पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद हिंसा के बाद अब उत्तर प्रदेश के मिर्ज़ापुर जिले में अडानी समूह द्वारा प्रस्तावित 1600 मेगावाट थर्मल पावर प्लांट के ख़िलाफ़ स्थानीय लोगों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने शिकायत की है। एक रिपोर्ट के अनुसार मिर्ज़ापुर के ददरी खुर्द गाँव में प्रस्तावित इस परियोजना के लिए 12 अप्रैल 2025 को उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा आयोजित जनसुनवाई में स्थानीय लोगों ने हेरफेर और अपारदर्शिता के गंभीर आरोप लगाए। इसके साथ ही, जंगल और वन्यजीवों पर पड़ने वाले नुकसान जैसे परियोजना के पर्यावरणीय प्रभाव को लेकर भी चिंताएँ जताई जा रही हैं। 

अडानी समूह की सहायक कंपनी मिर्ज़ापुर थर्मल एनर्जी (यूपी) प्राइवेट लिमिटेड द्वारा प्रस्तावित इस पावर प्लांट के लिए पर्यावरणीय मंजूरी प्राप्त करने के लिए 12 अप्रैल 2025 को ददरी खुर्द में जनसुनवाई आयोजित की गई थी। इस सुनवाई में स्थानीय विधायक रामशंकर सिंह पटेल, अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट शिव प्रसाद शुक्ला, सोनभद्र के क्षेत्रीय पर्यावरण अधिकारी, और अडानी समूह के प्रतिनिधि मौजूद थे।


ताज़ा ख़बरें

हालाँकि, स्थानीय निवासियों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने दावा किया कि इस जनसुनवाई में उनकी आवाज़ को दबाया गया और प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी थी। द वायर की एक रिपोर्ट के अनुसार, स्थानीय लोगों का आरोप है कि जनसुनवाई में उनकी भागीदारी को सीमित किया गया और कई प्रभावित गाँवों के निवासियों को इसकी जानकारी ही नहीं दी गई। कुछ निवासियों ने यह भी दावा किया कि सुनवाई में केवल अडानी समूह के समर्थकों को बोलने का अवसर दिया गया, जबकि परियोजना से होने वाले पर्यावरणीय और सामाजिक नुक़सान पर चिंता जताने वालों को नजरअंदाज़ किया गया।

रिपोर्ट के अनुसार विंद्यन इकोलॉजी एंड नेचुरल हिस्ट्री फ़ाउंडेशन जैसे संगठनों ने जनसुनवाई की प्रक्रिया को 'पूर्व नियोजित' और 'स्थानीय समुदाय के हितों के ख़िलाफ़' बताया। उन्होंने कहा कि यह सुनवाई पर्यावरण प्रभाव आकलन अधिसूचना 2006 के प्रावधानों का उल्लंघन करती है, जो प्रभावित समुदायों की सक्रिय भागीदारी को अनिवार्य बनाती है।

प्रस्तावित पावर प्लांट का स्थान मिर्ज़ापुर के ददरी खुर्द गाँव में 365.19 हेक्टेयर भूमि पर है। यह विंध्य क्षेत्र के जैव-विविधता से समृद्ध जंगलों के पास है। पर्यावरण कार्यकर्ताओं और स्थानीय निवासियों की मुख्य चिंता इस परियोजना से जंगल, वन्यजीवों और स्थानीय जल संसाधनों पर पड़ने वाला प्रभाव है। इस क्षेत्र में स्लॉथ भालू, तेंदुए, मगरमच्छ, उल्लू, गिद्ध, और ईगल जैसे संरक्षित प्रजातियाँ पाई जाती हैं। ये भारत के वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के तहत संरक्षित हैं।

रिपोर्टों के अनुसार, अडानी समूह ने दावा किया है कि परियोजना क्षेत्र में कोई वन भूमि शामिल नहीं है और केवल 8.35 हेक्टेयर वन भूमि का उपयोग जल पाइपलाइन और सड़क निर्माण के लिए किया जाएगा।

हालांकि, पर्यावरण विशेषज्ञों और स्क्रॉल.इन की एक रिपोर्ट ने इस दावे को भ्रामक बताया। उनका कहना है कि 1952 की एक गजट अधिसूचना के अनुसार, परियोजना स्थल सहित 665 हेक्टेयर भूमि को वन भूमि के रूप में दर्ज किया गया है। इसके अलावा, 2020 में मिर्ज़ापुर के डिवीजनल फॉरेस्ट ऑफिसर ने एक पत्र में उल्लेख किया था कि यह क्षेत्र बांस और ब्यूटिया (पलाश) के जंगलों से घिरा है, जो विंध्य क्षेत्र की अनूठी जैव-विविधता का हिस्सा है।

