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गांधी के साथ सबसे बड़ी दुर्घटना हुई है गांधी का राज्यीकरण

महात्मा गांधी का इस्तेमाल क्या सरकारों ने अपने-अपने तरीक़े से नहीं किया है? राज्यों ने क्या गांधी की एक ऐसी सरलीकृत छवि निर्मित नहीं की है जो किसी के लिए असुविधाजनक नहीं रहे? अब पाठ्यक्रम में अलग से गांधी ही क्यों? और उनके माध्यम से आत्मनिर्भरता का मूल्य ही क्यों? अहिंसा का क्यों नहीं, धर्मनिरपेक्षता का मूल्य क्यों नहीं? पूँजीवाद के प्रति उनकी आलोचना क्यों नहीं?
अपूर्वानंद

गांधी जयंती के ठीक पहले मालूम हुआ कि छत्तीसगढ़ सरकार ने स्कूली पाठ्यचर्या में गांधी को शामिल करने का फ़ैसला किया है। बयान में कहा गया कि शहरी और ग्रामीण, दोनों ही क्षेत्रों के स्कूलों में 5वीं से 12वीं तक के छात्रों को गांधी की बुनियादी शिक्षाओं से परिचित कराया जाएगा। मक़सद यह है कि उनके माध्यम से छात्र आत्मनिर्भरता का पाठ पढ़ सकें। उनके व्यक्तित्व का चहुँमुखी विकास भी हो सके। साथ ही यह भी कहा गया है कि छात्रों को सरकार की सुरजी गाँव योजना के बारे में भी बताया जाएगा जिसे  'नरवा, गरवा, घुरुवा, बाड़ी' के नाम से भी जाना जाता है।

सरकारी विज्ञप्ति में इससे आगे कुछ नहीं बतलाया गया है। जाहिर है, यह इरादे का ऐलान है, पाठ्यचर्या या पाठ्यक्रम में शामिल करने के तरीक़े अभी खोजे जाएँगे। गांधी की बुनियादी शिक्षा क्या है, इसपर बहस हो सकती है। क्या क्या पाठ्यचर्या में, किस किस कक्षा में, किस-किस विषय में शामिल किया जाए। गांधी का लिखा सीधे या उनपर लिखा? क्या उन्हें सरल करके किताबों में डाला जाए? अभी इन सवालों पर विचार किया जाएगा।

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हर कोई सरकार के इस क़दम की वाहवाही ही करेगा। आख़िर गांधी से स्कूली छात्र परिचित हों, इससे किसे इंकार? लेकिन इस घोषणा से सरकार की स्कूल और पाठ्यचर्या को लेकर जो लापरवाह समझ है, उसका पता चलता है। सरकार ने यह नहीं बतलाया कि अभी, इसी वक़्त उसे गांधी को अलग से शामिल करने की ज़रूरत क्यों आ पड़ी? दूसरे, गांधी के माध्यम से आत्मनिर्भरता के पाठ का क्या अर्थ है? आत्मनिर्भरता का ही क्या अर्थ है? क्या यह व्यक्ति की आत्मनिर्भरता है, उसके गाँव, शहर की या राज्य की? इस आत्मनिर्भरता में आत्म कौन है? सरकार जब आत्मनिर्भरता की मांग करने लगे तो लोगों के कान खड़े हो जाने चाहिए कि वह कहीं उनके लिए जो संसाधन हैं उनका इस्तेमाल अपने मित्र कोरोपोरेट घरानों के लिए तो नहीं करने जा रही!

आज की केंद्र सरकार ने प्रति राज्य की सारी जिम्मेवारियों से पल्ला झाड़ लेने के लिए आत्मनिर्भरता जैसे सुंदर शब्द की आड़ ली है। क्या राज्य सरकार का अर्थ इससे अलग है? इन सवालों को रहने भी दें तो इस घोषणा से सरकार की स्कूल और पाठ्यचर्या को लेकर जो लापरवाह समझ है, उसका पता चलता है। अव्वल तो स्कूली पाठ्यचर्या में क्या रहे और क्या नहीं, यह सरकार की तरफ़ से नहीं बतलाया जाना चाहिए। स्कूली पाठ्यचर्या को न तो किसी के विचार के प्रचार-प्रसार का माध्यम बनाया जा सकता है, वह कितना ही महान क्यों न हो और न ही सरकारी योजनाओं के प्रचार का। 

सरकारें समझती हैं कि स्कूली छात्र और अध्यापक उसके बंधक हैं इसलिए उनके ज़रिए वह अपना प्रचार कार्य भी करवा सकती है। किसी भी महत्वपूर्ण व्यक्ति के आगमन पर जिस तरह स्कूली छात्रों का उनके स्वागत के लिए, या 'राष्ट्रीय महत्त्व' की तिथियों पर उनका इस्तेमाल होता है, इसके बारे में हम जानते हैं। योग दिवस मनाना हो, सूर्य नमस्कार करवाना हो, स्कूली छात्र हाजिर हैं! इसी समझ और विश्वास के कारण स्कूल को ऐसा माध्यम मान लिया जाता है जिससे राज्य या सरकारें अपनी बात पहुँचा सकती हैं। 

