ECI SIR RTI: भारत के चुनाव आयोग को अपने वोटर के बारे में सारी जानकारी चाहिए। लेकिन जब आरटीआई के तहत उससे अपने दस्तावेजों का खुलासा करने को कहा जाता है तो वो इनकार कर देता है। बिहार SIR पर ईसीआई की पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल उठ रहे हैं।
भारत का चुनाव आयोग आरटीआई के तहत अपना कोई दस्तावेज देने को तैयार नहीं है। लेकिन उसे अपने मतदाता से सारी जानकारी चाहिए। सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम के तहत, द रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने भारत के चुनाव आयोग (ईसीआई) से बिहार और बाद में पूरे देश में लागू किए किए जाने वाले विशेष गहन संशोधन (एसआईआर) से संबंधित सभी रिकॉर्ड, फाइलें, नोट्स और पत्राचार का खुलासा करने की मांग की थी। लेकिन चुनाव आयोग ने जानकारी देने से साफ इनकार कर दिया। आरटीआई अधिनियम के अनुसार, हर भारतीय नागरिक को यह जानकारी प्राप्त करने का अधिकार है।
चुनाव आयोग ने बिहार के लगभग 8 करोड़ मतदाताओं को 30 दिनों के भीतर अपनी नागरिकता और मतदान अधिकारों का दस्तावेजी सबूत पेश करने का निर्देश दिया था। विडंबना यह है कि आरटीआई अधिनियम भी आयोग को नागरिकों के अनुरोध पर दस्तावेज 30 दिनों के भीतर प्रदान करने का आदेश देता है। हालांकि, हमारे रिपोर्टर्स क्लेक्टिव के आवेदन के जवाब में, आयोग ने एक वेबलिंक दिया, जो इसकी वेबसाइट के एक बैक-एंड पेज से जुड़ा था और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है। आयोग ने दावा किया कि यह 14 जुलाई 2025 के "व्यापक निर्देश" थे। लेकिन जैसा कि साफ है, रिपोर्टर्स क्लेक्टिव की टीम उस वेबलिंक तक नहीं पहुंच सकी।
रिपोर्टर्स क्लेक्टिव ने जून और जुलाई 2025 में एसआईआर आदेशों के लिए हुई बैठकों, मिनट्स और विचार-विमर्श से संबंधित फाइलों के नाम और संख्या मांगी थी। आयोग ने ऐसी फाइलों और रिकॉर्ड के अस्तित्व को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। जबकि कानूनन उसे इन रिकॉर्ड्स को सावधानीपूर्वक रखना चाहिए और यह अनिवार्य भी है। आरटीआई अधिनियम के तहत, इन रिकॉर्ड्स को नागरिकों से छिपाना या नष्ट करना गैरकानूनी है।
अब तक, रिपोर्टर्स क्लेक्टिव के पास कम से कम चार उदाहरण दर्ज हैं, जहां आयोग ने एसआईआर के विवरण का खुलासा करने से इनकार किया। जिसमें दो आरटीआई आवेदनों और आरटीआई एक्टिविस्ट अंजलि भारद्वाज के दो अनुरोधों के जवाब शामिल हैं। चुनाव आयोग ने सभी को अस्वीकार कर दिया।
कोई भी सरकारी आदेश, जिसमें SIR शामिल है, बिना लिखित रिकॉर्ड के जारी नहीं होता। आयोग के आंतरिक विभागों ने एसआईआर और इसके दिशानिर्देशों के लिए पत्राचार, फाइल नोटिंग्स और चर्चाएं की होंगी। भले ही मुख्य चुनाव आयुक्त और उनके सहयोगियों ने एसआईआर आदेश सहज रूप से जारी किया हो, इसे लागू करने के लिए बाद में रिकॉर्ड तो बनाए ही गए होंगे।
