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सरकार ने अदालत से क्यों कहा, रफ़ाल के काग़ज़ात चोरी हो गए?

अटॉर्नी जनरल के. के. वेणुगोपाल ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि रफ़ाल सौदे पर अदालत के फ़ैसले पर पुनर्विचार याचिकाएँ चुराए गए गोपनीय दस्तावेज़ पर आधारित हैं। उन्होंने कहा कि ये दस्तावेज़ गोपनीय हैं और रक्षा मंत्राालय से चुराए गए हैं। इस मामले की जाँच चल रही है। इसके साथ ही यह ऑफ़िशियल सीक्रेट्स एक्ट का उल्लंघन है। 
सुप्रीम कोर्ट ने रफ़ाल सौदे पर 14 जनवरी को एक फ़ैसला दिया था, उससे जुड़ी दो पुनर्विचार याचिकाएँ अदालत में दायर की गई हैं। एक याचिका पूर्व बीजेपी नेता और पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा, मशहूर वकील प्रशांत भूषण और अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में मंत्री रहे अरुण शौरी ने दायर की है। दूसरी याचिका आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह ने दायर की है। 
मुख्य न्यायाधीश की अगुआई वाले खंडपीठ ने 14 दिसंबर के फ़ैसले में इस माँग को खारिज कर दिया था कि सर्वोच्च अदालत रफ़ाल मामले की जाँच कराए। उस खंडपीठ में रंजन गोगोई के अलावा जस्टिस एस. के. कौल और जस्टिस के. एम. जोजफ़ भी थे। 
गोगोई ने वेणुगोपाल से पूछा कि सरकार ने इस मामले में क्या कार्रवाई की है तो वेणुगोपाल ने कहा, 'हमलोग इसकी जांच कर रहे हैं कि फ़ाइल चोरी कैसे हुई। एजी ने कहा कि 'द हिन्दू' अख़बार ने गोपनीय फ़ाइल को छापा है.' हाल ही में 'द हिन्दू' ने रफ़ाल सौदे से जुड़ी कई रिपोर्ट छापी हैं, जिनमें बताया गया है कि सरकार ने कई नियमों का उल्लंघन किया है.'
अटॉर्नी जनरल के तर्क का लब्बोलुबाव यह था कि चूँकि पुनर्विचार याचिकाओं का आधार ही चुराए गए काग़ज़ात पर टिका है, लिहाज़ा, उन्हें खारिज कर दिया जाना चाहिए। 
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'चोरी के दस्तावेज़ पर विचार कर सकती है अदालत'

इसका जवाब देते हुए जस्टिस के.एम. जोज़फ़ ने कहा कि एविडेन्स एक्ट के मुताबिक़, अदालत चुराए गए काग़ज़ात पर विचार कर सकती है। पर वेणुगोपाल अपनी बात पर अड़े रहे। इस पर जस्टिस जोज़फ़ ने कहा, 'यदि कोई अभियुक्त चुराए गए काग़ज़ात के आधार पर यह साबित कर दे कि वह मौका-ए-वारदात पर मौजूद नहीं था, तो अदालत को इस पर विचार करना चाहिए या नहीं?'
लेकिन अटॉर्नी जनरल इसके बाद भी अपनी बात पर अड़े रहे। उन्होंने 2004 में सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस पसायत के दिए हुए फ़ैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि ग़ैर-क़ानूनी तरीके से हासिल किए गए दस्तावेज़ को छोड़ देना चाहिए।
इसके जवाब में खंडपीठ ने कहा कि ऐसे कई फ़ैसले हैं, जिनमें यह कहा गया है कि अवैध तरीके से हासिल किए गए साक्ष्यों पर भी अदालत भरोसा कर सकता है। मुख्य न्यायाधीश ने इस पर हस्तक्षेप करते हुए अपनी बात रखी।  

यदि कोई व्यक्ति ऑफ़िशियल सीक्रेट्स एक्ट का उल्लंघन कर साक्ष्य पेश करता है तो उसके ख़िलाफ़ उस मामले में तो मुक़दमा चलाया जा सकता है, पर इससे साक्ष्य का प्रभाव ख़त्म नहीं हो जाएगा।


जस्टिस रंजन गोगोई, मुख्य न्यायाधीश

सुरक्षा की आड़ में भ्रष्टाचार?

एजी वेणुगोपाल ने दूसरे तर्क भी दिए। उन्होंने कहा कि रफ़ाल की ख़रीद राष्ट्रीय सुरक्षाा के लिए ज़रूरी है क्योंकि दुश्मन देशों ने आधुनिकतम विमान ख़रीद लिए हैं। इस पर जस्टिस जोज़फ़ ने पूछा, 'जब भ्रष्टाचार की बात उठे तो क्या सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा की आड़ ले सकती है?'
अटॉर्नी जनरल इसके बाद भी अपनी ज़िद पर अड़े रहे। उन्होंने कहा कि यह मामला राजनीतिक रंग ले चुका है और इस मामले का निपटारा करने के लिए सही जगह अदालत नहीं है। कम्प्ट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल यानी सीएजी की रिपोर्ट संसद में पेश कर दी गई है। 

प्रशांत भूषण का जवाब

याचिकाकर्ता प्रशांत भूषण ने इसके बाद वेणुगोपाल के तर्कों का बिंदुवार जवाब दिया और उनके तमाम तर्कों को ध्वस्त कर दिया। उन्होंने कहा कि इसके पहले कोयला घोटाले और 2-जी घोटाले के मामले में सरकारी दस्तावेज़ पेश किए गए थे, जो सही तरीके से हासिल नहीं किए गए थे। उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार के आरोपों को क़ानून में किसी तरह की रियायत नहीं मिली हुई है। उन्होंने यह भी कहा कि याचिका में यह साफ़ कर दिया गया है कि ये काग़ज़ात 'द हिन्दू' और 'द कैरेवन' ने छापे हैं। 
भूषण ने पहले ही अदालत से कहा था कि याचिका रफ़ाल सौदे को रद्द करने की माँग को केंद्र में रख कर नहीं की गई थी, बल्कि वह इस सौदे की जाँच करवाने के लिए दायर की गई थी। लेकिन अधिकारियों ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट को ग़लत जानकारी देकर गुमराह किया था। सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला उन ग़लत जानकारियों के आधार पर ही दिया गया था। 
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