यह भी ध्यान रहे कि स्कूलों में हर बात मात्र एक वक्तव्य के रूप में पेश की जाती है जिसपर सवाल करने का अधिकार या अवसर न तो अध्यापक को है, न छात्र को। इसलिए किसी विचार का प्रश्न नहीं है, मात्र प्रचार की सुविधा है।

दुनिया भर में इसपर बहस चलती रही है कि शिक्षा का उद्देश्य क्या है। उद्देश्य एकाधिक हो सकते हैं। सबसे प्रमुख है- छात्र को स्वतंत्रचेता, तर्कशील, अपने और समाज के प्रति दायित्वबोध से युक्त व्यक्ति के रूप में विकसित होने में उसकी मदद करना। ज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में से किसी का चुनाव वह करे लेकिन ज्ञान मात्र की समझ उसकी सीमित न हो, न तो राज्य के कारण, न किसी विचारधारा के कारण। ऐसा करने के लिए शिक्षा की जो योजना की जाती है वही पाठ्यचर्या है। पाठ्यचर्या पर समाज या राज्य की आवश्यकता के अनुसार चिप्पियाँ लगाई जाएँ, इससे शिक्षा का उपक्रम विकृत ही होगा।

पाठ्यचर्या में या शिक्षा में इसीलिए हमें आदर्श चरित्रों को शंकाविहीन आदर्श के रूप में प्रस्तुत करने से बचना चाहिए। वह चरित्र गांधी ही क्यों हों! अगर एक छात्र 12वीं तक गांधी का गुणगान ही सुने और उनके प्रति श्रद्धा के अलावा स्कूल में कुछ भी स्वीकार्य न हो तो क्या इसे शिक्षा कहेंगे?

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क्यों अभी अचानक सरकार को लगा कि गांधी को स्कूल में लाना चाहिए? भारत के अलग-लग राज्यों और एन सी ई आर टी की किताबों में क्या अलग-अलग विषयों में उनकी मौजूदगी पहले ही नहीं है? क्या राजनीति विज्ञान, साहित्य, इतिहास में गांधी नहीं हैं? अलग से गांधी ही क्यों? और उनके माध्यम से आत्मनिर्भरता का मूल्य ही क्यों? अहिंसा का क्यों नहीं, धर्मनिरपेक्षता का मूल्य क्यों नहीं? पूँजीवाद के प्रति उनकी आलोचना क्यों नहीं?

भारत में गांधी के साथ सबसे बड़ी दुर्घटना हुई है गांधी का राज्यीकरण। राज्य ने गांधी की एक ऐसी सरलीकृत छवि निर्मित की है जो किसी के लिए असुविधाजनक नहीं। जबकि गांधी अपने वक़्त में ही अपने मित्रों, शत्रुओं और अपनी जनता के लिए अपने सिद्धांतों और अपने व्यवहार से भी लगातार मुश्किल ही खड़ी करते रहे।

अहिंसा का उनका सिद्धांत और अभ्यास भारत की जनता के लिए अजूबा था और चुनौती भी। इसके माध्यम से वीरता और साहस की समझ ही उन्होंने बदल दी पहले जिन्हें हथियार और हिंसा के बिना समझना कठिन था। उसी तरह आर्थिक जीवन और विकास की सहज स्वीकृत समझ की, जो पूंजीवादियों और समाजवादियों, दोनों को एक स्तर पर स्वीकार थी, उन्होंने आलोचना की। व्यक्ति और समाज तथा राज्य के रिश्ते के बारे में गांधी के विचार जटिल हैं और राष्ट्रवाद और देशभक्ति के दायरे के बाहर चले जाते हैं। गांधी पहले और आखिर में एक विद्रोही, आज़ाद ख़याल इंसान थे और हरेक शख्स में इसी विद्रोह और स्वाधीनता की संवेदना की कामना उन्हें थी।

राज्य सरकार के लिए विद्रोह और स्वाधीनता दोनों ही असुविधाजनक हैं। तो क्या गांधी को स्वच्छ करके पाठ्यचर्या में शामिल किया जाएगा? कुछ उसी तरह जैसे संघीय सरकार ने उन्हें स्वच्छता अभियान का प्रचारक बना कर किया है? जैसे उसने सत्याग्रह को स्वच्छाग्रह में बदल कर किया? 

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गांधी के उस पक्ष से जो भारत को और हमें आत्मालोचना के लिए प्रेरित या बाध्य करता है, प्रायः राज्य को परहेज रहा है। इसलिए यह  नोट किया गया है कि स्कूली किताबें गांधी की हत्या के प्रसंग को नज़रअंदाज़ कर देती हैं। इस प्रसंग के आते ही आपको मात्र राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नहीं, सावरकर जैसे चरित्रों की भी आलोचनात्मक पड़ताल करनी पड़ेगी जो सिर्फ़ इतिहास तक सीमित न होगी। 

इसलिए बेहतर हो कि सरकार गांधी को बख़्श दे और स्कूली छात्रों पर भी रहम करे। उसकी जगह अगर वह राज्य में एस सी ई आर टी को मज़बूत करे और स्कूली पाठ्यचर्या के निर्माण के काम को स्वायत्तता प्रदान करने के लिए संरचनात्मक निर्णय करे। पाठ्यचर्या को शैक्षिक दृष्टि से ही देखा जाना चाहिए तभी वह सही और सच्ची राजनीति की मदद भी कर पाएगी।

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