ऐसा लगता है कि राहुल गाँधी के सामाजिक न्याय के मुद्दे और भागीदारी के सवाल को मिल रहे समर्थन से बीजेपी ही नहीं आरएसएस भी घबरा गया है। बिहार में
राहुल गाँधी की वोट अधिकार यात्रा को मिले अभूतपूर्व समर्थन ने चिंता और बढ़ा दी है। यही वजह है कि
आरएसएस सरसंघचालक मोहन भागवत इशारों में काशी और मथुरा से जुड़े मंदिरों के विवाद को गरमाने का संकेत दिया है। उन्होंने यह तो कहा है कि संघ ख़ुद इस आंदोलन में भाग नहीं लेगा लेकिन स्वयंसेवकों को इसमें शामिल होने की छूट देकर उन्होंने इरादा साफ़ कर दिया है। यानी राहुल के सामाजिक न्याय एजेंडे की काट में काशी और मथुरा का मुद्दा गरमााय जाएगा।
28 अगस्त 2025 को दिल्ली के भारत मंडपम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस का तीन दिवसीय समागम समाप्त हुआ। इस दौरान सरसंघचालक मोहन भागवत ने समाज के विभिन्न वर्गों को आरएसएस के विचारों और कार्यों से परिचित कराने का प्रयास किया। उन्होंने कहा, “राम मंदिर आंदोलन ही एकमात्र ऐसा आंदोलन था, जिसे आरएसएस ने समर्थन दिया। काशी और मथुरा जैसे अन्य आंदोलनों को आरएसएस समर्थन नहीं देगा, लेकिन स्वयंसेवकों को इनमें शामिल होने की छूट होगी।”
इस बयान ने कई सवाल खड़े किए हैं। क्या यह आरएसएस का दोहरा रवैया नहीं है? क्या काशी और मथुरा के लिए नया आंदोलन शुरू होने वाला है? क्या यह पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 का उल्लंघन नहीं होगा? और सबसे बड़ा सवाल, क्या आरएसएस धार्मिक ध्रुवीकरण के ज़रिए राजनीतिक शक्ति हासिल करने के लिए देश को हिंदू-मुस्लिम विवाद में उलझाए रखना चाहता है?
मोहन भागवत का छिपा संदेश
मोहन भागवत के बयान को गहराई से देखें तो यह साफ है कि भले ही आरएसएस आधिकारिक रूप से काशी और मथुरा के लिए आंदोलन का समर्थन न करे, लेकिन स्वयंसेवकों को इसमें शामिल होने की छूट देकर वह अप्रत्यक्ष रूप से इन आंदोलनों को हवा दे रहा है। भागवत ने यह भी कहा कि “भाईचारा बनाए रखने के लिए काशी और मथुरा को हिंदुओं को सौंप देना चाहिए।” यह बयान एक सुझाव से ज्यादा एक छिपी धमकी प्रतीत होता है। यह पुराने नारे “अयोध्या तो झाँकी है, काशी-मथुरा बाकी है” की याद दिलाता है।
भागवत का यह बयान पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 के खिलाफ जाता है, जो 15 अगस्त 1947 की स्थिति में किसी भी पूजा स्थल के धार्मिक स्वरूप को बदलने पर रोक लगाता है। इस कानून का उद्देश्य सांप्रदायिक सद्भाव बनाए रखना है। लेकिन भागवत का बयान स्वयंसेवकों को इस कानून की “धज्जियाँ उड़ाने” की छूट देता प्रतीत होता है।
राहुल गांधी का ख़ौफ़
इस बयान का समय भी महत्वपूर्ण है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी लगातार आरएसएस और बीजेपी पर हमलावर हैं। उनके लिए बीजेपी और मोदी सरकार आरएसएस की ही परियोजना हैं। राहुल गांधी ने वोट चोरी से लेकर सामाजिक न्याय और भागीदारी जैसे मुद्दों को जोर-शोर से उठाया है, जिससे बीजेपी से ज्यादा आरएसएस चिंतित है। 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को पूर्ण बहुमत न मिलने से आरएसएस के “हिंदू एकता” के स्वप्न को झटका लगा है।
काशी और मथुरा जैसे मुद्दों को फिर से उठाकर धार्मिक ध्रुवीकरण की रणनीति अपनाई जा रही है, जिसने कभी बीजेपी को दो सीटों से संसद में बहुमत तक पहुँचाया था।
पूजा स्थल अधिनियम और अयोध्या
1991 में नरसिम्हा राव सरकार द्वारा बनाया गया पूजा स्थल अधिनियम यह सुनिश्चित करता है कि किसी भी पूजा स्थल का धार्मिक स्वरूप बदला न जाए। अयोध्या को इस कानून से बाहर रखा गया था, क्योंकि वहाँ का मामला पहले से ही अदालत में था। 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद के विध्वंस ने इस कानून की भावना को चुनौती दी थी। हालाँकि, 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ किया।
सुप्रीम कोर्ट का वह फ़ैसला अपने आप में विवादास्पद था। कोर्ट ने माना कि मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाने के कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं हैं और मस्जिद का विध्वंस एक आपराधिक कृत्य था। फिर भी, फैसला मंदिर के पक्ष में गया और मस्जिद के लिए वैकल्पिक जमीन आवंटित की गई। इस फैसले को सभी पक्षों ने स्वीकार कर लिया, लेकिन यह सवाल उठता है कि क्या काशी और मथुरा के मसले भी इसी तरह सड़कों पर हल किए जाएँगे?
