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‘सर’ की समीक्षा: स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की परिकथा

अभी हाल ही में आई फ़िल्म ‘सर’ को देख कर ऐसा लगा जैसे एक आदर्श दुनिया को, परिकथाओं की दुनिया को अपनी आँखों से देख रहे हों। या शायद यह निर्देशिका रोहेना गेरा की ही कल्पना थी जो नदी के दो किनारों को एक देखना चाह रही थीं। ‘सर’ फ़िल्म, आधारित है एक ऐसे स्त्री-पुरुष संबंध पर जहाँ पर पुरुष मालिक की भूमिका में है और स्त्री नौकर की। पुरुष, शक्ति और अधिकार की भूमिका में है तो स्त्री, असहाय और मजबूर। पुरुष, उच्च वर्गीय विशेषाधिकारों से लैस है, तो स्त्री नितांत निम्नवर्गीय संवेदनशीलता और अभावों से।

असमानता के इतने चरम स्तर पर भी, दोनों ही एक-दूसरे के प्रति आकर्षित होते हैं, और सामाजिक संवेदनाओं से न सही पर हमारी मानवीय संवेदनाओं को तो यह संबंध सहज और नैसर्गिक लगता है। और इस फ़िल्म को बनाने के पीछे शायद यही उद्देश्य भी लगता है कि असंभव लगने वाली परिस्थितियों में भी वो मूलभूत गुण, जो मानव को मानव बनाते हैं, वह उन्हें एक-दूसरे के प्रति बिना किसी छद्म के, बिना किसी सामाजिक आवरण के, आने को प्रेरित करते हैं।

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फ़िल्म में ‘सर’ और ‘सरवेंट’ का पूरा रूपक, समाज-व्यवस्था में जो शक्ति-संतुलन है, उसको इंगित करता है। और अगर इन दोनों ही भूमिका में स्त्री और पुरुष को अदल-बदल कर दिया जाए तो शायद प्रभाव उतना नहीं पड़ेगा, क्योंकि अमीर साहिबज़ादियाँ और उनके ग़रीब आशिकों के तो क़िस्से आम हैं। फ़िल्मों और क़िस्से-कहानियों ने भी इन सम्बन्धों को और भी ज़्यादा हमारे मानस का हिस्सा बनाए रखा है। सर की ख़ासियत, इसी बात में यहाँ उभरती है कि जिस वातावरण में, जिस इकोसिस्टम में, अश्विन (सर) और रत्ना (सरवेंट) यहाँ काम कर रहे हैं, वहाँ पर शक्ति संतुलन को ध्यान में रखते हुए, एक शोषक और उत्पीड़ित के संबंध की कल्पना सहज ही नहीं बल्कि अवश्यंभावी लगती है।

एक पुरुष मालिक अपने घर पर काम करने वाली एक साधारण- स्त्री पर पुरुषत्व और स्वामित्त्व दोनों ही दिखला सकता है। और हमारे पॉप्युलर कल्चर इस तरह के उदाहरणों से भरे पड़े हुए हैं। फ़िल्म में भी, अश्विन और रत्ना मुंबई के एक बड़े आलीशान फ्लैट में अकेले ही रहते हैं, और बाहरी दुनिया में भी, रत्ना जो गाँव से आई है, उसका सामना लक्ष्मी ताई (बगल के फ्लैट में काम करनेवाली) को छोड़ कर अगर देखा जाए तो सिर्फ़, वॉचमैन, ड्राइवर इन्हीं से होता है, जो सभी पुरुष हैं। ऐसे में यह पूरा वातावरण ही ऐसा लगता है कि किसी अनिष्ट के घटित होने के लिए रचा गया है।

यहीं पर यह फ़िल्म हमारी संवेदनात्मकता को बुरी तरह से झकझोरता है कि ज़रूरी नहीं कि स्त्री-पुरुष सम्बन्धों में शक्ति का प्रदर्शन बारंबार स्त्री के शोषण के लिए ही हो।

हालाँकि यहाँ पर श्रेय दोनों ही पात्रों को दिया जाना चाहिए, क्योंकि अश्विन और रत्ना दोनों ही अपने निजी जीवन में जिस भी परिवेश से आते हों, एक मालिक और नौकर की भूमिका में वो अपने चरित्र को, नितांत निजी क्षणों में भी फिसलने नहीं देते।

