एशिया के सबसे अमीर शख्स मुकेश अंबानी की कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज टेक्सास में बड़ी तेल रिफाइनरी लगाने जा रही है। 300 अरब डॉलर की इस डील को मुकेश अंबानी की राजनीतिक रणनीति बताया जा रहा है। ऐसा क्यों है, जानिए
यूएस राष्ट्रपति ट्रंप भारतीय उद्योगपति मुकेश अंबानी के साथ
ट्रंप-अंबानी रिफाइनरी डील की खास बातें
- यूएस राष्ट्रपति ने टेक्सास में रिलायंस की मदद से लगने वाली रिफाइनरी की घोषणा की है
- ट्रंप के मुताबिक यह डील 300 अरब डॉलर की है
- अभी तक रिलायंस समूह या मुकेश अंबानी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है
- क्या यह डील भारत-अमेरिका के बीच होने वाली ट्रेड डील का हिस्सा है
- भारत सरकार ने भी ट्रंप की घोषणा पर अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है।
अमेरिका में पिछले 50 वर्षों में बनने वाली पहली नई ऑयल रिफाइनरी टेक्सास में बनाई जा रही है। इसे भारत की दिग्गज कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज़ तैयार करेगी। इसकी घोषणा यूएस राष्ट्रपति ट्रंप ने की है। इस परियोजना को “एनर्जी डॉमिनेंस” यानी ऊर्जा क्षेत्र में अमेरिकी प्रभुत्व की बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश किया जा रहा है। लेकिन जब इस पूरी कहानी में शामिल लोगों, समय और पैसे के वास्तविक प्रवाह पर नज़र डाली जाती है तो मामला काफी उलझा हुआ दिखाई देता है। इसे 300 अरब डॉलर में मुकेश अंबानी को राजनीतिक संरक्षण मिलना बताया जा रहा है। जिसे अभी तक अडानी समूह पाने में नाकाम रहा है। उल्टा अडानी के खिलाफ वित्तीय फ्रॉड का मुकदमा अमेरिका में चल रहा है।
300 अरब डॉलर का सवाल
सबसे पहले 300 अरब डॉलर के आंकड़े नज़र डालिए। किसी एक रिफाइनरी के लिए यह राशि बिल्कुल भी तर्कसंगत नहीं लगती। रिलायंस की अपनी जामनगर रिफाइनरी दुनिया का सबसे बड़ा रिफाइनरी कॉम्प्लेक्स है, उसे बनाने में लगभग 6 अरब डॉलर खर्च हुए थे। यह रोज़ाना करीब 14 लाख बैरल तेल प्रोसेस करती है। इसके मुकाबले टेक्सास के ब्राउनस्विल प्रोजेक्ट को रोज़ाना लगभग 1.6 लाख बैरल प्रोसेसिंग की अनुमति मिली है। यानी इसकी क्षमता जामनगर की तुलना में लगभग नौ गुना कम है। ऐसे में इसकी वास्तविक लागत 5 से 15 अरब डॉलर के बीच होनी चाहिए। 300 अरब डॉलर तो आयरलैंड की पूरी जीडीपी के बराबर है। तो सवाल उठता है कि बाकी 280 अरब डॉलर से ज्यादा आखिर कहां जा रहे हैं? इसका जवाब अभी किसी के पास नहीं है। रिलायंस समूह या मुकेश अंबानी ने अभी तक इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है।अमेरिकी कंपनी का दिलचस्प इतिहास
टेक्सास में रिलायंस की पार्टनर कंपनी अमेरिका फर्स्ट रिफाइनिंग है। हालांकि हाल तक इसका नाम एलिमेंट फ्यूल्स होल्डिंग्स था। यह डलास स्थित एक स्टार्टअप है, जो 2015 से इसी रिफाइनरी को बनाने की कोशिश कर रहा था। करीब एक दशक तक कंपनी ने परमिट, पर्यावरणीय मंजूरियां और निर्माण से पहले की प्रक्रियाएं पूरी कीं। ब्राउनस्विल पोर्ट पर लगभग 240 एकड़ जमीन पर प्री-कंस्ट्रक्शन काम भी चल रहा है। लेकिन इस बड़े ऐलान से ठीक पहले कंपनी ने अपना नाम बदलकर “अमेरिका फर्स्ट रिफाइनिंग” कर लिया। इस नाम परिवर्तन का समय काफी दिलचस्प माना जा रहा है। क्योंकि यह ट्रंप के नारे अमेरिका फर्स्ट से मिलता हुआ है। यानी इस कंपनी को ट्रंप का संरक्षण प्राप्त है।रिलायंस और मुकेश अंबानी की भूमिका
