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तो कोवैक्सीन टीका लगवाने से पहले फ़ॉर्म भरना ज़रूरी नहीं होगा!

कोवैक्सीन को विशेषज्ञों के जिस पैनल ने 'क्लिनिकल ट्रायल मोड' में आपात इस्तेमाल की मंजूरी दी थी उसने अब कहा है कि इस 'क्लिनिकल ट्रायल मोड' टैग को हटाया जा सकता है। इसने ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ़ इंडिया यानी डीसीजीआई से सिफारिश की है और अब वही इस पर आख़िरी फ़ैसला लेगा। 'क्लिनिकल ट्रायल मोड' टैग हटाने का मतलब होगा कि अब उस वैक्सीन को लगवाने से पहले लोगों को सहमति वाले एक फ़ॉर्म पर दस्तख़त करने की ज़रूरत नहीं होगी। 

सहमति वाले दस्तख़त की ज़रूरत इसलिए थी कि भारत बायोटेक की इस कोवैक्सीन को तीसरे चरण के ट्रायल के आँकड़े के बिना ही आपात मंजूरी दी गई थी और इसलिए कहा गया था कि इसे क्लिनिकल ट्रायल मोड में ही आपात इस्तेमाल किया जा सकता है। तीसरे चरण के ट्रायल के आँकड़े के बिना ही मंजूरी दिए जाने पर काफ़ी विवाद भी हुआ था। 

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लेकिन इस बीच भारत बायोटेक ने तीसरे चरण के ट्रायल के आँकड़े आ जाने का दावा किया है। भारत बायोटेक ने 3 मार्च को ये आँकड़े जारी किए और कहा कि यह कोरोना को रोकने में 81 फ़ीसदी प्रभावी है। तीसरे चरण के आँकड़े 25,800 प्रतिभागियों पर ट्रायल के आधार पर हैं। इसने यह भी कहा कि इस मामले में और अधिक जानकारी इकट्ठा करने और वैक्सीन की प्रभावकारिता का मूल्यांकन करने के लिए 130 पुष्ट मामलों के अंतिम विश्लेषण तक ट्रायल जारी रहेगा।

कंपनी ने कहा कि अंतरिम विश्लेषण से यह भी पता चला है कि गंभीर और साइड इफेक्ट यानी दुष्परिणाम निम्न स्तर के रहे। भारत बायोटेक ने यह भी दावा किया कि 'नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी के विश्लेषण से पता चलता है कि टीके से बनी एंटीबॉडी ब्रिटेन में पाए गए नये क़िस्म के कोरोना को बेअसर कर सकती है।' भारत बायोटेक ने ट्वीट कर जानकारी दी थी कि कोवैक्सीन के शोध को विज्ञान की प्रसिद्ध पत्रिका नेचर में प्रकाशित किया गया है। 

हाल ही में विज्ञान की पत्रिका लांसेट के अध्ययन में कहा गया है कि कोवैक्सीन के दूसरे चरण के ट्रायल का परिणाम काफ़ी बेहतर है और यह पूरी तरह सुरक्षित है। हालाँकि इसने कहा कि दूसरे चरण के ट्रायल से यह बता पाना मुश्किल है कि यह वैक्सीन कितनी प्रभावी है।

बता दें कि भारत बायोटेक की कोवैक्सीन के तीसरे चरण के आँकड़े को लेकर ही विवाद हुआ था। 

कोरोना वैक्सीन के लिए तय विशेषज्ञ पैनल यानी सब्जेक्ट एक्सपर्ट कमिटी (एसईसी) ने सीरम इंस्टीट्यूट की वैक्सीन को 1 जनवरी और भारत बायोटेक की वैक्सीन को 2 जनवरी को हरी झंडी दे दी थी। लेकिन डीसीजीआई ने एक दिन बाद ही तीन जनवरी को दोनों वैक्सीन को मंजूरी दे दी।

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डीसीजीआई द्वारा इसको मंजूरी दिए जाने के बाद शशि थरूर, आनंद शर्मा, जयराम रमेश जैसे कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने कोवैक्सीन के तीसरे चरण के ट्रायल के आँकड़े को लेकर सवाल उठाए थे। बाद में विज्ञान से जुड़े लोगों ने भी सवाल उठाए। 

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इस विवाद के बाद मीडिया रिपोर्ट में वह नोट सामने आया था जिसमें विशेषज्ञों के पैनल ने आपात मंजूरी दिए जाने के समय लिखा था। उस नोट के आख़िर में लिखा गया था, ‘उपरोक्त विचार-विमर्श के बाद समिति ने एक कड़े एहतियात के साथ जनहित में आपात स्थिति में सीमित उपयोग के लिए मंजूरी देने की सिफारिश की। इसका इस्तेमाल क्लिनिकल ट्रायल मोड में, टीकाकरण के लिए अधिक विकल्प के रूप में करने की सिफ़ारिश की गई। विशेष रूप से नये क़िस्म के कोरोना संक्रमण की स्थिति में। इसके अलावा फर्म अपने तीसरे चरण के क्लिनिकल ट्रायल को जारी रखेगी और उपलब्ध होने पर आँकड़े पेश करेगी।’
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