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल यानी एनजीटी ने अगस्त 2024 में इस परियोजना के पर्यावरणीय प्रभावों की जाँच के लिए स्वतः संज्ञान लिया और उत्तर प्रदेश सरकार, केंद्र सरकार, और मिर्ज़ापुर थर्मल एनर्जी को नोटिस जारी किया। फरवरी 2025 में एनजीटी ने एक याचिका पर सुनवाई की, जिसमें आरोप लगाया गया था कि अडानी समूह ने पर्यावरणीय मंजूरी के बिना निर्माण कार्य शुरू कर दिया और जंगल को समतल करने के लिए भारी मशीनरी का उपयोग किया।

उत्तर प्रदेश से और ख़बरें

स्थानीय निवासियों ने परियोजना से उत्पन्न होने वाले जल संकट की भी चिंता जताई है। पावर प्लांट को प्रतिवर्ष लगभग 6.4 मिलियन टन कोयले की आवश्यकता होगी, इसके लिए सिंगरौली, मध्य प्रदेश से कोयले की आपूर्ति की जाएगी। इस प्रक्रिया में भारी मात्रा में पानी की खपत होगी, जो पहले से ही जल-कमी वाले मिर्ज़ापुर क्षेत्र के लिए एक बड़ा ख़तरा है। ग्रामीणों का कहना है कि यह परियोजना उनके खेती और पीने के पानी के स्रोतों को प्रभावित कर सकती है।

इसके अलावा, स्थानीय समुदाय ने अडानी समूह पर भूमि अधिग्रहण में धोखाधड़ी के आरोप लगाए हैं। 2013 में डाउन टू अर्थ ने बताया था कि किसानों ने दावा किया था कि कंपनी ने परियोजना के लिए उनकी जमीन को धोखे से खरीदा। यह मुद्दा अब भी अनसुलझा है और कई ग्रामीण अपनी आजीविका के नुकसान को लेकर चिंतित हैं।

यह पहली बार नहीं है जब मिर्ज़ापुर में प्रस्तावित थर्मल पावर प्लांट विवादों में है। 2011 में वेल्सपन एनर्जी ने इसी स्थल पर 1320 मेगावाट के कोयला-आधारित पावर प्लांट के लिए पर्यावरणीय मंजूरी प्राप्त की थी। हालांकि, 2016 में एनजीटी ने पर्यावरण प्रभाव आकलन में गलत और अधूरी जानकारी के आधार पर इस मंजूरी को रद्द कर दिया और कंपनी को स्थल को उसकी मूल स्थिति में बहाल करने का आदेश दिया।

मिर्ज़ापुर में अडानी पावर प्लांट का विवाद केवल पर्यावरणीय और सामाजिक मुद्दों तक सीमित नहीं है; इसमें गहरे राजनीतिक निहितार्थ भी हैं।

स्थानीय विधायक रामशंकर सिंह पटेल ने जनसुनवाई में दावा किया कि यह परियोजना जिले में रोजगार और विकास लाएगी। हालांकि, विंध्य बचाओ आंदोलन जैसे संगठनों का कहना है कि यह विकास अल्पकालिक होगा और दीर्घकालिक पर्यावरणीय नुकसान की तुलना में नगण्य है।

इसके अलावा, अडानी समूह की परियोजनाएँ अक्सर केंद्र और राज्य सरकारों के साथ उनके कथित निकट संबंधों के कारण विवादों में रही हैं। मार्च 2025 में, द रिपोट्र्स कलेक्टिव ने खुलासा किया था कि राजस्थान और महाराष्ट्र में बीजेपी शासित सरकारों ने अडानी समूह के लिए विशेष रूप से तैयार किए गए टेंडर जारी किए, जिससे प्रतिस्पर्धा सीमित हुई। मिर्ज़ापुर में भी स्थानीय लोगों को संदेह है कि जनसुनवाई की प्रक्रिया को अडानी के पक्ष में प्रभावित किया गया है, जिससे सरकार की निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं।

सर्वाधिक पढ़ी गयी ख़बरें

अडानी समूह की परियोजनाएँ अक्सर सरकार के साथ उनके कथित संबंधों के कारण विवादों में रही हैं। मिर्ज़ापुर में जनसुनवाई के कथित हेरफेर से यह धारणा और मजबूत होती है कि कॉरपोरेट हितों को स्थानीय समुदायों के ऊपर प्राथमिकता दी जा रही है।

मिर्ज़ापुर में अडानी पावर प्लांट के खिलाफ स्थानीय निवासियों का विरोध और जनसुनवाई में हेरफेर के आरोप विकास की क़ीमत पर पर्यावरण और सामुदायिक हितों की अनदेखी को उजागर करते हैं। एनजीटी की कार्रवाई और विंध्य बचाओ जैसे आंदोलनों से यह साफ़ है कि यह मुद्दा केवल स्थानीय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय और वैश्विक पर्यावरण संरक्षण की बहस का हिस्सा है।


मिर्ज़ापुर का यह मामला कॉरपोरेट जवाबदेही और सरकारी पारदर्शिता पर सवाल उठाता है। यदि अडानी समूह और सरकार इन चिंताओं का समाधान नहीं करते, तो यह विरोध और तीव्र हो सकता है, जो 2026 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन सकता है।