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केंद्र को कॉलिजियम सिस्टम मानना ही होगाः सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट कॉलिजियम पर सरकार और सुप्रीम कोर्ट के बीच तनातनी रुकने का नाम नहीं ले रही है। हालांकि नए चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ ने चंद दिनों पहले कहा था कि सुप्रीम कोर्ट और केंद्र सरकार में रिश्ते बेहतर होने चाहिए। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने आज सोमवार को फिर केंद्र सरकार के रवैए पर सख्त टिप्पणियां कीं। अदालत ने केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू के नए-पुराने बयानों को फिर से खारिज कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि कॉलिजियम सिस्टम इस देश का कानून है। केंद्र को उसका पालन करना ही होगा। हायर जूडिशरी में जजों की नियुक्ति में सरकार जानबूझकर देरी नहीं करे।
जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस ए. एस. ओका ने आज सोमवार को इस मामले में सुनवाई करते हुए ये टिप्पणियां की।

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दरअसल, किरण रिजिजू और केंद्र सरकार में बैठे लोग इस बात से परेशान हैं कि कॉलिजियम सिस्टम के तहत जजों ने अपनी नियुक्ति का सिस्टम अपने हाथ में ले रखा है। रिजिजू ने अभी हाल ही में इस मुद्दे पर कई बातें कही थीं। केंद्रीय मंत्री रिजिजू ने कहा - कॉलिजियम सिस्टम संविधान के लिए "विदेशी" है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने विवेक से कॉलिजियम बनाया था। जबकि 1991 से पहले सभी जजों की नियुक्ति सरकार द्वारा की जाती थी। रिजिजू ने एक चैनल के प्रोग्राम में कहा था कि भारत का संविधान सभी के लिए, विशेष रूप से सरकार के लिए एक "धार्मिक दस्तावेज" है। लेकिन कोई भी चीज जो सिर्फ अदालतों या कुछ जजों द्वारा लिए गए फैसले की वजह से संविधान से अलग है, आप कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि फैसला देश द्वारा समर्थित होगा।
सोमवार को जब मामले की सुनवाई शुरू हुई तो केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल आर वेंकटरमणी बचाव की मुद्रा में नजर आए। उन्होंने कहा कि 'कभी-कभी मीडिया की खबरें गलत होती हैं।' इस पर जस्टिस कौल ने उनसे कहा, "मैंने सभी खबरों को नजरअंदाज कर दिया है, लेकिन यह बात किसी उच्च स्तर के व्यक्ति ने इंटरव्यू में कहीं हैं। ... मैं और कुछ नहीं कह रहा हूं। अगर हमें कुछ करना है, तो हम निर्णय लेंगे।"
नियुक्तियों में देरी पर, अदालत ने पूछा कि क्या नेशनल जूडिशल अप्वाइंटमेंट कमीशन (NJAC) को पास नहीं किए जाने से सरकार खुश नहीं है, और इसलिए जजों के नामों को मंजूरी नहीं दे रही है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा- 

केंद्र अपनी आपत्ति बताए बिना नामों को वापस नहीं ले सकता। कृपया इसका समाधान करें और हमें इस संबंध में न्यायिक फैसला लेने के लिए मजबूर न करें।


- सुप्रीम कोर्ट, 28 नवंबर को सोर्सः लाइव लॉ

अदालत ने पिछली सुनवाई पर भी कई सख्त टिप्पणियां की थीं। सुप्रीम कोर्ट को उम्मीद थी कि सरकार से पॉजिटिव संकेत आएंगे। लेकिन सरकार की ओर से सोमवार को फिर से ठोस आश्वासन नहीं मिला और इसी दौरान किरण रिजिजू के विवादास्पद बयान कॉलिजियम को लेकर आ गए। रिजिजू के बयान कटाक्ष लिए हुए थे। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा-

जमीनी हकीकत यह है कि जजों के नामों को मंजूरी नहीं दी जा रही है। सिस्टम कैसे काम करेगा? कुछ नाम पिछले डेढ़ साल से लंबित हैं। ऐसा नहीं हो सकता है कि आप नामों को रोक सकते हैं, यह पूरी प्रणाली को निराश करता है ... और कभी-कभी जब आप नियुक्ति करते हैं, तो आप सूची से कुछ नाम उठाते हैं और दूसरों को स्पष्ट नहीं करते हैं। आप जो करते हैं वह प्रभावी रूप से वरिष्ठता में रुकावट डालता है।


- सुप्रीम कोर्ट, 28 नवंबर को सोर्सः लाइव लॉ

सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा कि कई सिफारिशें चार महीने से पड़ी हुईं हैं और उनकी समय सीमा पार हो चुकी हैं। समय सीमा का तो पालन करना होगा। शीर्ष अदालत ने याद दिलाया कि कि एक वरिष्ठ वकील के नाम की सिफारिश की गई थी, अब उनका निधन हो चुका है। दूसरे वकील ने जज बनने की अपनी सहमति ही वापस ले ली है। ये दोनों घटनाएं देरी की नतीजा हैं।
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अदालत ने अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल से कहा कि वो केंद्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट की भावनाओं से अवगत कराएं। इस पर अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को भरोसा दिया कि वे इसे देखेंगे। इसके बाद कोर्ट ने अगली तारीख 8 दिसंबर दे दी।

बता दें कि पिछले चीफ जस्टिस यूयू ललित ने जाते हुए कहा था कि कॉलिजियम सिस्टम काम करता रहेगा। इसे कोई बदल नहीं सकता। लेकिन जैसे ही नए चीफ जस्टिस ने कार्यभार संभाला केंद्रीय कानून मंत्री किरण रिजिजू ने कॉलिजियम सिस्टम के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। पिछले बीस दिन तो ऐसे गुजरे हैं जब उन्होंने ऐसे बयानों की झड़ी लगा दी। एक बयान में रिरिजू ने यह तक कह डाला था कि उन्हें उनकी करने दीजिए, हम अपनी करेंगे। दरअसल, यही बयान सुप्रीम कोर्ट के लिए चुनौती बन गया है। 
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