मुकेश अंबानी की रिलायंस इंडस्ट्रीज़ केवल भारत की सबसे बड़ी ऊर्जा कंपनी नहीं है, बल्कि यह भारत की सबसे बड़ी कारोबारी कंपनी भी है। टेलीकॉम, रिटेल, मीडिया, पेट्रोकेमिकल्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे कई क्षेत्रों में इसका कारोबार फैला हुआ है। कंपनी का मार्केट कैप 230 अरब डॉलर से अधिक है और मुकेश अंबानी एशिया के सबसे अमीर व्यक्ति हैं। ऐसे में यह मानना मुश्किल है कि अंबानी टेक्सास में रिफाइनरी सिर्फ पेट्रोल बनाने के शौक में बना रहे हैं। विश्लेषकों के अनुसार वे दरअसल राजनीतिक पूंजी (Political Capital) बना रहे हैं। यानी ट्रंप से 300 अरब डॉलर का राजनीतिक संरक्षण खरीदकर वो भारत ही नहीं पूरी दुनिया में धंधा करना चाहता हैं।रूस के तेल पर अमेरिकी दबाव
अमेरिका लंबे समय से भारत पर दबाव बना रहा है कि वह रूस से तेल खरीदना कम करे। रिलायंस की जामनगर रिफाइनरी उन प्रमुख रिफाइनरियों में शामिल रही है, जो प्रतिबंधों के बावजूद रूसी कच्चे तेल को प्रोसेस करती रही हैं। अमेरिका लगातार अंबानी पर इस खरीद को कम करने का दबाव डालता रहा है। ऐसे में अंबानी एक बड़ा निवेश लेकर सामने आते हैं, जिसका नाम ही रखा जाता है “अमेरिका फर्स्ट” और इसका ऐलान ऐसे समय में किया जाता है जब अमेरिकी राष्ट्रपति को ऊर्जा क्षेत्र में एक बड़ी सफलता दिखाने की जरूरत है।युद्ध और बढ़ती तेल कीमतें
ईरान युद्ध के कारण वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास घूम फिर रही हैं। अमेरिका में पेट्रोल की कीमतें सिर्फ एक सप्ताह में 50 सेंट तक बढ़ गई हैं। ऐसे में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को ऊर्जा लागत को लेकर राजनीतिक दबाव का सामना करना पड़ रहा है, खासकर मिडटर्म चुनावों से पहले। और ठीक उसी समय 300 अरब डॉलर के निवेश की यह बड़ी खबर सामने आती है।ट्रंप-अंबानी डीलः किसे क्या फायदा?
इस पूरे घटनाक्रम में दोनों पक्षों को फायदा मिलता दिख रहा है। अंबानी को अमेरिका में राजनीतिक समर्थन मिलेगा। ट्रंप को ऊर्जा क्षेत्र में बड़ी निवेश खबर और मिड टर्म चुनाव में राजनीतिक लाभ मिलेगा। संभव है कि यह रिफाइनरी 2027 तक बने, लेकिन यह अभी निश्चित नहीं है। कुछ विश्लेषकों के अनुसार यह केवल एक व्यापारिक समझौता नहीं बल्कि रणनीतिक सौदा भी हो सकता है। अमेरिका यदि रिलायंस पर रूसी तेल खरीदने को लेकर दबाव कम करता है, तो कंपनी को अरबों डॉलर का फायदा हो सकता है क्योंकि प्रतिबंधित रूसी तेल भारी छूट पर मिलती है। ऐसे में 300 अरब डॉलर की सुर्खी राजनीतिक तौर पर बहुत बड़ा संरक्षण खरीद सकती है।अमेरिकी परियोजना की वास्तविक क्षमता
राजनीतिक विवादों से अलग देखें तो यह परियोजना तकनीकी रूप से महत्वपूर्ण भी हो सकती है। ब्राउनस्विल अमेरिका-मेक्सिको सीमा पर स्थित है। यहां डीप-वॉटर पोर्ट है। पर्मियन बेसिन पाइपलाइन की सीधी पहुंच है। फ्री ट्रेड ज़ोन की सुविधा है। परियोजना में हाइड्रोजन-आधारित प्रोसेसिंग की योजना है, जिससे यह दुनिया की सबसे स्वच्छ रिफाइनरियों में से एक बन सकती है। यदि यह वास्तव में बनती है तो यह टेक्सास के आर्थिक रूप से कमजोर क्षेत्रों में बड़ा बदलाव ला सकती है।मूल सवालः यह घोषणा अभी क्यों की गई
300 अरब डॉलर का आंकड़ा इंजीनियरिंग या धंधे का नहीं, बल्कि राजनीति का आंकड़ा है। और जिस समय यह घोषणा हुई, तेल संकट बना हुआ है, कीमतें ऊपर नीचे जा रही है। ईरान युद्ध से वैश्विक आपूर्ति का लगभग 20% हिस्सा प्रभावित हो रहा है। अमेरिका में पेट्रोल महंगा हो रहा है। और मिडटर्म चुनाव नजदीक हैं। ये सभी बातें बताती हैं कि यह घोषणा इसी समय क्यों की गई। दरअसल, यह एशिया के सबसे अमीर व्यक्ति और अमेरिका के सबसे शक्तिशाली नेता के बीच एक रणनीतिक हैंडशेक जैसा है। दोनों को इससे वह मिल सकता है जिसकी उन्हें जरूरत है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल अभी भी वही है- क्या इससे अमेरिकी उपभोक्ताओं को वास्तव में कोई फायदा मिलेगा, या यह भी एक ऐसी घोषणा साबित होगी जो कागजों पर बड़ी दिखती है लेकिन कुछ महीनों बाद गायब हो जाती है।