बिहार में एसआईआर की घोषणा के तुरंत बाद रिपोर्ट्स क्लेक्टिव ने अपनी आरटीआई दायर की थी। जिसमें उसने एसआईआर से संबंधित सभी फाइलें, आंतरिक और बाहरी पत्राचार, फाइल नोटिंग्स, चर्चाएं, बैठक के मिनट्स, प्रस्तुतियाँ और ड्राफ्ट मांगे थे। इसके अलावा 24 जून 2025 को घोषित एसआईआर से संबंधित फाइलों की सूची भी मांगी गई थी। ये सार्वजनिक दस्तावेज नहीं, बल्कि आयोग के आंतरिक रिकॉर्ड हैं, जिन्हें आरटीआई अधिनियम के तहत साझा करना अनिवार्य है। इसके बजाय, आयोग ने इसे छिपाने या न बताने की कोई वजह बिना बताए एक वेबपेज का लिंक दिया, जो जनता या जिसको लिंक भेजा गया, वो देख नहीं सकता।
रिपोर्टर्स क्लेक्टिव ने आयोग की वेबसाइट पर 14 जुलाई 2025 के दस्तावेज की खोज की, लेकिन उसे "व्यापक निर्देशों" का कोई पेज या लिंक नहीं मिला, जिसकी घोषणा आयोग ने खुद की थी।
विधि और न्याय मंत्रालय के पास कोई जानकारी नहीं
इससे पहले, रिपोर्टर्स क्लेक्टिव को केंद्रीय विधि और न्याय मंत्रालय के एक अन्य आरटीआई का जवाब मिला था। जिसमें मंत्रालय ने दावा किया था कि उसने एसआईआर के लिए कोई रिकॉर्ड नहीं रखा और अनुरोध को आयोग को ट्रांसफर कर दिया। मंत्रालय का जवाब भी भ्रामक था, और इसके खिलाफ अपील की गई।
20 अगस्त 2025 को, आयोग ने जवाब दिया कि उसके पास कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है। यदि यह सही है, तो इससे साफ पता चलता है कि एसआईआर बिना कानूनी परामर्श के आगे बढ़ा। भले ही इसकी घोषणा के बाद महत्वपूर्ण राजनीतिक चुनौतियाँ सामने आईं।
चुनाव आयोग ने SIR पर कोई स्टडी तक नहीं कराई
आरटीआई कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज ने भी आयोग के रिकॉर्ड मांगे, जिसमें सारी फाइलें शामिल थीं। इसमें यह भी पूछा गया था कि क्या चुनाव आयोग ने एसआईआर कराने से पहले किसी तरह की कोई स्टडी या रिसर्च कराई थी। आयोग ने उन्हें 24 जून 2025 की घोषणा का हवाला देते हुए कहा कि यह स्वयं स्पष्ट है और "कोई और जानकारी मौजूद नहीं है।" यह जवाब बताता है कि आयोग ने एसआईआर के लिए कोई स्वतंत्र अध्ययन नहीं किया और वह अपनी आंतरिक निर्णय प्रक्रिया का खुलासा करने को तैयार नहीं है। भारद्वाज ने 2003 के एसआईआर आदेश की भी मांग की थी, जो पिछली बार ऐसा संशोधन हुआ था, लेकिन आयोग ने इसे भी प्रदान करने से इनकार कर दिया।दूसरी तरफ चुनाव आयोग नागरिकों से उनकी मौजूदगी, मतदान अधिकार और नागरिकता को सत्यापित करने के लिए पूर्ण जवाबदेही की मांग करता है। लेकिन खुद आरटीआई अधिनियम के तहत बुनियादी पारदर्शिता से भी इनकार कर रहा है। यही वजह है कि नेता विपक्ष राहुल गांधी ने सामने सबूत लाकर चुनाव आयोग की चोरी पकड़ी और उसे उधेड़ कर रख दिया। इसके बाद राहुल लगातार वोट चोरी के खिलाफ अभियान चला रहे हैं।