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ज़्यादा श्रमिक स्पेशल ट्रेनें चलीं तो बिहार, यूपी से नहीं संभलेगी स्थिति?

श्रमिक स्पेशल ट्रेनों से हर रोज़ एक-एक लाख से ज़्यादा प्रवासी मज़दूरों को एक ही जगह पर पहुँचाने पर स्थिति को संभालना उत्तर प्रदेश और बिहार के लिए क्या मुश्किल हो जाएगा? दोनों राज्यों ने केंद्र को पत्र लिखकर माँग की है कि इसकी वैकल्पिक व्यवस्था की जाए। जहाँ बिहार चाहता है कि इन ट्रेनों को मज़दूरों के उनके गृह ज़िले के स्टेशनों तक ले जाया जाए वहीं उत्तर प्रदेश ने कहा है कि इसके लिए राज्य में 9 रूटों पर लोकल ट्रेनें चलाई जाएँ। 

दरअसल, इन दोनों राज्यों के सामने उन प्रवासी मज़दूरों को एक ही जगह पर ट्रेनों से उतरने के बाद उन्हें उनके गृह ज़िलों में ले जाने की व्यवस्था करने में दिक्कतें आ रही हैं। यही कारण है कि दोनों राज्यों ने बड़ी संख्या में मज़दूरों के वापस लौटने पर अपनी सीमित क्षमता को लेकर चिंताएँ जताई हैं। पहले तो जिन राज्यों में ट्रेनें भेजी जानी थी उनसे सहमति लेने की ज़रूरत होती थी, लेकिन अब केंद्र सरकार ने उस पाबंदी को हटा दिया है। यानी श्रमिक स्पेशल ट्रेनें भेजने के लिए उन राज्यों से अब सहमति लेने की ज़रूरत नहीं है।

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इन राज्यों की चिंताएँ भी वाजिब जान पड़ती हैं। इन दोनों राज्यों से ही सबसे ज़्यादा प्रवासी देश के दूसरे हिस्से में रहते हैं। हाल के दिनों में जब ये मज़दूर पैदल या बसों या ट्रकों जैसे वाहनों से अपने-अपने घरों को लौटने लगे तो कई हादसे की ख़बरें भी आईं। ऐसा सबसे बड़ा हादसा उत्तर प्रदेश के औरैया में हुआ। उस हादसे में कम से कम 26 प्रवासी लोगों की मौत हो गई। उत्तर प्रदेश में कई ऐसे हादसे हुए तो सरकार ने ऐसे वाहनों के आने-जाने पर सख़्ती की। बिहार में भी ऐसे हादसे हुए और कई लोगों की जानें गईं। माना जा रहा है कि ऐसे हादसों को देखते हुए भी दोनों राज्य सरकारों ने ट्रेनों के लिए केंद्र सरकार और रेलवे से आग्रह किया है।

बिहार में अधिकतर श्रमिक स्पेशल ट्रेनें पटना के पास दानापुर में लाई जा रही हैं जहाँ से 30 बसों से प्रवासियों को उनके अपने-अपने ज़िलों में भेजा जा रहा है। केंद्रीय गृह सचिव अजय भल्ला को बिहार के मुख्य सचिव दीपक कुमार ने पत्र लिखकर कहा है कि अतिरिक्त ट्रेनों को सीधे प्रवासियों के गृह ज़िले भेजा जाए और संबंधित ज़िलों के स्टेशनों पर ट्रेनों को रोका जाए। उन्होंने कहा है कि यदि ऐसा नहीं होगा तो प्रशासन के लिए काफ़ी ज़्यादा परेशानी बढ़ जाएगी। 'द इंडियन एक्सप्रेस' से कुमार ने कहा, 'हर रोज़ क़रीब 50 ट्रेनें आ रही हैं जिसका मतलब है कि क़रीब एक लाख यात्री आ रहे हैं। हम अपनी क्षमता के अनुसार ट्रेनें स्वीकार कर रहे हैं। सहमति की कोई समस्या नहीं है, हर कोई फँसा व्यक्ति घर वापस आना चाहिए। हमने केंद्र से कहा है कि यदि वे ज़्यादा ट्रेनें भेजना चाहते हैं तो हमारी ज़रूरतों के अनुसार भेजें नहीं तो ट्रेनों की संख्या बढ़ाने पर हमारे लिए मुश्किल हो जाएगी।'

उन्होंने पत्र में लिखा है कि जैसा कि प्रस्ताव भेजा गया है उस तरह से ट्रेनें भेजी जाती हैं तो ज़्यादा ट्रेनें आने पर भी दिक्कत नहीं होगी।

बिहार में क़रीब 370 श्रमिक स्पेशल ट्रेनें भेजी जा चुकी हैं और गुजरात, महाराष्ट्र, पंजाब, दिल्ली और उत्तर प्रदेश से क़रीब 575 अतिरिक्त ट्रेनों को भेजने की सहमति बन गई है।

उत्तर प्रदेश में अब तक सबसे ज़्यादा श्रमिक स्पेशल ट्रेनें भेजी गई हैं और आगे भी सबसे ज़्यादा ट्रेनों के भेजे जाने की संभावना है। प्रवासी श्रमिकों को राज्य के अलग-अलग हिस्सों में भेजने में आ रही दिक्कतों को लेकर उत्तर प्रदेश ने रेलवे को पत्र लिखकर आग्रह किया है कि राज्य में नौ रूटों पर लोकट ट्रेनों की तरह मेमू ट्रेनें चलाई जाएँ जिससे बसों की ज़रूरत न पड़े। इस संबंध में उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त मुख्य सचिव अवनीश कुमार अवस्थी ने रेलवे को इसी हफ़्ते पत्र लिखा है। 'द इंडियन एक्सप्रेस' की रिपोर्ट के अनुसार, रेलवे के अधिकारियों ने कहा है कि इस प्रस्ताव के अनुसार ट्रेनें चलाने पर बस जैसे वाहनों की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। 

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अब यदि रेलवे बिहार और उत्तर प्रदेश के इन प्रस्तावों को मान लेता है तो दोनों राज्यों में प्रशासन को काफ़ी ज़्यादा सहूलियतें होंगी। क्योंकि दोनों ही राज्यों में बड़ी संख्या में मज़दूरों के एक साथ पहुँचने और फिर उन्हें उनके अपने-अपने गृह ज़िलों में छोड़ने में प्रशासन को ज़्यादा दिक्कतें तो आएँगी ही। हालाँकि यदि रेलवे इन राज्यों के प्रस्तावों को मान लेता है तो रेलवे की भी थोड़ी परेशानी बढ़ सकती है। 
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