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न्यायाधीश फिर बता रहे हैं कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता...

ये पाँच साल भारत की हर संवैधानिक संस्था के ढहने के साल हैं। एक तरह से हर संस्था ने ख़ुद अपने ख़िलाफ़ विद्रोह कर दिया है। न्यायालय का इस क़तार में शामिल हो जाना भारत का अंत होगा।
अपूर्वानंद

एक बार फिर हमारे न्यायाधीश हमें बता रहे हैं कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता को अभूतपूर्व ख़तरा है। शनिवार, 20 अप्रैल को तीन सदस्यीय पीठ की एक असाधारण बैठक हुई। सुनवाई के बारे में न्यायालय की ओर से जारी नोटिस में कहा गया कि यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता से सम्बंधित एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण सार्वजनिक मसले को लेकर थी। शनिवार, छुट्टी के रोज़ भारत के मुख्य न्यायाधीश सहित दो और न्यायमूर्तियों के इस पीठ के बैठने से कुछ वैसी ही सनसनी फैलनी चाहिए थी, जैसी पिछले वर्ष चार न्यायाधीशों की असाधारण प्रेस कॉन्फ़्रेन्स से हुई थी। वह भी देश की जनता को जनतंत्र के समक्ष उठ खड़े हुए असाधारण ख़तरे से सावधान करने के लिए थी। लेकिन शनिवार की सुनवाई, तुरंत ही मालूम हो गया कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर आसन्न किसी आपदा की चिंता से नहीं, बल्कि उच्चतम न्यायालय की एक पूर्व कर्मचारी द्वारा मुख्य न्यायाधीश पर लगाए गए आरोपों के प्रकाशित हो जाने के चलते उनकी प्रतिष्ठा पर आई आँच से उन्हें बचाने की फ़िक्र के कारण की जा रही थी।

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गंभीर मामला

यह प्रसंग सिर्फ़ इसलिए गंभीर नहीं है कि कर्मचारी ने मुख्य न्यायाधीश पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया है, बल्कि इसलिए कि उसने तारीख़वार और सारे ब्योरों के साथ एक लिखित शिकायत उच्चतम न्यायालय के सारे न्यायाधीशों को भेजी है। उस स्त्री कर्मी को मालूम है कि वह क्या कर रही है और किस ताक़त के सामने खड़ी हो रही है। उसके आरोप ग़लत पाए जाने की सज़ा का उसे अन्दाज़ न हो, ऐसा मानना कठिन है।

उसके आरोप से मुख्य न्यायाधीश की प्रतिष्ठा दाँव पर है, लेकिन शिकायत करने मात्र से उस स्त्री का ही नहीं, उसके पूरे परिवार के सामान्य जीवन पर जो संकट है, उसके बारे में भी बात करना ज़रूरी है।

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इस सुनवाई से को लेकर सहज ही कई सवाल खड़े हो गए। क्या जिस पर आरोप हैं, वही उन पर विचार कर सकता है?
जब विचारपति पर आरोप हों, तो उचित यही है कि अपनी सफ़ाई और अपनी रक्षा करने के न्यायसंगत अधिकार से अधिक वह कुछ न करे। यानी कम से कम वह अपने पद और अधिकार का उपयोग उस आरोप को लेकर अपनी हिफ़ाज़त के लिए और आरोप लगाने वाली को अरक्षित करने के लिए न करे।

न्यायाधीश अपवाद होते हैं?

इसीलिए संस्था प्रमुख पर जब इस क़िस्म का इल्ज़ाम लगता है, तो जाँच की अवधि तक उसे निर्णयकारी जगहों से हट जाने के प्रावधान हैं। पिछले दिनों एक मंत्री को इसके कारण इस्तीफ़ा देते और संपादकों को पद छोड़ते देखा गया है। तो क्या न्यायाधीश मात्र इसलिए अपवाद हैं कि वे न्यायाधीश हैं? क्या ख़ुद ऐसे मसले पहले नहीं हुए हैं, जिनमें न्यायाधीशों पर इल्ज़ाम लगा है और कम से कम एक मामले में, जो यौन उत्पीड़न का नहीं था, एक न्यायाधीश को ख़ुद अदालत ने जेल भेजा? यह कोई मौलिक बात नहीं कि न्यायाधीश ख़ुद हम फ़ानी इंसानों में से ही हैं और उनकी कमज़ोरियाँ कभी उन्हें भी जकड़ सकती हैं।

दूसरे कि जब यह पीठ ख़ुद मुख्य न्यायाधीश ने गठित की तो फिर इसमें भारत के मुख्य न्यायाधिकारियों को इस प्रसंग की ओर पीठ का ध्यान खींचने की, जिसे ‘मेन्शन’ करना कहते हैं, क्यों ज़रूरत पड़ी? जब ख़ुद मुख्य न्यायाधीश जन्म-मरण जैसे मसले को छोड़कर किसी भी अन्य प्रसंग में ‘मेन्शन’ करने की प्रथा के ख़िलाफ़ बोल चुके हैं, तो इस मामले में क्यों उन्होंने इसकी इजाज़त दी?