रत्ना, जो 19 वर्ष की अवस्था में ही विधवा हो गयी है, जिसे फ़ैशन डिज़ाएनर बनने का अरमान था (है), वह जो गाँव में विधवाओं पर लगाए गए सभी प्रतिबंधों को स्वीकार करते हुए भी, मुंबई आते वक़्त ट्रेन में चूड़ी पहनती है, अपने आप में आत्मसम्मान की जीती-जागती तसवीर है। भले ही वह नौकर है जो पार्टियों में सभी को सर्व करने के बाद, ख़ुद ज़मीन पर अन्य नौकरों के साथ खाना खाती है, या जिसे अश्विन के उच्च वर्गीय मित्र फटकारते हैं, पर इस असम्मानित जीवनचर्या में भी उसके चरित्र की मर्यादा सबसे ज़्यादा मुखर होती है। और यहीं पर लगता है कि, आत्मसम्मान या चरित्र का खरापन, या सच्चाई, कुछ ऐसे आधारभूत गुण हैं, जो किसी भी, वर्ग, जाति और अमीरी-ग़रीबी की संकीर्ण परिभाषाओं से निरपेक्ष हैं। ये सब कुछ ऐसे मानव मूल्य हैं, जिन्हें पैसे से नहीं खरीदा जा सकता है, और रत्ना इसकी जीवंत मिसाल है।

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यह जानते हुए कि अश्विन का हृदय उदार है और वह उसकी हर संभव मदद कर सकता है, वह लक्ष्मी ताई को साफ़ मना कर देती है कि अपनी छोटी बहन की शादी में वह अपने सर से पैसे नहीं मांग सकती। इसी तरह पूरी फ़िल्म में जिस तरीक़े से रत्ना को अपने मालिक के प्रति एकनिष्ठ और सेवा भाव से भरपूर दिखलाया गया है, उससे हम कहीं भी यह नहीं कह सकते कि वह अश्विन से कुछ पाने की चाह रखती है, किसी भी स्तर पर। एक नौकर की हैसियत से वह सदैव एक निश्चित दूरी पर खड़ी दिखलाई पड़ती है, पर इसका यह निश्चित अर्थ नहीं कि वह स्थितियों की मूक दर्शक बनी रहती है। अगर अश्विन को वह अपनी ज़िंदगी का उदाहरण देकर यह प्रेरित कर सकती है कि चाहे कुछ भी क्यों न हो जाए, ज़िंदगी ख़त्म नहीं होती, तो वहीं उसे देर रात अश्विन के कमरे में आई लड़की के सुबह-सुबह निकल कर जाने से भी फर्क पड़ता है, भले ही वह कहती नहीं पर उसके भाव से यह पता चलता है कि उसे अश्विन से निराशा हुई है और एक जगह कहती भी है कि ‘पता नहीं सर, शहर के लड़के क्या चाहते हैं?’

अश्विन, अमेरिका में पढ़ा-लिखा, एक नितांत उच्च वर्गीय परिवेश से है, जिसे मुंबई अपने माता-पिता के क़ारोबार को संभालने आना पड़ा है क्योंकि उसके भाई का हाल ही में देहांत हुआ था। फ़िल्म शुरू ही, इसी संदर्भ से होती है कि किस प्रकार अभी-अभी वह अपनी शादी (जो उसने माता-पिता के दबाव में आकार स्वीकार की थी) तोड़ कर ऐन शादी वाले दिन, अपने घर मुंबई लौट रहा है, जिसकी वजह से सारे नौकर जिन्हें छुट्टी दी गयी थी, उन्हें अचानक अपनी-अपनी छुट्टियों से वापस लौटना पड़ रहा है।

अमेरिका में एक लेखक की ज़िंदगी गुज़ार रहे अश्विन के लिए, एकबारगी सब-कुछ छोड़ कर बंबई के परिवेश में बसना भी एक मानसिक चुनौती ही है। शादी के टूट जाने से ज़िंदगी में जो खटास और विरक्ति आ गयी थी, वह उसे, अपने से भी ख़राब स्थिति में रहने वाली रत्ना की अदम्य जिजीविषा और साहस को देख कर एक बार फिर से ज़िंदगी की ओर लौटने के लिए प्रेरित करता है।

यह शायद उसके पढ़े-लिखे होने की वजह से था या अमेरिका जैसी जगह में रहने की वजह से, जहाँ मनुष्यों का श्रम भारत की तरह सस्ता और हर समय मौजूद नहीं है कि अश्विन की संवेदनशीलता समाज के इस तथाकथित निम्न वर्ग के प्रति इतनी निर्मम नहीं है, जो उसी के समान वर्गीय अत्याधुनिक मित्रों की या परिवार की है।

मसलन, फ़िल्म के एक दृश्य में जहाँ, अश्विन की एक आधुनिक मित्र पर रत्ना की वजह से शराब की ग्लास छलक जाती है, वहाँ वह रत्ना को जिस अमानवीय तरीक़े से डाँट कर उसे उसके निम्न वर्ग का एहसास दिलाती है, अश्विन बर्दाश्त नहीं कर पाता। वह अपनी उस मित्र से सबके सामने यह कह पाने की हिम्मत रखता है कि ‘Fortunately she is not working for you’. 

