एनसीईआरटी पर सुप्रीम कोर्ट सख़्त
आज के इस कॉलम की शुरुआत 1968 के प्रसिद्ध ब्रिटिश न्यायिक मामले ‘कमिश्नर ऑफ़ पुलिस ऑफ़ मेट्रोपॉलिस’ से कर रही हूँ। इस मामले में क्विंटन हॉग के ख़िलाफ़ उनके एक लेख को लेकर ‘न्यायालय की अवमानना’ का मामला दर्ज हुआ था। मामले की सुनवाई प्रसिद्ध न्यायधीश लॉर्ड डेनिंग कर रहे थे। क्विंटन हॉग के लेख में न्यायालय की बेहद सख़्त आलोचना की गई थी। तमाम आशंकाओं के उलट अपने फ़ैसले में लॉर्ड डेनिंग ने कहा कि “हम इस अधिकार-क्षेत्र का उपयोग कभी भी अपनी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा बनाए रखने के साधन के रूप में नहीं करेंगे। वह कहीं अधिक मजबूत आधारों पर टिकी होनी चाहिए। और न ही हम इसका प्रयोग उन लोगों को दबाने के लिए करेंगे जो हमारे विरुद्ध बोलते हैं। हम आलोचना से न तो डरते हैं और न ही उससे नाराज़ होते हैं।”
लेकिन आज भारत में साल 2026 भी 1968 से पिछड़ा हुआ दिखाई पड़ रहा है। 26 फ़रवरी, 2026 को भारत के उच्चतम न्यायालय ने कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की NCERT पुस्तक के एक अध्याय ‘हमारी न्यायपालिका की भूमिका’ और इसके एक हिस्से ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ को लेकर कठोर टिप्पणी करते हुए इसे तुरंत वापस लेने को कहा था। साथ ही NCERT से इस सम्बन्ध में जवाब भी मांगा था। 11 मार्च को जब NCERT ने इस चैप्टर को दोबारा लिखकर दिया तब भी सर्वोच्च न्यायालय संतुष्ट नहीं हुआ और उसने किताब लिखने वाले लेखकों को ब्लैकलिस्ट करने का आदेश दे दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
न्यायालय ने कहा कि “हमारे पास संदेह करने का कोई कारण नहीं है कि या तो प्रोफेसर मिशेल डैनियन और उनके सहयोगी सुपर्णा दिवाकर तथा आलोक प्रसन्ना कुमार के पास भारतीय न्यायपालिका के संबंध में पर्याप्त और सूचित ज्ञान नहीं है, या फिर उन्होंने जानबूझकर और समझते हुए तथ्यों को गलत ढंग से प्रस्तुत किया, जिससे कक्षा 8 के विद्यार्थियों के सामने भारतीय न्यायपालिका की नकारात्मक छवि प्रस्तुत की जा सके।” इतना ही नहीं, उच्चतम न्यायालय ने दो कदम और आगे बढ़कर यह भी कहा कि “हम यह समझने का कोई कारण नहीं देखते कि इस प्रकार के व्यक्तियों को इस देश की अगली पीढ़ी के लिए पाठ्यक्रम तैयार करने या पाठ्यपुस्तकों को अंतिम रूप देने के उद्देश्य से किसी भी प्रकार से क्यों जोड़ा जाए।।” इसके बाद सर्वोच्च न्यायालय ने भारत सरकार, राज्य सरकारों/केंद्र शासित प्रदेशों, विश्वविद्यालयों और सरकारी निधि प्राप्त करने वाली सभी सार्वजनिक संस्थाओं को निर्देश दिया कि वे तत्काल प्रभाव से इन तीनों शिक्षकों से स्वयं को अलग कर लें और उन्हें ऐसी कोई भी जिम्मेदारी न सौंपें जिसमें पूरी तरह या आंशिक रूप से सार्वजनिक धन खर्च होता हो।सुप्रीम कोर्ट NCERT से नाराज़ क्यों?
