सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश पर आज बुधवार 29 अप्रैल को महत्वपूर्ण टिप्पणी की। लेकिन अभी इस पर फैसला नहीं आया है। लेकिन एक बड़ा वर्ग ऐसी मांग कर रहा था। जबकि नारीवादी संगठन इससे कम उम्र की महिलाओं के प्रवेश की मांग कर रहे थे।
सबरीमाला मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने आज बुधवार 29 अप्रैल को सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से संबंधित मामले में मौखिक रूप से टिप्पणी की। उसने कहा कि सच्ची महिला भक्त भगवान अयप्पा की परंपरा का सम्मान करते हुए 10 से 50 वर्ष की आयु तक मंदिर में प्रवेश न करके 50 वर्ष की आयु पार करने के बाद ही जाएं। इस तरह अदालत ने सबरीमाला पर अपना रुख साफ कर दिया है। लेकिन अभी तक कोई फैसला नहीं सुनाया है।
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने नौ जजों की पीठ के सामने सुनवाई के दौरान कहा, "सच्ची भक्ताएं जो महिलाएं 10-50 वर्ष की आयु की हैं, वे भी इस संयम का पालन करती हैं और सबरीमाला मंदिर से दूर रहती हैं। 50 वर्ष के बाद वे जाएंगी।" इस बेंच में भारत के चीफ जस्टिस (सीजेआई) सूर्यकांत, बी.वी. नागरत्ना, एम.एम. सुंदरेश, अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, अरविंद कुमार, ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, प्रसन्ना बी. वराले, आर. महादेवन और जॉयमाल्य बागची शामिल हैं।
यह टिप्पणी 2018 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले की समीक्षा याचिकाओं पर आधारित संदर्भ मामले (कांतरु रेजीवरु बनाम इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन) की सुनवाई के दौरान आई। 2018 के फैसले में 10-50 वर्ष की आयु की महिलाओं पर लगे पारंपरिक प्रतिबंध को असंवैधानिक घोषित किया गया था। 2019 में समीक्षा याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने फैसला नहीं किया, बल्कि धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े सात बड़े सवालों को नौ जजों की बेंच को भेज दिया।
जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि धार्मिक अधिकारों को व्यापक अर्थ दिया जाना चाहिए। उन्होंने भगवान अयप्पा की दर्शनशास्त्र के आलोक में 10-50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध को धर्म का हिस्सा बताया। जस्टिस सुंदरेश ने चेतावनी दी कि अगर हर व्यक्ति अलग-अलग धार्मिक अधिकारों का दावा करने लगे तो यह धर्म की अवधारणा के लिए आपदा बन सकता है और अनुच्छेद 25(1) के विरुद्ध होगा। जस्टिस नागरत्ना ने इसे "धर्म का विनाश" कहा।
वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह की दलीलें
वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह कनक दुर्गा और बिंदु अम्मिनी (2018 के फैसले के बाद मंदिर में प्रवेश करने वाली महिलाएं) की ओर से पेश हुईं। उन्होंने कहा कि प्रवेश का अधिकार हिंदू होने पर आधारित है, लेकिन श्रद्धा और सम्मान के साथ जाना चाहिए। उन्होंने तर्क दिया कि अदालत को केवल उन रिवाजों में हस्तक्षेप करना चाहिए जो मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हों, विशेषकर 'अशुद्धि' या 'प्रदूषण' की अवधारणा पर आधारित हों, जो अनुच्छेद 17 (अस्पृश्यता निषेध) के अंतर्गत आते हैं।
जयसिंह ने कहा कि एक महिला भक्त ने अपना केस शेड्यूल कास्ट (SC) बैकग्राउंड का बताया और पूछा कि क्या दलित महिला को रोका जाना जातिगत भेदभाव नहीं है। जस्टिस नागरत्ना ने जवाब दिया कि रोक उम्र समूह के कारण है, न कि जाति की वजह से।
अदालत ने पूछा कि क्या मंदिर से जुड़े न होने वाले व्यक्ति (जैसे उत्तर भारत से कोई) भी प्रवेश का दावा कर सकता है। जयसिंह ने जवाब दिया कि उनके क्लाइंट केरल की हिंदू हैं और एक ने बचपन में मंदिर देखा था। जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि कई महिलाएं स्वेच्छा से 50 वर्ष तक इंतजार करती हैं। जयसिंह ने कहा कि कुछ महिलाएं जाना चाहती हैं और उन्हें अपराधी नहीं माना जाना चाहिए।
अदालत ने पूछा कि क्या अदालतें धार्मिक प्रथाओं पर फैसला कर सकती हैं। जयसिंह ने कहा कि यह तथ्य का सवाल है और धर्मशास्त्रों से ज्ञान लिया जा सकता है। जस्टिस नागरत्ना ने जोर दिया कि सभ्यता और धार्मिक इतिहास को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जयसिंह ने कहा कि हिंदू धर्म में सुधार आंदोलनों का इतिहास रहा है।
मामले की अगली सुनवाई 5 मई को होगी। इस फैसले का अन्य धार्मिक समुदायों की आस्था-आधारित प्रथाओं पर भी प्रभाव पड़ सकता है।यह सुनवाई धार्मिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25-26), न्यायिक समीक्षा और आवश्यक धार्मिक प्रथाओं के परीक्षण जैसे बड़े मुद्दों पर केंद्रित है।