इसी प्रकार वह रत्ना के स्वप्नों के बारे में जानने पर उसके लिए किताबें और सिलाई करने की मशीन लाता है, और उसके फन की कद्र करता है जब वह उसकी सिली हुई कमीज़ पहन कर बाहर जाता है।

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फ़िल्म में हर बार यह ध्यान रखा गया है कि दोनों ही पात्र स्वाभाविक बने रहें और तब भी अपने-अपने व्यक्तित्व की आभा से हमें असहज बनाते रहें, हमारी मानसिक संवेदनाओं को झकझोरते रहें। जब अश्विन, सामान्य-सी चलने वाली दिनचर्या में जीता रहता है और रत्ना एक निर्विकार रूप से उसके लिए काम करते रहती है, तब कई लोग उनकी इस स्वाभाविकता पर संदेह करते हुए, रत्ना से अश्विन का काम छोड़ देने की बात करते हैं। पर यह रत्ना के ही अदम्य आत्मविश्वास का उदाहरण है कि ऐसे लोगों को वो सिरे से नकार देती है। मसलन, ड्राइवर, जो उसे कहता है कि अब उसे दूसरा घर ढूँढना पड़ेगा क्योंकि अश्विन के अकेले उस घर में रहते अगर रत्ना वहाँ काम करेगी तो लोग क्या बोलेंगे, जिस पर रत्ना कहती है कि ‘लोग तो बोलते थे कि विधवा होने का कसूर भी सारा मेरा ही है, तो लोगों की सुनती तो गाँव में हाथ-पे-हाथ रखे बैठी रहती न’।

पर रत्ना के चरित्र की दृढ़ता और आत्मसम्मान का सबसे चरम रूप हमें तब दिखलाई पड़ता है, जब अश्विन के विश्वास दिलाने पर कि वह वास्तव में उससे प्रेम करता है, और उसके साथ रहना चाहता है, रत्ना उसे अस्वीकार कर देती है। अश्विन यह कहता है कि उसे समाज और परिवार की कोई परवाह नहीं है, पर रत्ना कहती है कि उसे है। एक विधवा जो गाँव में अपने परिवार पर बोझ नहीं बनना चाहती थी, और अपनी ज़िंदगी बनाना चाहती थी, अपनी बहन को पढ़ाना चाहती थी, वह अश्विन के इस प्रस्ताव को एक सिरे से खारिज़ कर देती है कि उनका यह संबंध संभव ही नहीं है क्योंकि दोनों के बीच जो वर्ग और धन की खाई है, वह यह समाज कभी नहीं पाटने देगा। स्वयं रत्ना भी जिसकी संवेदनाएँ अपने गाँव-समाज के परिवेश में निर्मित हुई हैं, इस संबंध को असंभव मानती है। एक मुकम्मल और इज्ज़त की ज़िंदगी जैसे उसने भी मान लिया है उसके लिए नहीं है। ग़रीबी ने जैसे उसके सपनों की उड़ान पर भी पाबंदी लगा दी है। और वह ख़ुद भी मानने लगी है कि एक बेहतर ज़िंदगी का ख्वाब उस जैसे लोग नहीं देख सकते जो समाज के हाशिये पर रहने को अभिशप्त हैं। फ़िल्म के एक दृश्य में अश्विन और रत्ना की बातचीत हमारे समाज के इसी कड़वे यथार्थ को दिखलाती है:

‘तुम बचपन से टेलर बनना चाहती थी?’

‘...फ़ैशन डिज़ायनर’

‘डिज़ायनर?’

‘...नहीं बन सकती?’

‘सिर्फ़ पूछ रहा हूँ’। …मैं तो सिर्फ़ इतना कह रहा हूँ कि फ़ैशन की दुनिया में आगे बढ़ना बहुत मुश्किल होता है।

‘मुझ जैसों के लिए?’

‘………………….’

