56 पूर्व जजों ने विपक्ष पर न्यायपालिका को डराने का आरोप लगाया है। बयान में कहा गया कि महाभियोग की पहल जजों पर दबाव बनाने की रणनीति है। पहले ऐसे ख़त सरकार के विरोध में लिखे जाते रहे थे, अब विपक्ष के?
इंडिया गठबंधन के सांसदों ने जज के ख़िलाफ़ महाभियोग नोटिस सौंपा।
देश के 56 सेवानिवृत्त न्यायाधीशों ने विपक्षी दलों द्वारा मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जीआर स्वामीनाथन के खिलाफ लोकसभा में पेश किए गए महाभियोग प्रस्ताव को न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सीधा हमला और न्यायाधीशों को डराने-धमकाने की घृणित कोशिश करार दिया है। इन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खुला ख़त लिखा है। इनमें सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज और हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश शामिल हैं। वैसे, जजों ने महाभियोग प्रस्ताव के नोटिस देने की जिस आधार पर आलोचना की है, उसी आधार पर सरकार भी विपक्ष की आलोचना कर रही है। हाल के वर्षों में यह पहली बार हो रहा है कि पूर्व जज या तथाकथित एक्टिविस्ट सरकार के समर्थन में ऐसे खुले ख़त लिख रहे हैं। कुछ वर्ष पहले तक ऐसे खुले ख़त सरकार के विरोध में लिखे जाते रहे थे।
केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने संसद में महाभियोग प्रस्ताव नोटिस के इस मामले को उठाया और इसे स्वतंत्र भारत का पहला ऐसा मामला बताया, जहां किसी जज को केवल 'वोट बैंक की राजनीति' के लिए महाभियोग का सामना करना पड़ रहा है। जज को केवल 'वोट बैंक की राजनीति' के लिए महाभियोग का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि यह तुष्टिकरण की रणनीति है, जो न्यायपालिका को कमजोर करेगी।
विपक्ष का महाभियोग प्रस्ताव
इस सप्ताह की शुरुआत में इंडिया गठबंधन के 100 से अधिक सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को महाभियोग प्रस्ताव सौंपा। इसमें कांग्रेस की प्रियंका गांधी वाड्रा और समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव भी शामिल हैं। इस कदम की केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कड़ी आलोचना की और इसे 'तुष्टिकरण की राजनीति' बताया। शाह ने कहा, 'स्वतंत्रता के बाद कभी ऐसा नहीं हुआ कि किसी न्यायाधीश पर फैसले के लिए महाभियोग लाया जाए। वे यह अपने वोट बैंक को खुश करने के लिए कर रहे हैं।'
अमित शाह की लाइन पर ही पूर्व न्यायाधीशों ने एक संयुक्त बयान जारी कर इस कदम को न्यायाधीशों को धमकाने की खुली कोशिश करार दिया है, जो उन न्यायाधीशों को निशाना बनाता है जो समाज के एक विशेष वर्ग की वैचारिक और राजनीतिक अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं चलते। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि इस तरह की प्रवृत्ति जारी रही तो यह लोकतंत्र की जड़ों और न्यायपालिका की स्वतंत्रता को गंभीर क्षति पहुंचाएगी।ख़त में जारी बयान में कहा गया है कि भले ही संसद सदस्यों द्वारा दिए गए कारणों को सही माना जाए, लेकिन वे इतने गंभीर नहीं हैं कि महाभियोग जैसे दुर्लभ, असाधारण और संवैधानिक उपाय का सहारा लिया जाए।
पूर्व न्यायाधीशों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखे खुले पत्र में कहा है कि विपक्ष का यह क़दम संविधान की मूल भावना के ख़िलाफ़ है और न्यायपालिका को कार्यपालिका के अधीन करने का खतरनाक प्रयास है। पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति संजय किशन कौल, न्यायमूर्ति हेमंत गुप्ता, न्यायमूर्ति एम.आर. शाह, न्यायमूर्ति वी. रामसुब्रमण्यन सहित कई प्रमुख नाम शामिल हैं।
पूर्व न्यायाधीशों ने लिखा, 'महाभियोग का प्रस्ताव केवल इसलिए लाया गया क्योंकि कुछ फ़ैसलों से विपक्षी दलों को राजनीतिक नुक़सान हुआ है। यह न्यायिक स्वतंत्रता को कुचलने और अदालतों को डराने का साफ़ प्रयास है। यदि ऐसे प्रस्तावों को प्रोत्साहन मिला तो भविष्य में कोई भी न्यायाधीश बिना डरे संविधान के अनुसार फैसला नहीं कर पाएगा।'
पूर्व न्यायाधीशों ने किया आपातकाल का ज़िक्र
पूर्व न्यायाधीशों ने अपने बयान में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा 1975 में लगाए गए आपातकाल का जिक्र किया, जिसका उपयोग सत्तारूढ़ बीजेपी अक्सर कांग्रेस पर हमला करने के लिए करती है। उन्होंने कहा, 'आपातकाल के अंधेरे दौर में भी तत्कालीन सरकार ने उन न्यायाधीशों को दंडित करने के लिए विभिन्न तरीके अपनाए थे, जो लाइन पर चलने से इनकार करते थे, जिसमें पदोन्नति रोकना शामिल था।' उन्होंने 1973 के केशवानंद भारती मामले का उल्लेख किया, जिसमें 'संविधान की बुनियादी संरचना' सिद्धांत स्थापित किया गया था, जो संसद की संविधान संशोधन की शक्ति को सीमित करता है।
इसके अलावा, उन्होंने पूर्व मुख्य न्यायाधीशों दीपक मिश्रा, रंजन गोगोई, एसए बोबडे, डीवाई चंद्रचूड़ और वर्तमान मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत को निशाना बनाए जाने का भी ज़िक्र किया।
मंदिर का दीपम विवाद क्या?