सवाल यह है कि भारत के सर्वोच्च न्यायालय को इतना कठोर होने की ज़रूरत क्यों पड़ी? पहली बात, तो यह कि तीनों लेखक अकादमिक जगत से जुड़े हैं और प्रोफेसर मिशेल डैनियन ना सिर्फ़ सामाजिक विज्ञान की एनसीईआरटी की पुस्तकों का करिकुलम बनाने वाली समिति के अध्यक्ष हैं बल्कि उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (2020) को बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका भी निभाई थी। इसके अलावा प्रोफ़ेसर डैनियन भारत के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म श्री से भी सम्मानित हैं(2017)। सुपर्णा दिवाकर शिक्षाविद हैं और आलोक प्रसन्ना कुमार लीगल शोधकर्ता हैं। इसका मतलब यह है कि प्रथम दृष्टया सरकार ने इन्हें सड़क से उठाकर NCERT का करिकुलम बनाने के लिए नियुक्त नहीं किया था। अब दूसरी बात यह कि ऐसा बिल्कुल हो सकता है कि संविधान का अभिरक्षक और एक जिम्मेदार और भारत के सबसे भरोसेमंद संस्थान के तौर पर सर्वोच्च न्यायालय एनसीईआरटी के इस चैप्टर से नाखुश होता और अपनी प्रतिक्रिया देते हुए सरकार से एक अन्य समिति बनाने के लिए कहता जो वर्तमान चैप्टर के कंटेंट पर विचार करता और खामियों को, अगर वो हैं तो, ठीक कर दिया जाता। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ऐसा क्यों नहीं हुआ यह सोचने वाली बात है।
शिक्षकों का अपमान क्यों?
सरकार द्वारा इन तीनों शिक्षकों को उनकी योग्यता के आधार पर नियुक्त किया गया था, ऐसे में उन्हें इतनी अकादमिक स्वतंत्रता तो होनी ही चाहिए कि वो अपने तरीके से एक ‘संतुलित’ पाठ्यक्रम बना सकें। यदि चैप्टर का कंटेंट न्यायपालिका को पसंद नहीं आया तो इसके लिए इन तीनों सदस्यों को अपमानित करने की क्या ज़रूरत थी? सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण, जो दशकों से भारत के संविधान और न्यापालिका से ठीक तरह से परिचित हैं उन्होंने कहा कि “मैंने कक्षा 8 की नई NCERT पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका पर लिखा गया 18 पन्नों का अध्याय पढ़ा है। मुझे यह अध्याय न्यायपालिका की संरचना, भूमिका और उपलब्धियों के बारे में संतुलित प्रतीत होता है। इसके अंतिम दो पन्नों में न्यायपालिका के सामने मौजूद चुनौतियों और उनके कारण होने वाले विलम्ब और भ्रष्टाचार का उल्लेख किया गया है।” ऐसी ही राय कई अन्य लोगों की भी हो सकती है। ऐसे में इस मुद्दे से निपटने के लिए इस अवांछित कठोरता से बचना चाहिए था क्योंकि यह अच्छा संकेत नहीं दे रहा है। प्रशांत भूषण ने आगे कहासर्वोच्च न्यायालय का यह भोंडा और अविचारित आदेश आत्मघाती कदम साबित हुआ है, जिसने न्यायपालिका में भ्रष्टाचार की समस्या को और अधिक उजागर कर दिया है। प्रशांत भूषण
सुप्रीम कोर्ट वकील
मैं कोई नहीं हूँ जो भारत के सर्वोच्च न्यायालय को कुछ कह सकूँ लेकिन कम से कम इतना तो कहना ही चाहूंगी कि संविधान के अभिरक्षक को या तो थोड़ा और सहनशील और उदार होना चाहिए या फिर हर घटना को इतनी ही कठोरता और तत्परता से देखना चाहिए। भारत का सर्वोच्च न्यायालय भारत के लिए सिर्फ़ एक संवैधानिक संस्थान भर नहीं है बल्कि यह नागरिकों का एक ‘हीरो’ है। एक हीरो के मुँह से कठोर भाषा सिर्फ़ अपराधियों के बारे में निकलनी चाहिए, देश को तोड़ने वालों और देश के संस्थानों को बर्बाद करने वालों के ख़िलाफ़ होनी चाहिए न कि शिक्षकों और शिक्षाविदों के ख़िलाफ़। अत्यावश्यक विमर्श को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, शिक्षकों के ख़िलाफ़ ऐसे कठोर आदेशों को नहीं।