फ़िल्म के अंत में जब रत्ना अश्विन के घर को छोड़ कर जाने लगती है तो अश्विन उसके लिए हर संभव आर्थिक मदद करना चाहता है, पर वह यह सहायता भी अस्वीकार कर देती है। अश्विन जो अपने समय और समाज से कहीं अधिक उदार सोच रखता है, अपने पिता से रत्ना के प्रति अपने प्रेम की बात रखता है और वापस अमेरिका जाने की बात करता है।

फ़िल्म के अंत में रत्ना को अश्विन की ही मित्र के पास सिलाई/डिज़ाएन का काम मिल जाता है और वह एक बार फिर अश्विन के घर उसे मिलने जाती है, पर दरवाजे पर लटका ताला यह संकेत देता है कि अश्विन न्यूयॉर्क जा चुका है।

और इस तरह, ‘सर’ एक अनिर्णीत मोड़ पर ख़त्म होती है, जहाँ अमेरिका से अश्विन का फ़ोन रत्ना के पास आता है, और वह अंतत: उसे सर नहीं, बल्कि अश्विन कह कर संबोधित करती है। और यह इंगित करता है कि मानसिक रूप से उसने ‘सर और सरवेंट’ की समाज निर्मित सीमाएँ अब मिटा दी हैं, और एक मानवीय धरातल पर दोनों को रख दिया है। यह पूरा दृश्य शायद यह दिखलाता है कि रत्ना जिसे अब एक नौकरी मिल गयी है वह शायद यह हिम्मत जुटा पायी है कि वह अश्विन को उसके नाम से पुकार सके, जो एक गहरे स्तर पर सोशल मोबिलिटी का एक पहला क़दम हो सकता है! 

अश्विन के अमेरिका चले जाने से साथ ही यह भी लगता है कि अगर रत्ना और उसके संबंध का कोई भविष्य है, तो वह भारत की सामाजिक व्यवस्था में नहीं बल्कि सुदूर विदेश में ही संभव है। स्वयं अश्विन के पिता जब उन दोनों के विषय में जानते हैं, तो यही कहते हैं कि अगर वह वाक़ई रत्ना से प्रेम करता है तब बेहतर यही होगा कि वापस न्यूयॉर्क ही चला जाए। यह इस बात का संकेत है कि अश्विन के अभिजात्य उच्च वर्ग में इस संबंध को मंजूरी नहीं मिलेगी। तो क्या, फ़िल्म इस संकेत के साथ ख़त्म होती है कि अश्विन और रत्ना अगर साथ हुए भी तो यहाँ नहीं, बल्कि कहीं दूर विदेश में?

बहरहाल, यह फ़िल्म इस तरह के कई सवालों से अपने दर्शकों को जूझने के लिए छोड़ देती है। और हम यह सोचते रहते हैं कि क्यों अश्विन और रत्ना अपने परिवेश में फल नहीं सकते? या क्यों उनका प्रेम, सामाजिक और एक स्तर पर, मानसिक दृष्टि से भी इतना निषिद्ध लगता है? यह हमारे अपने मन के पूर्वाग्रहों से दो-चार करवाता है कि आख़िर ऐसा क्यों है कि जो इंसान हमारे दैनिक जीवन में, हमारी दिनचर्या में, हमारी सहायता करता है, जिसकी वजह से हमारी ज़िंदगी व्यवस्थित रहती है, वह चाहे खाना बनाने वाली कुक हो या, घर साफ करने वाली बाई, या हमारा ड्राइवर, माली या कोई भी, वह हमारे स्नेह का, हमारे प्रेम का, हमारी मित्रता का आधार नहीं हो सकता? हम उनसे काम तो ले सकते हैं, पर उनसे प्रेम नहीं कर सकते? क्या यह हमारी सामाजिक-मानसिक बुनावट की वजह से है या यह हमारी संस्कृति ने ही सिखला दिया है कि उपयोग कर के, स्वार्थसिद्ध हो जाने तक ही किसी इंसान और वस्तु की उपादेयता है?

