अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने रविवार को बड़ा दावा किया है कि भारत अगले पांच साल में अमेरिका से 500 अरब डॉलर यानी क़रीब 42 लाख करोड़ रुपये का सामान खरीदने की प्रतिबद्धता जता चुका है। यह खरीदारी मुख्य रूप से ऊर्जा, प्रौद्योगिकी और कृषि क्षेत्र में होगी।

रुबियो इस समय भारत के चार दिवसीय दौरे पर हैं और वह भारत, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जापान के संगठन क्वाड की बैठक से जुड़े कार्यक्रमों में शामिल हो रहे हैं। इसी बीच, रुबियो ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर रविवार को लिखा, 'अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर और हमारे डिप्लोमैट्स के प्रयासों से भारत ने अगले 5 साल में ऊर्जा, टेक्नोलॉजी और कृषि क्षेत्र में 500 अरब डॉलर का सामान खरीदने का फैसला किया है।'

चीन से ज़्यादा दबाव वाली व्यापार नीति?

प्रसिद्ध रणनीतिक विशेषज्ञ डॉ. ब्रह्मा चेल्लानी ने इस हालात को लेकर चेताया है और कहा है कि अमेरिका की व्यापार नीति चीन की व्यापार नीति से भी ज़्यादा ख़राब है। उन्होंने कहा, 'रुबियो का यह बयान याद दिलाता है कि ट्रंप प्रशासन के तहत अमेरिका की व्यापार कूटनीति बहुत दबाव वाली है। यह चीन की डेब्ट-ट्रैप डिप्लोमेसी से भी ज्यादा दबाव वाली लग रही है। व्यापार को अब अमेरिका हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा है।'

चेल्लानी ने आगे कहा, 'व्यापार अब आर्थिक दबाव डालने का अमेरिका का एक बेढंगा औज़ार बन गया है। आर्थिक लाभ उठाने के लिए ट्रंप का सख़्त रवैया अमेरिका के उन गठबंधनों और रणनीतिक साझेदारियों को कमज़ोर कर रहा है, जिन पर आख़िरकार अमेरिकी ताक़त टिकी हुई है।'

पुराना समझौता और बदलाव

फरवरी 2026 में भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते के बाद जारी फैक्टशीट में शुरू में 'committed' यानी प्रतिबद्ध शब्द का इस्तेमाल किया गया था। बाद में इसे बदलकर 'intends' कर दिया गया जिसका मतलब है कि ऐसा करने का इरादा है। फरवरी में ही केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने साफ़ किया था कि 500 अरब डॉलर कोई बाध्यकारी लक्ष्य नहीं है।

गोयल ने कहा था, 'हमारा इरादा कुछ उपकरण खरीदने का है, लेकिन हमें ऐसा करना ज़रूरी नहीं है। खरीदारी क़ीमत, गुणवत्ता और ज़रूरत के आधार पर होगी। हर साल 100 अरब डॉलर खरीदने की कोई बाध्यता नहीं है।'

टैरिफ़ का मुद्दा

पिछले कुछ महीनों में अमेरिका ने भारतीय सामान पर टैरिफ बढ़ा दिया था। रूस से तेल खरीदने के कारण 25% अतिरिक्त सजा वाली टैरिफ भी लगाई गई थी, जिससे कुल टैरिफ 50% तक पहुंच गया था। फरवरी में दोनों देशों के बीच अंतरिम व्यापार समझौता होने के बाद अमेरिका ने सजा वाली 25% टैरिफ हटा दी और भारतीय सामान पर प्रभावी टैरिफ 18% कर दिया गया।

GTRI का बड़ा सवाल

इस बीच, मार्को रुबियो के इस ताज़ा दावा के बाद ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव यानी GTRI के संस्थापक अजय श्रीवास्तव ने कहा कि 500 अरब डॉलर का यह आंकड़ा अब पुराने समझौते पर टिका है, जो टूट चुका है।

क्यों टूटा समझौता?

फरवरी 2026 में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने जवाबी टैरिफ लगाने के कानूनी आधार को रद्द कर दिया था। इसके बाद अमेरिका ने सभी देशों पर एक समान 10% टैरिफ लगा दिया।

अब कोई खास छूट भारत को नहीं मिल रही है, इसलिए बड़ी खरीदारी का वादा करने का औचित्य कम हो गया है। GTRI ने चेतावनी दी है कि रुपया कमजोर होने, तेल महंगा होने और विदेशी पूंजी निकलने के कारण ऐसी बड़ी खरीदारी से भारत का व्यापार घाटा बढ़ सकता है और विदेशी मुद्रा भंडार कम हो सकता है।

ईटी की रिपोर्ट के अनुसार अजय श्रीवास्तव ने कहा कि भारत को रुबियो के बयान पर अपना साफ़ रुख बताना चाहिए। उन्होंने कहा कि मूल समझौते का आधार ही ख़त्म हो गया है, इसलिए नये सिरे से बातचीत का ढांचा तैयार करना चाहिए।

मौजूदा स्थिति क्या है?

भारत-अमेरिका संबंधों में टैरिफ नीति के कारण कुछ तनाव आया था, लेकिन दोनों देश अब संबंध सुधारने की कोशिश कर रहे हैं। रुबियो की यात्रा भी इसी दिशा में मानी जा रही है। भारत सरकार अभी तक रुबियो के ताजा बयान पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत को इस मुद्दे पर अपना स्पष्ट रुख बताना चाहिए कि 500 अरब डॉलर का आंकड़ा कितना अव्यावहारिक और बाध्यकारी है।

500 अरब डॉलर का यह दावा भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों में एक अहम मुद्दा बन गया है। मुद्दा सिर्फ 500 अरब डॉलर का आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह है कि क्या वह सौदा अब भी मायने रखता है जिस पर यह आंकड़ा टिका था। यह मुद्दा भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों की दिशा तय करने वाला साबित हो सकता है। दोनों देश अभी भी व्यापार को बढ़ाने के लिए बातचीत जारी रखे हुए हैं, लेकिन नये बदलावों के बाद शर्तें काफी बदल गई हैं।