वैसे, इन्हीं सामाजिक विज्ञान की किताबों में मुसलमान शासकों को क्रूर कहा गया और हिंदू शासकों के गुणगान गाये गए हैं जबकि बहुत से हिंदू शासक क्रूरता करते हुए इतिहास में दर्ज हैं और सभी मुसलमान शासक क्रूर नहीं रहे हैं लेकिन सर्वोच्च न्यायपालिका को उनसे कोई आपत्ति नहीं है।
यह बात भी बहुत चिंता करने वाली है कि न्यायपालिका को अपना बचाव ख़ुद ही करना पड़ रहा है। सवाल यह है कि यह नागरिकों पर क्यों नहीं छोड़ दिया जाता कि वो अपनी न्यायपालिका को कैसे देखें। कोई एक चैप्टर एक झटके में भारत की न्यायपालिका के योगदान को समाप्त नहीं कर सकता। भारत के वर्तमान अखंड और नागरिकोन्मुखी विन्यास के लिए न्यायपालिका ही को श्रेय दिया जाना चाहिए और दिया भी जाता है। ‘न्यायपालिका की अवमानना’ या अपमान की अवधारणा पुरानी और जर्जर हो चुकी है। दुनियाभर की न्यायपालिकाएँ इसे पुरानी और ग़ैर-जरूरी समझकर निकालकर बाहर कर रही हैं।
ब्रिटेन में तो सुधार हुआ
ब्रिटिश विधि आयोग की सिफारिशों के आधार पर यूनाइटेड किंगडम की संसद ने ‘क्राइम एंड कोर्ट्स एक्ट, 2013’ के माध्यम से ‘न्यायपालिका के अपमान’/ ‘न्यायालय के अपमान’ नाम के अपराध को अब समाप्त कर दिया गया है। वहाँ लोगों का मानना है कि न्यायपालिका का सम्मान कानून के डर से नहीं बल्कि उसके कामकाज से आना चाहिए।
11 मार्च के अपने आदेश में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने सोशल मीडिया पर भी कड़ा रूख अपनाते हुए कहा कि “26 फ़रवरी 2026 के आदेश के पारित होने के बाद सोशल मीडिया में कुछ तत्व सक्रिय हो गए और उन्होंने गैर-जिम्मेदाराना प्रतिक्रिया दी। हम दृढ़ता से मानते हैं कि समस्या का सीधे सामना करना चाहिए। इसलिए हम भारत सरकार को निर्देश देते हैं कि ऐसे सभी साइटों की पहचान की जाए, उन साइटों को चलाने वाले व्यक्तियों का पता लगाया जाए और उनका पूरा विवरण हमें उपलब्ध कराया जाए, जिससे हम उपयुक्त कार्रवाई कर सकें। कानून के अनुसार कार्यवाही होगी।”
न्यायपालिका क्या करे?
मेरा सवाल है, इससे क्या हासिल होगा? न्यायपालिका को समझना होगा कि सोशल मीडिया इस दौर की नई हक़ीक़त है इससे किस तरह निपटना है वो कम से कम ये तरीक़ा तो नहीं हो सकता, कैसे निपटना है ये आना चाहिए अन्यथा सबकुछ उल्टा पड़ सकता है। कुछ फ्रिंज एलिमेंट्स और गालियाँ बकने वाले लोगों को छोड़ दिया जाये तो सोशल मीडिया तमाम ऐसे सवाल उठाता है जिन्हें न संसद अपने पटल पर उठाने लायक समझती है और न ही न्यायपालिका। आलोचना में गालियों का स्थान नहीं होना चाहिए और न ही असभ्यता का लेकिन तीखी से तीखी आलोचना की जा सके, सर्वोच्च न्यायालय को यह सुनिश्चित करना होगा फिर चाहे यह आलोचना ख़ुद सर्वोच्च न्यायालय के ख़िलाफ़ ही क्यों ना हो। इसी में एक सवाल और जोड़ देती हूँ क्योंकि जोड़ना ज़रूरी है। गालियों का इस्तेमाल सिर्फ़ न्यायपालिका के ख़िलाफ़ न हो, यह तर्कहीन बात