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कुछ इन्हीं सभी प्रश्नों से उर्दू तरक्कीपसंद तहरीर के प्रसिद्ध लेखक सज्जाद ज़हीर की कहानी ‘दुलारी’ भी दो-चार होती है। इसमें दुलारी, जो बचपन से शेख नाजिम अली साहब के घर में रहती आई थी, एक तरह से लौंडी की तरह ही घर के सारे काम करती थी और सिवाय शेख साहब के बेटे काज़िम जो प्रगतिशील विचार वाले थे, कोई दुलारी को मानव नहीं समझता था। दुलारी और काज़िम में प्रेम और आकर्षण बढ़ता है, और इसी तरह दुलारी को भी अपने जीवन की सार्थकता मिलती है। ज़हीर लिखते हैं,

‘दो हस्‍तियों ने, जिनके मानसिक जीवन में ज़मीन-आसमान का फर्क था यकायक यह महसूस किया कि उनकी आकांक्षाओं को किनारा मिल गया है’। 

एक साल के अंदर काज़िम की शादी की बात चलती है, और दुलारी इस दुख से घर से भाग जाती है। काफ़ी दिनों बाद जब वह वापस इसी घर में आती है तो सभी उसे ताने मारते हैं और हिक़ारत की नज़रों से स्वागत करते हैं। दुलारी चुपचाप सब कुछ बर्दाश्त करती है, पर जब साहेबज़ादे काज़िम अपनी नयी-नवेली दुल्हन के साथ कमरे से बाहर निकलते हैं और दुलारी पर नज़र भी नहीं डालते हुए अपनी माँ से कहते हैं,

'अम्‍मी, खुदा के लिए इस बदनसीब को अकेली छोड़ दीजिए। यह काफ़ी सज़ा पा चुकी है। आप देखतीं नहीं कि उसकी हालत क्‍या हो रही है।' 

दुलारी उनके मुँह से यह सुनने की अपेक्षा नहीं करती, क्योंकि उसकी आँखों के सामने वे सारे मंजर घूम जाते हैं, जब वह और काज़िम रातों की तन्‍हाई में एक साथ होते थे और जब उसके कान प्‍यार के बोल सुनने के आदी थे। काज़िम की बेदिली ने उसे कहाँ से कहाँ पहुँचा दिया और अब यह हालत है कि वह भी यों बातें करने लगे। ज़हीर लिखते हैं- 

“इस रूहानी कोफ्त ने दुलारी को उस वक़्त नारी स्‍वाभिमान की मूर्ति बना दिया। उस दिन रात को वह फिर ग़ायब हो गई।” 

इस कहानी में भी जिन दो पात्रों को ज़हीर उठाते हैं, उनके सामाजिक परिवेश एकदम अश्विन और रत्ना की तरह ही हैं। पर यहाँ काज़िम में वह चारित्रिक दृढ़ता और साहस नहीं है, जो अश्विन में हमें मिलती है। काज़िम प्रगतिशील विचारों के होते हुए भी, सिर्फ़ ज़बानी रूप से उदार हृदय के थे। बतौर ज़हीर-

“वह पुरानी रस्‍मों के ख़िलाफ़ थे। मगर इनसे नाराज़गी ज़ाहिर करके सब कुछ बर्दाश्‍त कर लेते। इससे ज़्यादा कुछ करने को तैयार नहीं थे”।

यह यथास्थितिवाद हमें अश्विन में नहीं मिलता। और शायद इसलिए, ‘सर’ इसी मोड़ पर ख़त्म होती है कि हो सकता है कि रत्ना और अश्विन साथ भी हो जाएँ, उनके प्रेम की सफलता की संभावना भी होती है। पर दुलारी में, एक सामंतवादी परिवार-समाज व्यवस्था में, काज़िम का तथाकथित प्रेम भी शोषण का ही एक दूसरा रूप नज़र आता है जो दुलारी को अंतत: निराश कर के बेघर होने पर मजबूर करता है। अश्विन का प्रेम, जहाँ रत्ना को विश्वास और मज़बूती देता है, दुलारी काज़िम के हाथों का एक खिलौना बन कर अंत में एक भुक्तभोगी ज़्यादा नज़र आती है। 

बहरहाल, ज़हीर की कहानी और फ़िल्म ‘सर’ में समानता के बिन्दु भले ही बहुत कम हों, दोनों ही मुद्दा सामाजिक असमानता का ही उठाते हैं। और हमें स्त्री-पुरुष सम्बन्धों में वर्ग चेतना के महत्वपूर्ण रोल को समझने का मौक़ा देते हैं। साथ ही, एक बेहतर समाज व्यवस्था, शायद वर्ग-विहीन सामाजिक ढांचे का स्वप्न देखने के लिए हमारी तथाकथित परंपरा और संस्कृति की दीवार में सेंध लगाते हुए एक खिड़की भी खोल देते हैं। 

और जैसा कि अश्विन ने रत्ना से कहा था - 

“हर किसी को सपने देखने का हक़ है”। 

तो हमारे लिए भी समानता का यह स्वप्न ही सही।

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अदिति भारद्वाज
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