बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे अपने विवादास्पद बयानों के कारण एक बार फिर चर्चा में हैं। सुप्रीम कोर्ट और मौजूदा सीजेआई संजीव खन्ना पर तीखी टिप्पणियों के बाद उन्होंने मंगलवार को एक्स पर एक नया पोस्ट किया, जिसमें दावा किया गया कि 1967-68 में भारत के मुख्य न्यायाधीश कैलाशनाथ वांचू के पास क़ानून की डिग्री नहीं थी। यह बयान न केवल उनके पिछले बयानों से उपजे विवाद को और हवा देता है, बल्कि न्यायपालिका की ऐतिहासिक विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाता है। 

निशिकांत दुबे ने एक्स पर पोस्ट किया, 'क्या आपको पता है कि 1967-68 में भारत के सीजेआई कैलाशनाथ वांचू जी ने क़ानून की कोई पढ़ाई नहीं की थी।' यह बयान उनके पिछले बयानों को ही आगे बढ़ाने वाला मालूम होता है, जिसमें उन्होंने सुप्रीम कोर्ट पर संसद के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप करने और 'धार्मिक युद्ध' व 'गृहयुद्ध' भड़काने का आरोप लगाया था। दुबे का यह नया दावा एक तरह से कांग्रेस शासनकाल के दौरान न्यायपालिका की ऐतिहासिक प्रक्रियाओं पर सवाल उठाता है।

दुबे के इस बयान को कुछ समर्थकों ने 'सनसनीखेज खुलासा' क़रार दिया, जबकि विपक्ष और क़ानूनी विशेषज्ञों ने इसे न्यायपालिका को बदनाम करने की एक और कोशिश बताया। सवाल यह है कि क्या दुबे का यह दावा तथ्यात्मक रूप से सही है और क्या यह उनकी पहले की टिप्पणियों के लिए चल रही अवमानना याचिकाओं को प्रभावित करेगा?

निशिकांत दुबे का दावा कि 1967-68 में भारत के मुख्य न्यायाधीश रहे कैलाशनाथ वांचू के पास क़ानून की डिग्री नहीं थी, क्या सही है? इसके जवाब को जानने के लिए इसके संदर्भ को समझना ज़रूरी है। कैलाशनाथ वांचू (1903-1988) एक प्रतिष्ठित भारतीय सिविल सेवा यानी आईसीएस अधिकारी थे, जिन्हें 1951 में इलाहाबाद हाई कोर्ट में जज नियुक्त किया गया। वे 1967 से 1968 तक भारत के मुख्य न्यायाधीश रहे। यह सच है कि वांचू ने औपचारिक रूप से क़ानून की डिग्री हासिल नहीं की थी। उस दौर में विशेष रूप से औपनिवेशिक और स्वतंत्रता के बाद के शुरुआती वर्षों में न्यायिक नियुक्तियां अक्सर प्रशासनिक अनुभव, क़ानूनी समझ और प्रोफेशनल योग्यता के आधार पर की जाती थीं, न कि केवल औपचारिक क़ानूनी शिक्षा पर। वांचू ने आईसीएस में अपनी सेवा के दौरान क़ानूनी और प्रशासनिक मामलों में व्यापक अनुभव अर्जित किया था, जिसके आधार पर उनकी नियुक्ति हुई।

उस समय क़ानूनी शिक्षा का ढांचा आज की तरह व्यवस्थित नहीं था। कई जज, विशेष रूप से हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में, अपनी प्रैक्टिस और प्रशासनिक अनुभव के आधार पर नियुक्त किए जाते थे। वांचू की नियुक्ति और कार्यकाल को उनकी योग्यता और निष्पक्षता के लिए सराहा गया।

निशिकांत दुबे का यह इशारा कि न्यायपालिका की नियुक्तियों में गड़बड़ी थी, ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करता है। वांचू की नियुक्ति उस समय की प्रचलित प्रक्रिया के अनुरूप थी और इसे अनुचित या ग़ैर-क़ानूनी नहीं माना गया। दुबे का यह दावा तथ्यों को सनसनीखेज बनाकर न्यायपालिका को बदनाम करने का प्रयास लगता है।

दुबे का यह दावा कि वांचू के पास क़ानून की डिग्री नहीं थी, तकनीकी रूप से सही है, लेकिन इसे अन्य संदर्भ में और इसे वर्तमान न्यायपालिका पर हमले के लिए इस्तेमाल करना भ्रामक और अतिशयोक्तिपूर्ण है।