है। कोई नेता, कोई अधिकारी, कोई महिला या कोई भी आम आदमी खुलेआम गालियाँ क्यों खाए या उसे कोई गालियाँ क्यों सुनाये? आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी ख़तरनाक़ और कटिंग एज टेक्नोलॉजी उपलब्ध होने के बावजूद कम्पनियाँ गालियों के इस्तेमाल पर प्रतिबन्ध नहीं लगा रही हैं और न ही सरकार किसी प्रकार की रोक टोक लगा रही है। टेक कंपनियां जानबूझकर गालियों के इस्तेमाल को ख़त्म नहीं कर रही हैं। क्योंकि सोशल मीडिया में गालियाँ ‘इंगेजमेंट’ बढ़ाता है और इस इंगेजमेंट से कम्पनियाँ पैसा कमाती हैं। कहने का मतलब, टेक कंपनियों को पैसा बनाना है इसलिए आम लोग गालियाँ खाते हैं। अगर कोई आदेश या दिशानिर्देश आए तो वो कम से कम इतना व्यापक तो होना ही चाहिए कि सबकी गरिमा बनी रहे, सबकी मर्यादाएं बची रहें अन्यथा सिर्फ़ ख़ुद की साख बचाने के ये तौर तरीके न्यायपालिका की साख और गिरा ही देंगे।
सर्वोच्च न्यायालय को कई ज़रूरी सवाल ख़ुद से भी पूछने चाहिए। उसमें से एक ये है कि क्या वाक़ई न्यायपालिका में भ्रष्टाचार नहीं है? अगर है तो क्या इस पर सिर्फ़ इसलिए बात नहीं करनी चाहिए कि यह न्यायपालिका से संबंधित है?
मेरी समझ यह कहती है कि संविधान ने भले सर्वोच्च न्यायालय को अभिरक्षक समझा हो लेकिन शक्तियों का बँटवारा बहुत सोच समझकर किया गया है। भले ही सर्वोच्च न्यायालय मुझे या मेरे जैसे कई अन्यों को लिखने या बोलने से रोक दे, अपनी प्रतिक्रिया देने से रोक दे लेकिन संविधान यह प्रावधान करता है कि संसद के भीतर की गई किसी भी बात के लिए किसी भी सदस्य के ख़िलाफ़ किसी भी अदालत में कोई भी वाद नहीं लाया जा सकेगा। इसका मतलब अगर आम लोगों को बोलने से रोका जाएगा तो संसद में आवाज़ उठेगी। राज्यसभा में एक महिला सांसद ने यह मुद्दा उठाया भी है जिसमें जस्टिस यशवंत वर्मा और उनके भ्रष्टाचार का ज़िक्र किया गया है। 13 फ़रवरी, 2026 को एक सवाल का जवाब देते हुए कानून मंत्री अर्जुनराम मेघवाल ने बताया कि वर्ष 2016 से 2025 के बीच भारत के मुख्य न्यायाधीश को सेवारत न्यायाधीशों के ख़िलाफ़ 8,630 शिकायतें मिली हैं। इनकी संख्या पिछले दो-तीन सालों में लगातार बढ़ रही है। लेकिन मंत्री जी को शिकायतों के बारे में नहीं पता था कि क्या ये शिकायतें यौन अपराधों, भ्रष्टाचार या किसी अन्य मामले से जुड़ी हैं! मंत्री जी का कहना था कि CJI और उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीश इन शिकायतों के निपटारे के लिए ‘इन हाउस प्रक्रिया’ अपनाते हैं। मेरा सवाल है कि क्या यह सही तरीका है? क्या यह सही तरीका था कि एक मुख्य न्यायाधीश अपने ख़िलाफ़ यौन अपराध की सुनवाई ख़ुद करे वो भी बंद कमरे में?
अगर न्यायपालिका में ही न्याय को लेकर संकुचित दृष्टिकोण अपनाया जाएगा तो आम लोगों के बीच से प्रतिक्रिया आएगी ही। इस प्रतिक्रिया को कुचलने का प्रयास तो किया जा सकता है लेकिन यह प्रयास भारत जैसे देशों में कभी सफल नहीं हो सकते। मुझे लगता है कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय को एनसीईआरटी के संबंध में अपनी प्रतिक्रिया पर फिर से सोचना चाहिए और सोशल मीडिया के विनियमन के बारे में भी बहुआयामी सोच रखनी चाहिए अन्यथा नुकसान हो सकता है।