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मोहन भागवत भी आए ट्विटर पर, ताक़तवर हो रहा सोशल मीडिया

अपनी बात को अगर दुनिया तक पहुँचाना है तो सोशल मीडिया पर आना ही पड़ेगा। यह बात राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत और संघ के 6 बड़े पदाधिकारियों के ट्विटर पर आने से साबित होती है। क्योंकि इतने लंबे समय तक संघ में सक्रिय रहते हुए भी ये पदाधिकारी सोशल मीडिया से दूर ही रहते थे। 95 साल पुराने इस संगठन के पदाधिकारियों के सोशल मीडिया पर आने को संघ के ख़ुद को समय के साथ बदलने की कवायद माना जा रहा है। 
संघ की ओर से कहा गया है कि इसके प्रमुख मोहन भागवत और विचारक सुरेश भैयाजी जोशी मई से ही ट्विटर पर आ चुके हैं। हालाँकि उन्होंने अभी तक कोई ट्वीट नहीं किया है। यह बात भी है कि आरएसएस 2011 से ही ट्विटर पर है और उसके 13 लाख फ़ॉलोवर हैं और संघ का अपना फ़ेसबुक पेज भी है जिसे 54 लाख लोगों ने लाइक किया है।
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68 वर्षीय भागवत का ट्विटर हैंडल @DrMohanBhagwat है। संघ की स्थापना 1925 में हुई थी और यह 2016 से ही ख़ुद को आधुनिक बनाने की कोशिश में जुटा हुआ है। इसके तहत संघ ने स्थापना के बाद से चली आ रही अपनी ख़ाकी नेकर को बदल कर इसकी जगह पैंट को लागू कर दिया था। यह इस सोच के साथ किया गया था कि पैंट की वजह से युवा संघ की ओर आकर्षित होंगे।
इसके बाद यह बात उठी थी कि संघ अपनी छवि को उदार बनाने की कोशिश कर रहा है। इसके लिए संघ ने पिछले साल तीन दिन का एक कार्यक्रम भी किया था और इसमें संघ प्रमुख भागवत ने कहा था कि संघ को सही ढंग से समझने की ज़रूरत है। तब संघ प्रमुख ने जोर देकर कहा था कि भारत विविधताओं भरा देश है और इस बात का सम्मान तो किया ही जाना चाहिए, इसे उत्सव की तरह मनाया भी जाना चाहिए।
इसके अलावा संघ ने पिछले साल जब पूर्व राष्ट्रपति और कांग्रेस के दिग्गज नेता रहे प्रणब मुखर्जी को अपने कार्यक्रम में बुलाया था तो तब भी यह माना गया था कि संघ ख़ुद को बदलने की कोशिश में जुटा हुआ है।

ट्विटर ने मनवाया अपना लोहा

इसे सोशल मीडिया की बढ़ती ताक़त ही कहेंगे कि ऐसे नेताओं को भी इसका सहारा लेना पड़ा है जो कल तक कहते थे कि उनके वोटर या समर्थक ट्विटर पर नहीं हैं। इसलिए वे ट्विटर पर नहीं आ रहे हैं। यही कहानी बीएसपी सुप्रीमो मायावती के भी साथ थी। लेकिन लोकसभा चुनाव से ठीक पहले उन्हें भी ट्विटर पर आना पड़ा था। इसी तरह जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के नेता ट्विटर से यह कहकर दूर ही रहते थे कि उनके समर्थकों का ट्विटर से कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन बाद में नीतीश कुमार ने ट्विटर का महत्व पहचाना और उन्होंने अपना अकाउंट बनाया। 
ट्विटर नेताओं के लिए आम जनता और कार्यकर्ताओं तक अपनी बात पहुँचाने का बेहद ताक़तवर माध्यम बन चुका है। उसी तरह आम आदमी के लिए अपनी बात सरकार या लोगों तक पहुँचाने में भी इसका अहम रोल है।
भारत के राजनेताओं में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उन राजनेताओं में थे, जिन्होंने सबसे पहले ट्विटर की ताक़त को पहचाना था और वह जनवरी 2009 में इस सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर आए थे। जबकि कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गाँधी काफ़ी देर से अप्रैल 2015 में ट्विटर पर आए। उससे पहले राहुल के ट्वीट @OfficeOfRG ट्विटर हैंडल से आते थे। मोदी के ठीक बाद मार्च 2009 में कांग्रेस नेता शशि थरूर ट्विटर पर आए। इसके अलावा अभिनेता शाहरुख़ ख़ान, अमिताभ बच्चन, सलमान ख़ान, अक्षय कुमार, सचिन तेंदुलकर, विराट कोहली, प्रियंका चोपड़ा जैसी बड़ी शख़्सियतें भी समय-समय पर ट्विटर पर आती रहीं। लोकसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस महासचिव प्रियंका गाँधी वाड्रा ने भी ट्विटर पर अपना अकाउंट बनाया था। 

सभी राजनीतिक दल और नेता सक्रिय

बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह मई 2013 में ट्विटर पर आए और वह इस प्लेटफ़ॉर्म पर काफ़ी सक्रिय रहते हैं। लोकसभा चुनाव में उनकी सभी रैलियों का प्रसारण इस पर होता रहा और उनके हर दिन की जानकारी फ़ेसबुक और ट्विटर पर उपलब्ध रहती है। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी जुलाई 2009 में ट्विटर पर आए और वह भी इसका काफ़ी इस्तेमाल करते हैं। बीजेपी, कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और बाक़ी राजनीतिक दलों ने भी ट्विटर के बढ़ते दायरे को पहचाना है। 
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी सोशल मीडिया की ताक़त पहचानते हैं। आम आदमी पार्टी और केजरीवाल की ट्विटर पर समर्थकों की एक लंबी फ़ौज़ है और बीजेपी के समर्थकों के साथ कई मुद्दों पर उनकी अकसर उनकी भिड़ंत होती रहती है।
इसके अलावा दुनिया भर में राजनेता ट्विटर और फ़ेसबुक का इस्तेमाल करते हैं। अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान, ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग सहित दुनिया के कई देशों के नेता ट्विटर पर मौजूद हैं। भारत में लोकसभा चुनाव के दौरान सोशल मीडिया का सभी राजनीतिक दलों ने जमकर इस्तेमाल किया था। राजनीतिक दल और नेता समझ चुके हैं कि अगर वे लाखों लोगों तक अपनी बात को पहुँचाना चाहते हैं तो उन्हें सोशल मीडिया का ज़्यादा से ज़्यादा इस्तेमाल करना ही होगा। 
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