काशी और मथुरा
यह ऐतिहासिक सच है कि काशी और मथुरा के मंदिरों को मध्यकाल में तोड़ा गया था। लेकिन यह भी सच है कि इन स्थानों पर हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच समझौते हुए, जिसके परिणामस्वरूप काशी में विश्वनाथ मंदिर और मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि मंदिर में पूजा-अर्चना होती है। यदि कोई विवाद है, तो वह अदालतों में है और उसका समाधान कानूनी तरीके से होना चाहिए। लेकिन आरएसएस और उससे जुड़े संगठनों का इतिहास बताता है कि वे धार्मिक ध्रुवीकरण के जरिए राजनीतिक शक्ति हासिल करने की रणनीति अपनाते हैं।
राम मंदिर आंदोलन
वरिष्ठ पत्रकार शीतला सिंह की किताब अयोध्या- रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद का सच में खुलासा किया गया है कि 1987 में राम मंदिर विवाद को सुलझाने के लिए एक सर्वसम्मत फॉर्मूला तैयार हो गया था। अयोध्या विकास ट्रस्ट ने बिना मस्जिद तोड़े मंदिर बनाने का प्रस्ताव रखा था, जिसे मुस्लिम पक्ष और विश्व हिंदू परिषद के नेता अशोक सिंघल ने भी स्वीकार किया था। इस समझौते की खबर आरएसएस के मुखपत्र पांचजन्य और ऑर्गनाइजर में भी छपी थी।
लेकिन, शीतला सिंह के अनुसार, आरएसएस के तत्कालीन सरसंघचालक बाला साहेब देवरस ने इस समझौते का विरोध किया। उन्होंने अशोक सिंघल को फटकार लगाते हुए कहा कि राम मंदिर आंदोलन का मकसद मंदिर बनाना नहीं, बल्कि धार्मिक ध्रुवीकरण के ज़रिए सत्ता हासिल करना था। यह खुलासा साफ़ करता है कि आरएसएस के लिए धार्मिक मुद्दे सत्ता तक पहुँचने का ज़रिया रहे हैं।
इतिहास कैसे सुधरेगा?
अगर काशी और मथुरा को लेकर आंदोलन शुरू होता है तो यह सवाल उठता है कि क्या मध्यकाल की सभी गलतियों को सुधारने की कोशिश की जाएगी? स्वामी विवेकानंद ने लिखा है कि उड़ीसा का जगन्नाथ मंदिर मूल रूप से एक बौद्ध विहार था, जिसे हिंदू मंदिर में बदला गया। इसी तरह, महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने बद्रीनाथ मंदिर की मूर्ति को बुद्ध की मूर्ति बताया है। बिहार के बोधगया में भी बौद्धों का आंदोलन चल रहा है, जो महाबोधि मंदिर को अपने नियंत्रण में लेने की माँग कर रहे हैं।
बोधगया में सम्राट अशोक द्वारा तीसरी शताब्दी ईसापूर्व में बनवाया गया मंदिर बौद्ध धर्म के खिलाफ अभियान में खंडहर हो गया था। सोलहवीं सदी में इसे शैव मठ में बदल दिया गया। यह मंदिर बौद्धों की आस्था का केंद्र है पर इसके प्रबंधन में हिंदुओं को शामिल किया गया है। बौद्ध इस मंदिर का पूरा प्रबंधन अपने हाथ में लेने के लिए आंदोलन कर रहे हैं। क्या आरएसएस कभी यह कहेगा कि जगन्नाथ, बद्रीनाथ या बोधगया को बौद्धों को सौंप देना चाहिए?
भारत के भविष्य पर ग्रहण?
भारत का संविधान सभी नागरिकों को धर्म, जाति, क्षेत्र, भाषा या लिंग के भेद से परे समानता का अधिकार देता है। इसका पहला वाक्य “हम भारत के लोग” एक साझा भविष्य की बात करता है। लेकिन धार्मिक विवादों को हवा देकर कुछ संगठन इस साझा भविष्य को ख़तरे में डाल रहे हैं। 1980 में भारत और चीन आर्थिक रूप से बराबर थे, लेकिन मंदिर-मस्जिद विवादों में उलझकर भारत पिछड़ गया, जबकि चीन ने तरक्की की। मोहन भागवत का बयान और आरएसएस की रणनीति साफ करती है कि संगठन कानून और संविधान से ऊपर अपनी शक्ति को मानता है। स्वयंसेवकों को काशी और मथुरा के लिए आंदोलन की छूट देना पूजा स्थल अधिनियम का खुला उल्लंघन होगा। सवाल है कि क्या भारत अतीत के विवादों में उलझकर अपने भविष्य को दाँव पर लगाएगा? सभ्य समाज में विवादों का समाधान अदालतें करती हैं, न कि सड़कें। काशी और मथुरा के मसले को कानून के दायरे में रहकर हल करना ही देश के हित में होगा।