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दुबे ने अपने इस नए बयान से पहले 19 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट और सीजेआई संजीव खन्ना के ख़िलाफ़ गंभीर टिप्पणियां की थीं, जो वक़्फ़ संशोधन अधिनियम और तमिलनाडु बनाम राज्यपाल मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसलों की प्रतिक्रिया में थीं। 

दुबे ने कहा था, 'अगर सुप्रीम कोर्ट ही कानून बनाएगा, तो संसद और विधानसभाओं को बंद कर देना चाहिए।' उन्होंने एक अन्य बयान में कहा था, 'देश में जितने भी गृहयुद्ध हो रहे हैं, उसके लिए सीजेआई संजीव खन्ना जिम्मेदार हैं।' उन्होंने यह भी कहा था, 'सुप्रीम कोर्ट धार्मिक युद्ध भड़काने और देश को अराजकता की ओर ले जा रहा है।'

इन बयानों ने सियासी और क़ानूनी हलकों में तूफ़ान खड़ा कर दिया। कांग्रेस और आम आदमी पार्टी जैसे विपक्षी दलों ने इसे सुप्रीम कोर्ट को कमजोर करने की साजिश करार दिया, जबकि बीजेपी ने दुबे के बयानों से दूरी बना ली।

भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कहा कि ये निशिकांत दुबे के निजी विचार हैं, पार्टी इनका समर्थन नहीं करती। इसके साथ ही नड्डा ने निर्देश दिया था कि सांसद ऐसे बयान न दें।

अवमानना की कार्रवाई का क्या होगा?

निशिकांत दुबे के 19 अप्रैल के बयानों ने सुप्रीम कोर्ट की अवमानना की कार्रवाई की मांग को तेज कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट के वकील अनस तनवीर और नरेंद्र मिश्रा, साथ ही पूर्व आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर ने दुबे के ख़िलाफ़ आपराधिक अवमानना की याचिका दायर की है। तनवीर ने अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी को पत्र लिखकर दुबे के बयानों को बेहद निंदनीय और सुप्रीम कोर्ट की गरिमा को कम करने वाला बताया। ठाकुर ने कहा कि दुबे की टिप्पणियां अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 2(c)(i) के तहत आपराधिक अवमानना की श्रेणी में आती हैं।

21 अप्रैल को जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने दुबे के बयानों पर चिंता जताते हुए कहा, 'हमें संस्था की मर्यादा और प्रतिष्ठा बनाए रखनी चाहिए।' 22 अप्रैल को जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने इस मामले को अगले सप्ताह सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया। कोर्ट ने साफ़ किया कि अवमानना याचिका दायर करने के लिए उनकी अनुमति की आवश्यकता नहीं है, लेकिन अटॉर्नी जनरल की सहमति ज़रूरी है।

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अवमानना अधिनियम 1971 की धारा 15(1)(b) और सुप्रीम कोर्ट के 1975 के नियमों के अनुसार, आपराधिक अवमानना की कार्यवाही के लिए अटॉर्नी जनरल या सॉलिसिटर जनरल की सहमति अनिवार्य है। चूंकि दुबे के बयान संसद के बाहर और सोशल मीडिया पर दिए गए थे, अनुच्छेद 105 के तहत सांसदों को मिलने वाला विशेषाधिकार लागू नहीं होता। इसका मतलब है कि सुप्रीम कोर्ट सीधे नोटिस जारी कर सकता है, बशर्ते अटॉर्नी जनरल सहमति दे।

यदि दुबे के ख़िलाफ़ अवमानना की कार्यवाही शुरू होती है और वे दोषी पाए जाते हैं तो उन्हें जुर्माना या जेल की सजा हो सकती है। हालाँकि, जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 के तहत उनकी सांसदी तभी ख़तरे में पड़ेगी यदि सजा दो साल से अधिक हो। वैसे, अवमानना मामलों में सजा आमतौर पर इससे कम होती है। 

यह मामला न केवल न्यायपालिका और विधायिका के बीच शक्तियों के संतुलन पर सवाल उठाता है, बल्कि यह भी पूछता है कि क्या सांसदों को अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का इस्तेमाल करते समय संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा का ध्यान रखना चाहिए। आने वाले दिन इस बात का फ़ैसला करेंगे कि क्या दुबे की यह सनसनीखेज रणनीति उन्हें क़ानूनी मुश्किलों में डालेगी, या यह विवाद सियासी शोर में दबकर रह जाएगा।