प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन

अगर सुनवाई की प्रक्रिया को देखें तो प्राकृतिक न्याय के कुछ सवाल उठते हैं। क्या यह स्त्री कर्मी के आरोप पर सुनवाई थी? या, यह उन आरोपों को प्रकाशित करने वाले मीडिया संस्थानों के ख़िलाफ़ थी? क्योंकि जो आदेश पीठ ने सुनाया उसमें मीडिया को मशविरा दिया गया कि वह इससे संबंधित कुछ भी न छापे। पीठ ने निर्देश देने के प्रलोभन पर नियंत्रण किया, वह तो ठीक, लेकिन ख़ुद उसने खुल कर धड़ल्ले से आरोप लगाने वाली स्त्री को ‘ब्लैकमेलर’, ‘अविश्वसनीय’, और ’झूठी’ घोषित कर दिया। उस महिला को सुनवाई में बुलाया नहीं गया। कहा जा सकता है कि संदर्भ उसकी शिकायत नहीं, आरोप के कारण न्यायाधीश और प्रकारांतर से न्यायपालिका की साख की रक्षा का था। लेकिन क्या ऐसा करते हुए भारत के एक नागरिक को अपनी रक्षा के अधिकारों से वंचित करना न्यायसंगत था?
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क्या यह न्यायिक सुनवाई थी या एक क़िस्म की प्रेस कॉन्फ़्रेन्स? अगर इसमें मुख्य न्यायाधीश ख़ुद बैठे तो आदेश में उनकी उपस्थिति का कोई ज़िक्र क्यों नहीं?
क्या यह किया जा सकता है कि मैं सुनवाई के दौरान तो बोलता रहूँ लेकिन अंतिम चरण में ख़ुद को अलग कर लूँ? यह असाधारण है और काफ़ी चिंताजनक है क्योंकि यह किसी भी तरह जायज़ नहीं ठहराया जा सकता।

तय प्रक्रिया का उल्लंघन?

यह प्रश्न भी है कि क्योंकर न्यायाधिकारियों ने अदालत को यह सलाह नहीं दी कि ऐसे मामलों में एक प्रक्रिया निर्धारित है, एक समिति गठित हो सकती है और उसी रास्ते मुख्य न्यायाधीश को जाना चाहिए? क्यों इस सुनवाई में सारे पुरुष थे और कोई महिला न्यायाधीश नहीं थीं?

क्यों न्यायाधिकारियों ने और बार असोसिएशन के अध्यक्ष ने भी शिकायत करने वाली स्त्री को मिथ्याचारी घोषित कर दिया? क्या अध्यक्ष ने संस्था की बैठक की, उसके किसी निकाय से राय ली?

आरोप परेशान करने और यौन दुर्व्यवहार के थे, फिर मुख्य न्यायाधीश अपने बैंक खाते और अपनी सामान्य आर्थिक स्थिति का हवाला क्यों दे रहे थे? क्या हर प्रकार के दुष्कर्म या अपराध से आर्थिक लाभ होता है? यह दलील कि मैं आर्थिक रूप से ईमानदार हूँ, क्या मुझे हर आरोप से बरी करने के लिए पर्याप्त है?
आरोप एक व्यक्ति पर हैं, पूरी न्यायपालिका पर नहीं। इसे न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर आक्रमण के रूप में पेश करना या किसी बड़ी साज़िश का हिस्सा बताना अतिरंजित प्रतिक्रिया है और इससे बचा जा सकता था।

सुनवाई के दौरान न्यायाधिकारी अपनी शिकायतें लेकर बैठ गए। एटार्नी जनरल वेणुगोपाल साहब की शिकायत थी कि सरकार का पक्ष लेने के कारण उन पर हमले हुए।

अभिजन का विशेषाधिकार

ये सब, यानी न्यायाधीश, न्यायाधिकारी, बार असोसिएशन के अध्यक्ष जब मिलकर एक ही बात कहने लगें तो एक अजीब तस्वीर उभरती है। यह एक अभिजन समूह के अपने विशेषाधिकार का एलान है और किसी को उसे विचलित करने के ख़िलाफ़ डराना ही है।

यह अच्छा है कि न सिर्फ़ वायर, स्क्रोल और कारवान ने इस मामले की ख़बर देना जारी रखा है, बल्कि यह भी कि वक़ील भी खुल कर बोल रहे हैं। यह भी अच्छा है कि इस मसले में महिला वकीलों की संस्थाएँ, अलग-अलग, वे ख़ुद और उनके साथ पुरुष वक़ील भी बोल रहे हैं। 

मुमकिन है कि शिकायती स्त्री की कहानी ग़लत निकले, मुमकिन है इसके पीछे कोई साज़िश हो, लेकिन यह सब कुछ बिना किसी जाँच के सिर्फ़ अपनी असाधारण शक्ति के सहारे घोषित करना इस संस्था की साख को और कमज़ोर करता है, मजबूत नहीं।

ये पाँच साल भारत की हर संवैधानिक संस्था के ढहने के साल हैं। एक तरह से हर संस्था ने ख़ुद अपने ख़िलाफ़ विद्रोह कर दिया है। न्यायालय का इस क़तार में शामिल हो जाना भारत का अंत होगा।

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