। उन्होंने यहाँ तक कहा कि ईंधन बाजार में बहुत बड़ी लॉबियां काम करती हैं और "पेट्रोल लॉबी बहुत अमीर है" जो इस बदलाव को रोकना चाहती है।
व्यक्तिगत सफाई: जब सोशल मीडिया पर यह आरोप लगने लगे कि गडकरी के परिवार के पास चीनी मिलें (Sugar Factories) हैं, इसलिए वे एथनॉल को बढ़ावा दे रहे हैं, तो उन्होंने स्पष्ट किया कि उनके परिवार की कंपनियां एथनॉल उत्पादन पर निर्भर नहीं हैं और इस नीति से उनका कोई व्यक्तिगत फायदा नहीं है।
नितिन गडकरी का रुख समय के साथ 'एथनॉल के फायदों के प्रचारक' से बदलकर अब 'एथनॉल नीति के आक्रामक रक्षक' का हो चुका है। हालांकि ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया (ARAI) की आंतरिक रिपोर्टें और स्वतंत्र सर्वे (जैसे लोकल सर्कल्स) यह इशारा कर रहे हैं कि पुरानी गाड़ियों के रबर पार्ट्स को नुकसान पहुंच रहा है और माइलेज 2-6% तक कम हो रहा है, लेकिन गडकरी और पेट्रोलियम मंत्रालय इसे 'मामूली' मानकर इस नीति पर पूरी तरह अड़े हुए हैं।