यह दुखद है कि मोदी न सिर्फ टैगोर के 1937 के निर्णय का अनादर कर रहे हैं, बल्कि संविधान सभा की उस बुद्धिमत्ता पर भी प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं, जिसने उसी रूप में ‘वंदे मातरम्’ को अपनाया।
संविधान सभा के अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद ने 24 जनवरी 1950 को कहा था-
“‘जन गण मन’ को भारत का राष्ट्रीय गान घोषित किया जाता है और ‘वंदे मातरम्’, जिसने स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभाई, उसे भी समान सम्मान और दर्जा प्राप्त होगा।”
उन्होंने यह भी बताया कि इस विषय पर प्रस्ताव लाने के बजाय यह बेहतर समझा गया कि अध्यक्ष स्वयं इस संबंध में घोषणा करें।
इतिहास साफ़ बताता है कि टैगोर ने 1896 में इसे गाया और बाद में तय किया कि केवल शुरुआती दो छंद ही उपयुक्त हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री द्वारा 150वीं वर्षगांठ का उपयोग विभाजनकारी राजनीति के लिए करना इतिहास का तोड़-मरोड़ प्रस्तुत करना है।