जब भी भारत पर कोई आतंकी हमला होता है, मीडिया और सोशल मीडिया पर पाकिस्तान से युद्ध के नगाड़े बजने लगते हैं। पहलगाम हमले के बाद भी यही हुआ। युद्ध की बातें इस तरह हो रही हैं जैसे भारत और पाकिस्तान की सेनाएंँ सीमा पर आमने-सामने खड़ी हों और किसी भी क्षण बम बरसने लगेंगे। लेकिन क्या युद्ध का रास्ता इतना आसान है? क्या परमाणु हथियारों से लैस देशों के बीच युद्ध के नतीजों पर नहीं सोचना चाहिए?

भारत और पाकिस्तान के पास 150 से अधिक परमाणु हथियार हैं। ऐसे में एक छोटी सी चूक भी महाविनाश की वजह बन सकती है। परमाणु युद्ध की कल्पना ही भयावह है- दिल्ली, कराची, इस्लामाबाद और मुंबई जैसे शहर मिनटों में राख में बदल सकते हैं। पहले ही दिन करोड़ों मौतें, उसके बाद 'न्यूक्लियर विंटर' और वैश्विक अकाल। यह केवल उपमहाद्वीप नहीं, पूरी मानव सभ्यता के लिए ख़तरा होगा।

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युद्ध की परंपरा 

इतिहास बताता है कि युद्ध मानव समाज का एक स्थायी भाव रहा है। प्राचीन भारत में मौर्य, गुप्त और चोल साम्राज्य युद्धों के माध्यम से ही बने और बढ़े। मौर्य सम्राट अशोक ने कलिंग युद्ध के बाद युद्ध की विभीषिका देख कर बौद्ध धर्म अपनाया और शांति का रास्ता चुना। समुद्रगुप्त ने उत्तर से दक्षिण तक विजयों की श्रृंखला से तो चोलों ने समुद्री युद्धों से दक्षिण-पूर्व एशिया में भारत का प्रभाव स्थापित किया।

लेकिन हर साम्राज्य की नींव में लाखों लाशें और उजड़ी बस्तियाँ होती हैं। 8वीं से 10वीं सदी तक चला त्रिपक्षीय युद्ध (पाल, प्रतिहार, राष्ट्रकूट) इसका सबसे जीवंत उदाहरण है। लगभग 200 वर्षों तक कन्नौज पर कब्ज़े के लिए तीनों शक्तियाँ लड़ती रहीं। अंततः तीनों कमज़ोर हुईं और तुर्क आक्रमणकारियों के लिए भारत के द्वार खुल गए।

विश्व युद्धों की सीख

20वीं सदी में जब युद्ध आधुनिक हथियारों से लड़े गए, तो मानवता की पीड़ा चरम पर पहुँच गई। प्रथम विश्व युद्ध ने लगभग डेढ़ करोड़ लोगों को निगल लिया, और द्वितीय विश्व युद्ध में यह संख्या आठ करोड़ तक पहुँची।

हिरोशिमा और नागासाकी पर हुए परमाणु हमले इस विनाश की पराकाष्ठा थे। इन हमलों ने दुनिया को यह अहसास कराया कि युद्ध अब केवल सेनाओं की भिड़ंत नहीं रह गया, यह पूरी मानवता का संकट बन चुका है।

भारत-पाक युद्ध और परमाणु संकट

भारत और पाकिस्तान की सैन्य ताक़तों की तुलना करें तो भारत स्पष्ट रूप से आगे है- 14 लाख सैनिक, आधुनिक मिसाइलें, और सात गुना ज़्यादा सैन्य बजट। फिर भी, पाकिस्तान के पास भी परमाणु हथियार हैं, और यही संतुलन युद्ध को रोकता रहा है। लेकिन जब युद्धोन्माद राजनीतिक लाभ का साधन बन जाए तो स्थिति विस्फोटक हो जाती है।

हाल ही में पाकिस्तान के रक्षा मंत्री द्वारा यह स्वीकार करना कि उनके देश ने दशकों तक आतंकवादियों को प्रशिक्षण और समर्थन दिया, इस बात की पुष्टि करता है कि भारत की चिंताएँ निराधार नहीं हैं। लेकिन क्या इसका जवाब युद्ध है?

चंद्रशेखर की चेतावनी 

13 दिसंबर 2001 को जब संसद पर आतंकी हमला हुआ था, तब भी युद्ध की बातें होने लगी थीं। लेकिन संसद में खड़े होकर पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने चेताया था कि 'लड़ाई ख़तरनाक खेल होती है… इससे सबका विनाश हो जाएगा।' बीजेपी सांसदों ने तब उनके भाषण के बीच काफी टोका-टाकी की थी, फिर भी उन्होंने कहा, ' अगर सरकार युद्ध का फ़ैसला करती है तो करे, लेकिन मैं अकेला होते हुए भी युद्ध का विरोध करता रहूँगा।'

चंद्रशेखर के भाषण को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने चुपचाप सुना और इतिहास बताता है कि बात युद्ध तक नहीं पहुँची।

चंद्रशेखर की चेतावनी को आज भी याद करने की ज़रूरत है। युद्ध कभी भी समाधान नहीं होता। यह तो आख़िरी विकल्प है, जब कोई रास्ता न बचे।

महाभारत से आज तक: युद्ध की निरर्थकता

महाभारत एक आदर्श उदाहरण है। पांडवों को इस महासमर में जीत तो मिली, लेकिन सब कुछ तबाह हो गया। सौ कौरव भाई ही नहीं, पाँचों पांडवों के पुत्र भी मारे गए और युधिष्ठिर के मन में केवल शून्यता बची। शांतिपर्व में कहा गया है—

"न युद्धात् परमं किंचिद् युद्धं सर्वं न संनादति। युद्धेन संनादति सर्वं तस्माद् युद्धं परित्यजेत्।"

— महाभारत, शांतिपर्व (12.101.24)

(युद्ध से बढ़कर कोई आपदा नहीं; युद्ध सब कुछ नष्ट कर देता है। इसलिए युद्ध का परित्याग करना चाहिए।)

आज जब भारत-पाक संबंधों में फिर तनाव है, तब ज़रूरत है संयम की, विवेक की। पाकिस्तान को सबक़ ज़रूर सिखाया जाना चाहिए, लेकिन वह सबक़ युद्ध नहीं, राजनय, अंतरराष्ट्रीय दबाव और विकास की प्रतिस्पर्धा से सिखाया जा सकता है।

हमारी सभ्यता की परीक्षा तब होती है जब हम उकसावे में आए बिना, अपने मूल्यों को बनाए रखते हुए, टिके रहें। युद्ध नहीं, शांति ही असली शक्ति है।