भारत से हज़ारों किलोमीटर दूर बग़दाद में हुए ड्रोन हमले का असर नई दिल्ली पर भी पड़ेगा, यह लगभग तय है। भारत चाहे या न चाहे, अमेरिकी भले ही भारत को इससे अलग रखने की बात कहे या कोशिश भी करे, पर भारत इससे अलग नहीं हो सकता। अमेरिकी हमले में ईरानी कमान्डर क़ासिम सुलेमानी की मौत एक सामान्य घटना नहीं है। इसके दूरगामी असर होंगे और उसके छींटे भारत पर भी पड़ेंगे। 

अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत के साथ

ईरान के साथ भारत का सदियों पुराना नाता तो है ही, हाल के वर्षों में भी तेहरान और नई दिल्ली के बीच नज़दीकियाँ बढ़ी हैं। इसे इससे भी समझा जा सकता है कि कश्मीर के मुद्दे पर भी ईरान ने कभी भी पाकिस्तान का साथ नहीं दिया, वह भारत के साथ ही रहा है।
मुसलिम देशों के संगठन ऑर्गनाइजेशन ऑफ़ इसलामिक कंट्रीज़ में जब-जब कश्मीर का मुद्दा उठा है, ईरान ने भारत का साथ दिया है।

हाल के दिनों में जब अनुच्छेद 370 में संशोधन कर दिया गया, अनुच्छेद 35 ‘ए’ ख़त्म कर दिया गया और इस तरह कश्मीर को मिला विशेष दर्जा ख़त्म हो गया, पाकिस्तान ने इसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाया। पर ओआईसी में ईरान ने भारत का साथ दिया।

खाड़ी में तनाव और भारत-ईरान

इसी तरह खाड़ी देशों के संगठन गल्फ़ कंट्रीज कौंसिल (जीसीसी) में भी ईरान भारत के साथ खड़ा रहा है। इस नज़दीकी को इससे समझा जा सकता है कि विदेश मंत्री एस जयशंकर बीते दिनों तेहरान गए थे। उन्होंने ईरानी विदेश मंत्री जवाद ज़रीफ़ से मुलाक़ात की थी। वह खाड़ी में तनाव कम करने की दिशा में बात करने गए थे। 

लेकिन उसके तुरन्त बाद ही सुलेमानी की हत्या हो गई। अब यदि ईरान बदले में अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइल हमले कर दे, या खाड़ी में खड़े किसी टैंकर पर ही हमला कर दे या अमेरिका के मित्र सऊदी अरब में कहीं हमला कर दे तो भारत की स्थिति बेहद खराब होगी। अमेरिका उसे आतंकवादी हमला क़रार देगा और ईरान कहेगा कि उसने आत्मरक्षा में ऐसा किया है। दोनों ही अपनी-अपनी जगह शायद ठीक होंगे।

ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंध का डर

खाड़ी में तनाव का एक घातक नतीजा यह हो सकता है कि अमेरिका ईरान पर और ज़्यादा आर्थिक प्रतिबंध लगा दे। अमेरिकी दबाव में आकर भारत ने ईरान से तेल खरीदना पहले ही बंद कर दिया है। 
नए प्रतिबंधों से यदि चाबहार बंदरगाह निर्माण पर असर पड़ने लगे, तो भारत क्या करेगा, यह सवाल परेशान करने वाला है। भारत इस पर अरबों रुपये लगा चुका है। इसका वाणिज्यिक-व्यापारिक महत्व तो है ही, सामरिक महत्व भी है।

चाबहार का इस्तेमाल कर भारत कुछ नॉटिकल माइल्स की दूरी पर ही पाकिस्तान में बन रहे ग्वादर बंदरगाह की काट निकाल सकता है। अमेरिकी प्रतिबंध हुआ तो चाबहार पर उसका असर पड़ना तय है।

कच्चे तेल पर असर?

खाड़ी संकट से तेल का बाज़ार बुरी तरह प्रभावित होगा और अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल बाज़ार में मानो आग ही लग जाएगी। सुलेमानी की हत्या की ख़बर फैलते ही कच्चे तेल की कीमतें बढ़ीं। न्यूयॉर्क मेटल एक्सचेंज में ब्रेन्ट कच्चे तेल की कीमत 4 प्रतिशत बढ़ कर 66.25 डॉलर प्रति बैरल से 69.16 डॉलर प्रति बैरल हो गई। यदि तेहरान ने बदले की कार्रवाई कर दी तो यह कीमत और बढ़ेगी।

यदि ईरान ने बदला लेने के लिए सऊदी अरब के किसी तेल ठिकाने पर हमला कर दिया तो मानो कच्चे तेल में आग ही लग जाएगी।

इससे इनकार नहीं किया जा सकता क्योंकि कुछ महीने पहले ही ईरान पर आरोप लगा था कि उसने सऊदी अरैमको कंपनी के रिफ़ाइनरी पर हमला किया था और उसके बाद कच्चे तेल की कीमत में 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो गई थी, हालांकि बाद में वह कीमत कम हुई थी। 

भारत अपनी तेल ज़रूरतों का लगभग 85 प्रतिशत आयात करता है। उसका आयात बिल बहुत बढ़ जाएगा और वह भी ऐसे समय जब उसकी आर्थिक स्थिति पहले से ही खराब है। 

सुलेमान की हत्या एक सामान्य मौत ईरान के लिए तो नहीं ही है, भारत के लिए भी नहीं है। भारत पर इसके कूटनीतिक और आर्थिक प्रभाव पड़ेंगे। उसे संभालना भारतीय कूटनीति के लिए चुनौती होगी। यह बड़ी परेशानी का सबब इसलिए भी है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की किरकिरी हो रही है और इस पर ध्यान देना भारतीय सत्ता प्रतिष्ठान की प्राथमिकता फ़िलहाल तो नहीं ही है।