यह पूरा विवाद तमिलनाडु के मदुरै जिले में स्थित तिरुप्परंकुंड्रम सुब्रमणियास्वामी मंदिर से जुड़ा है। पहाड़ी पर स्थित इस मंदिर के पास एक दरगाह भी है। विवाद दो प्राचीन स्तंभों- 'दीपथून' पर उत्सव की ज्योति जलाने को लेकर है। परंपरा के अनुसार, पिछले 100 वर्षों से ज्योति पहाड़ी के नीचे वाले स्तंभ पर जलाई जाती रही है।
1 दिसंबर को एक विवादास्पद सुनवाई के बाद न्यायाधीश स्वामीनाथन ने राज्य सरकार और मंदिर अधिकारियों के विरोध को खारिज करते हुए आदेश दिया कि ज्योति पहाड़ी के बीच में बने ऊपरी स्तंभ पर जलाई जाए। न्यायाधीश ने तर्क दिया कि ऊपरी स्तंभ भी मंदिर की संपत्ति है और इसे अनुष्ठान में शामिल किया जाना चाहिए। अदालत ने कब्जे की पुष्टि पर जोर दिया। इस बीच 3 दिसंबर को उत्सव के दिन मंदिर ने अदालत के आदेश का पालन नहीं किया और ज्योति पारंपरिक नीचे वाले स्तंभ पर जलाई गई। इससे नाराज न्यायाधीश ने गैर-अनुपालन का हवाला देकर ऊपरी स्तंभ पर भी ज्योति जलाने का आदेश दिया। इससे तनाव फैल गया, क्योंकि सैकड़ों लोग सशस्त्र केंद्रीय सुरक्षा बलों के साथ पहाड़ी पर चढ़ने लगे। जिला अधिकारियों ने बड़े जमावड़े पर प्रतिबंध लगा दिया।
सरकार के समर्थन में पहले भी ख़त लिखे गए
मोदी सरकार के समर्थन में पूर्व जजों और प्रमुख व्यक्तियों द्वारा लिखे गए खुले ख़तों की एक श्रृंखला रही है। ये पत्र मुख्य रूप से विपक्ष की आलोचना के जवाब में थे। हाल ही में एक ख़त नवंबर 2025 को जारी किया गया, जिसमें 16 पूर्व जज सहित 272 प्रमुख व्यक्तियों ने विपक्ष, खासकर राहुल गांधी और कांग्रेस, पर संवैधानिक संस्थाओं को कलंकित करने का आरोप लगाया। यह पत्र मोदी सरकार की नीतियों और संस्थागत मजबूती का खुला समर्थन माना गया, क्योंकि यह चुनाव आयोग का बचाव करता है।नवंबर में लिखा गया यह पत्र लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं को संबोधित था। इसमें चुनाव पर असत्यापित आरोपों से नफ़रती बयानबाजी का आरोप लगाया गया।
हस्ताक्षर करने वालों ने कहा था कि विपक्ष चुनावी हार के बाद थिएट्रिकल राजनीति कर रहा है, जो संस्थाओं की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचा रही है। उन्होंने चुनाव आयोग की एसआईआर प्रक्रिया की निष्पक्षता का बचाव किया और नागरिकों से चुनाव आयोग का समर्थन करने की अपील की।
44 पूर्व जजों का ख़त
इस साल हाल ही में 44 पूर्व जजों ने मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत के रोहिंग्या शरणार्थियों पर टिप्पणी का समर्थन किया। पत्र में कहा गया कि सीजेआई की टिप्पणी राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी थी और विपक्षी, आलोचकों का अभियान मोटिवेटेड है। यह अप्रत्यक्ष रूप से मोदी सरकार की प्रवासी नीति का समर्थन था, क्योंकि रोहिंग्या मुद्दा अवैध प्रवास से जुड़ा है।2019 में भी लिखा था खुला ख़त
2019 में भी एक अहम ख़त लिखा गया था, जब 125 से अधिक पूर्व न्यायाधीशों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक खुला पत्र भेजा। यह पत्र मुख्य रूप से चुनाव आयोग की आलोचना करने वाले एक अन्य पत्र के जवाब में था। इसमें उन्होंने चुनाव आयोग पर पक्षपातपूर्ण होने के आरोप लगाने वाले 60 से अधिक पूर्व नौकरशाहों के पत्र का खंडन किया। जजों ने कहा कि चुनाव आयोग ने निष्पक्षता से काम किया है और आलोचना करने वाले ख़त तथ्यों से परे हैं। यह पत्र मोदी सरकार की चुनावी प्रक्रिया को समर्थन देने के रूप में देखा गया, क्योंकि यह विपक्षी आलोचना को कमजोर करने का प्रयास था।
2022 में भी पूर्व जजों का सीधा समर्थन
2022 में 8 पूर्व न्यायाधीशों, 97 पूर्व नौकरशाहों और 92 पूर्व सैन्य अधिकारियों ने संयुक्त रूप से एक पत्र लिखा था। यह पत्र संवैधानिक कंडक्ट ग्रुप के 108 पूर्व नौकरशाहों के पत्र के जवाब में था जिसमें हेट पॉलिटिक्स का आरोप लगाया गया था। समर्थन करने वाले पत्र में कहा गया कि मोदी सरकार के तहत सांप्रदायिक हिंसा में कमी आई है, अर्थव्यवस्था मजबूत हुई है। उन्होंने आलोचकों को व्यक्तिगत पूर्वग्रहों से मुक्त होने की सलाह दी।