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अंतरराष्ट्रीय रेटिंग न गिरे इसलिए सरकार ने बनाई तिकड़म वाली रणनीति?

दुनिया भर में प्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों द्वारा जब भारत को लेकर नकारात्मक टिप्पणियाँ की जा रही थीं और नकारात्मक रेटिंग आने की आशंका थी तो सरकार इससे निपटने के लिए रणनीति बना रही थी। तो क्या सरकार को जम्मू-कश्मीर से जुड़े अनुच्छेद 370 में बदलाव, बीजेपी की 'हिंदू राष्ट्रवादी' पार्टी होने की छवि, विवादित एनआरसी जैसे मुद्दों की वजह से देश की सॉवरेन रेटिंग गिरने का डर था? और क्या सरकार ने ऐसी रणनीति बनाई कि उसके असर से अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने उस रेटिंग में सुधार हो? और क्या उससे सुधार हुआ? उन 'नकारात्मक' रेटिंग पर सरकार की गुप्त रणनीति को लेकर 'द इंडियन एक्सप्रेस' ने कई खुलासे किए हैं। 

अख़बार की रिपोर्ट में कहा गया है कि जब देश में 2020 के मध्य में कोविड -19 महामारी की पहली लहर थी तब वित्त मंत्रालय का आर्थिक विभाग वैश्विक थिंक-टैंक, सूचकांकों और मीडिया द्वारा भारत पर 'नकारात्मक टिप्पणी' का मुकाबला करने के लिए एक मसौदा तैयार कर रहा था। उसको चिंता थी कि इससे सॉवरेन रेटिंग को बेहद ख़राब स्थिति में डाउनग्रेड किया जा सकता है। इसकी रणनीति को लेकर एक प्रजेंटेशन यानी प्रस्तुति दी गई थी।

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अख़बार की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि यह देखते हुए कि 2019-20 में अधिकांश रिपोर्टों ने भारत पर नकारात्मक टिप्पणी का अनुमान लगाया, उस प्रस्तुति में उल्लेख किया गया, "विशेष रूप से 2019 का जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019, राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व उनकी 'हिंदू राष्ट्रवादी' भारतीय जनता पार्टी द्वारा विवादित धार्मिक स्थल पर हिंदू मंदिर के निर्माण को हमारे देश के 'मुसलमानों को निशाना बनाने' और 'धर्मनिरपेक्ष प्रकृति को ख़तरा' के रूप में देखा जाता है।"

रिपोर्ट में कहा गया है कि जून 2020 में वित्त मंत्रालय में तत्कालीन प्रधान आर्थिक सलाहकार संजीव सान्याल ने एक प्रस्तुति तैयार की थी। यह प्रस्तुति थी- "भारत की संप्रभु रेटिंग को प्रभावित करने वाले विषयपरक कारक: हम इसके बारे में क्या कर सकते हैं?"। यह प्रस्तुति सरकार के भीतर आंतरिक सर्कुलेशन के लिए थी। सान्याल अब प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य हैं।

रिपोर्ट के अनुसार 36-पृष्ठ की प्रस्तुति में कहा गया है कि किसी देश की संप्रभु रेटिंग का 18-26 प्रतिशत शासन, राजनीतिक स्थिरता, कानून के शासन, भ्रष्टाचार, प्रेस की स्वतंत्रता जैसे आकलनों वाले विषयपरक फैक्टरों पर आधारित होता है।

उस प्रस्तुति के अनुसार, 'ज्यादातर मामलों में इन विषयपरक कारकों पर भारत की रैंकिंग उसके समकक्षों से काफी नीचे है। यह इसकी संप्रभु रेटिंग को नीचे गिराता है।' उसमें सान्याल के हवाले से कहा गया कि रेटिंग एजेंसियों ने इन विषयपरक कारकों के लिए विश्व बैंक के विश्व शासन संकेतक को एक प्रॉक्सी के रूप में इस्तेमाल किया। ये संकेतक के निर्माण में पश्चिमी प्रेस या एनजीओ के सर्वेक्षणों और मुट्ठी भर शिक्षाविदों के आकलन का योगदान होता है।

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अख़बार ने उस प्रस्तुति के हवाले से लिखा है, 'एक ख़तरा है कि हम थिंक टैंक, सर्वेक्षण एजेंसियों और अंतरराष्ट्रीय मीडिया द्वारा भारत पर नवीनतम नकारात्मक टिप्पणी के कारण विश्व शासन संकेतक स्कोर में गिरावट देख सकते हैं। यह संभवत: हमारी सॉवरेन रेटिंग को नीचे डाउनग्रेड कर सकता है। इसलिए इन थिंक-टैंक और सर्वेक्षण एजेंसियों तक पहुँचना और सामान्य रूप से भारत के बारे में सकारात्मक नैरेटिव तैयार करना बेहद ज़रूरी है।'

रिपोर्ट के अनुसार सान्याल ने कहा था कि भारत के बारे में लगातार नकारात्मक टिप्पणी भी सॉवरेन रेटिंग एजेंसियों की राय बना रही थी, और इस तरह की राय पर वित्त मंत्रालय के विरोध का कोई परिणाम नहीं निकला। उस प्रस्तुत में कहा गया, 'अनुभव है कि रेटिंग एजेंसियाँ ​​​​आम तौर पर आगे बढ़ेंगी और उसे प्रकाशित करेंगी।'

द इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा है कि संपर्क किए जाने पर सान्याल ने टिप्पणी करने से इनकार कर दिया और कहा, 'हम आंतरिक प्रस्तुतियों पर कभी टिप्पणी नहीं करते हैं।'

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तो सवाल है कि क्या इससे रेटिंग एजेंसियों ने भारत की रेटिंग में सुधार किया? अख़बार ने लिखा है कि सरकार ने आने वाले महीनों में सॉवरेन रेटिंग एजेंसियों से संपर्क किया। उस प्रस्तुति के बाद के समय में भारत की रेटिंग में उतार-चढ़ाव का ज़िक्र किया गया है। रिपोर्ट में एक मिसाल दी गई है कि 5 अक्टूबर, 2021 को मूडीज इन्वेस्टर्स सर्विस ने लगभग दो वर्षों के बाद एक संशोधन में भारत की सॉवरेन रेटिंग को 'नकारात्मक' से 'स्थिर' कर दिया, जिससे किसी भी रेटिंग डाउनग्रेड की संभावना कम हो गई। रिपोर्ट है कि इस मामले में मूडीज और फिच रेटिंग्स दोनों ने द इंडियन एक्सप्रेस द्वारा भेजे गए प्रश्नों पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया।
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